वकालत छोड़ एलोवेरा की खेती को पहुंचाया नए आयाम पर, फैक्ट्री लगा कर किसानों को दिया रोज़गार

प्राचीन समय से ही एलोवेरा का प्रयोग चिकित्सा जगत में लोगो का उपचार करने में किया जाता रहा है। एलोवेरा के गुणों से हम सभी भली भांति परिचित हैं तथा हमने इसका उपयोग कभी न कभी प्रत्यक्ष या अप्रत्यछ रूप में किया जरूर होगा। एलोवेरा में अनेकों बीमारियों को उपचारित करने वाले अद्धभुत गुण मौजूद होने के कारण आयुर्वेदिक उद्योग में इसकी मांग बढ़ती जा रही है। एलोवेरा की इन विशेष खूबियों को सही मायने में पहचानते हुए श्यामू सिंह ने हमारे देश के किसानों के लिए एक प्रेरणादायक उदाहरण प्रस्तुत किया है।

श्यामू सिंह मेह गांव के खारीपुरा क्षेत्र के निवासी हैं, एल.एल.एम. (लॉ में मास्टर्स) की डिग्री प्राप्त करने के बाद उन्होंने ग्वालियर हाईकोर्ट में वकालत कर रहे थे किन्तु एक वर्ष पूर्व इनके गांव में आत्मा फाउंडेशन के द्वारा प्रशिक्षण शिविर का आयोजन किया गया, जिसमे एलोवेरा की खेती से संबंधित जानकारी दी गयी। इससे प्रभावित हो कर श्यामू ने वकालत छोड़ अपने साथी आर पी एस खुश्वाह के साथ मिल कर अपनी दो हेक्टेयर भूमि में एलोवेरा की खेती शुरू कर दी। एक बार फसल लगने पर दो से तीन बार फसल ली जा सकती है इसलिए कम लागत व कम समय में अधिक उत्पादन होने के कारण श्यामू ने बहुत तेज़ी से तरक्की की। वर्तमान में वो 50 एकड़ भूमि पर एलोवेरा की खेती कर रहे हैं। श्यामू ने खेती करने के साथ ही किसानों को एलोवेरा की खेती का प्रशिक्षण देना भी शुरू किया जिससे किसानों के आत्मविश्वास में काफी वृद्धि हुई।

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खारीपुरा क्षेत्र अपनी परंपरागत खेती के लिए मशहूर है। यहाँ के अधिकतर किसान की दिलचस्पी रवि व खरीफ के मौसम में एक ही तरह की फसल की बुआई में रहती है। लेकिन एक साल पहले श्यामू को आत्मा से जो मार्गदर्शन मिला उसने सिर्फ उनकी ही नहीं बल्कि कई किसानों की सोच व जिंदगी बदली। अब श्यामू खेती को एक बेहद लाभकारी धंधा बनाये जाने के लिए किसानों को नई तकनीकों का प्रशिक्षण दे रहे हैं ताकि किसान अधिक से अधिक लाभ उठा सके।

श्यामू के तमाम सकारात्मक प्रयासों ने रंग लाना तब शुरू कर दिया जब उन्होंने अपने गांव में एलोवेरा से औषधि तैयार करने की “एस.आर.ए.एग्रो” नाम से फैक्ट्री लगाई और इस फैक्ट्री से उन्होंने अपने क्षेत्र के तमाम किसानों को जोड़ा जिससे वहां के किसानों की जीविका में बेहद सुधार आया। ख़ास बात यह है कि पशु इस पौधे को नहीं खाते हैं और ये कम उपजाऊ भूमि पर भी अच्छे से फलता फूलता है। 20 हज़ार पौधों की मदद से प्रति हेक्टेयर 1000 से 1200 क्विंटल का उत्पादन होता है, जिससे किसान 30 से 40 हज़ार रूपए प्रति हेक्टेयर की दर से लाभ कमा रहे हैं। औषधीय गुणों से परिपूर्ण एलोवेरा का पौधा पूर्णतः जैविक तरीकों से उगाया जाता है इसको ऊंची नीची जगहों पर भी लगाया जा सकता है, इस फसल को पानी की भी कम आवश्यकता होती है। जिससे इसकी खेती में लागत बहुत कम आती है। इन सारे लाभों के चलते ही अब खारीपुरा में एलोवेरा का बिक्री केंद्र भी स्थापित हुआ है जिससे निकट भविष्य में किसानों को और अधिक लाभ होने की संभावना है।

श्यामू सिंह अपनी फैक्ट्री के बारे में बताते हैं कि उनकी फैक्ट्री से पंतजलि एवं डाबर सहित अन्य बड़ी-बड़ी कंपनियों ने अनुबंध किए है। जिले में यह इस तरह की पहली फैक्ट्री है। इस फैक्ट्री में किसानो से खरीदा गया एलोवेरा प्रोसेस किया जाता है और उनसे एक अनुबंध किया जाता है जिससे उन्हें एलोवेरा बेचने में किसी समस्या का सामना न करना पड़े। श्यामू सिंह के अथक प्रयासों से ना सिर्फ उन्होंने अपनी बल्कि अपने साथी किसानों की आर्थिक स्थिति में बहुत अधिक सुधार किया है तथा अपने क्षेत्र में एक मिसाल बन कर उभरे हैं।

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