लोग जिसे पागल, विकलांग कहकर पुकारा करते थे,आज वह कृत्रिम पैर के सहारे दुनिया को दे रही है चुनौती

यदि हौसला बुलंद हो तो कठिन से कठिन राह भी आसान हो जाती है। इस बात को हमेशा से चरितार्थ करती आई हिंदुस्तान की स्टार पर्वतारोही अरुणिमा सिन्हा एक बार फिर से वैश्विक मंच पर देश का नाम रौशन की हैं। कृत्रिम पैर के सहारे दुनिया की छह प्रमुख चोटियों को फतह कर चुकीं अरुणिमा अब आखिरी बची माउंट विन्सन चोटी पर भी तिरंगा लहराने में कामयाबी हासिल कर ली हैं। -40 से -45 डिग्री सेल्सियस तापमान और तेज़ बर्फ़ीली हवाओं का डटकर सामना करते हुए अपनी मंज़िल तक पहुंचकर देश के इस बेटी ने करोड़ों देशवासियों को प्रेरित किया है।

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उत्तर प्रदेश में जन्मीं और पली-बढ़ी अरुणिमा कभी राष्ट्रीय स्तर की एक वॉलीबॉल खिलाड़ी हुआ करती थी। लेकिन अप्रैल, 2011 में लखनऊ से नई दिल्ली के सफर में उनका सामना कुछ बदमाशों से हुआ। उनके बैग और सोने की चेन खींचने के प्रयास में बदमाशों ने उन्हें चलती ट्रेन से बाहर धक्का दे दिया। इस घटना ने उनका एक पैर छीन लिया। अस्पताल में लेटे-लेटे वो पर्वतारोहण के उपर तरह-तरह की कहानियां पढ़ा करती थीं और यहीं से उनके भीतर एक पर्वतारोही बनने की इच्छा प्रकट हुई।

नए सिरे से अपनी जिंदगी की शुरुआत करते हुए अरुणिमा 21 मई 2013 को दुनिया की सबसे ऊंची चोटी माउंट एवरेस्ट को फतह कर एक नया इतिहास रचते हुए ऐसा करने वाली पहली विकलांग भारतीय महिला होने का रिकार्ड अपने नाम कर लिया। इस अभूतपूर्व उपलब्धि के बाद उनकी इच्छाशक्ति और दृढ़ हुई और उन्होंने एक के बाद एक किलिमंजारो (अफ़्रीका), कास्टेन पिरामिड (इंडोनेशिया), किजाश्को और एल्ब्रुस (रूस) आदि कई पर्वतों पर तिरंगा फहरा दीं।

अमर उजाला की ख़बरों के मुताबिक उन्होंने अपनी आखिरी मंजिल की तरफ बढ़ने से पहले अपने आलोचकों का शुक्रिया अदा किया। उन्होंने कहा था कि मैंने जब एवरेस्ट पर फतह की थी तब दोनों हाथ उठाकर जोर से चिल्लाना चाहती थी। मुझे पागल, विकलांग कहने वालों से कहना चाहती थी कि देखो मैंने कर दिखाया। 

कृत्रिम पैर के सहारे दुनिया को चुनौती देने वाली अरुणिमा ने आखिरी बची माउंट विन्सन चोटी को फतह करने से पहले दिल्ली में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से मुलाकात की थी। प्रधानमंत्री ने उन्हें माउंट विन्सन पर लहराने के लिए तिरंगा देकर विदा किया था। चोटी फतह करने के बाद अरुणिमा ने ट्वीट करते हुए लिखा कि 'इंतज़ार ख़त्म हुआ। आप सभी को ये बताते हुए बहुत ख़ुशी हो रही है कि वर्ल्ड रिकॉर्ड बन चुका है।

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अरुणिमा ने साबित कर दिखाया है कि यदि मंजिल को पाने की जिद और दृढ़ संकल्प हो तो बड़ी-से-बड़ी कठिनाई भी अपना रास्ता मोड़ लेती है। उनकी जीवटता वाकई में सलाम करने योग्य है।

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