बिना किसी अनुभव के चंदन की खेती से करोड़ों रूपये बनाने वाले एक किसान की सफलता

भारत एक कृषि प्रधान देश है यहाँ किसान साल भर खेती करते हैं और खेती पर की गई मेहनत के फलस्वरूप जो हरा सोना लहराता है शायद इसलिए भारत को सोने की चिड़िया कहा जाता था। लेकिन आज परिस्थितियां बदल रही है धरती पुत्रों को विकट हालातों का सामना करना पड़ रहा है। फसल अच्छी हो गयी तो ठीक है पर यदि ना हुई तो कई किसान आत्महत्या तक का मन बना लेते हैं। क्योंकि खेती ही तो किसान का सर्वस्व है और उनकी जमा पूँजी है। किसानों की आमदनी को दोगुना करने हेतु सरकार भी अपनी ओर से प्रयासरत है लेकिन किसान यह समझ चुका है कि सरकार के प्रयास तब सफल होंगे जब अपनी खेती को लेकर वो खुद जागरूक होंगे। एक ऐसे ही जुझारू और जागरूक किसान हैं गुजरात के भरुच के पास अलपा गाँव में रहने वाले अल्पेश पटेल जो आज की मांग को देखते हुए खेती के साथ प्रयोग करने में सबसे आगे हैं।

अल्पेश पटेल एक ऐसे किसान है जिन्होंने अपने राज्य में बिना किसी पूर्व अनुभव के चंदन की खेती करने का निर्णय लिया। चंदन की खेती का निर्णय लेना एक बहुत जोखिम का काम है फिर भी खुद पर विश्वास कर उन्होंने यह जोखिम उठाया और सफलता प्राप्त की। एक छोटे से गांव में रहने वाले अल्पेश भाई पटेल ने जब पहली बार अपनी खेती–बाड़ी के साथ कुछ नया प्रयोग करने का विचार किया तो उनकी राह बिलकुल आसान नहीं थी। 2003 में गुजरात में सरकार ने वहाँ के किसानों को चंदन की खेती करने की इजाज़त तो दी लेकिन नए मौसम और नए माहौल में अपने खेत पर चंदन की खेती का जोखिम उठाने को कोई किसान तैयार नहीं थे ऐसे में अल्पेश ने यह जोखिम उठाने का निश्चय किया।

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अल्पेश ने करीब 5 एकड़ जमीन पर 1,000 चंदन के पेड़ लगा दिए लेकिन शुरुआत में फसल खराब हो गई जिससे उन्हें आर्थिक हानि का सामना भी करना पड़ा। लेकिन चंदन की खेती करने का अल्पेश के मन में इरादा पक्का था। कहते है ना “हिम्मते मर्दा तो मदद ख़ुदा” अल्पेश की मदद के लिए राज्य के कृषि अनुसंधान संस्थान ने हाथ बढ़ाया और उनके साथ आकर उनकी फसल पर शोध करने का फैसला किया। हम सभी जानते हैं कि सब्र का फल मीठा होता है और चंदन की खेती में तो सब्र रखना ही सबसे जरुरी बात होती है। चंदन की खेती को तैयार होने में 15 से 20 साल तक का समय लगता है और यही कारण है कि कई किसान इतना अधिक इंतजार नहीं कर पाते। और जो सब्र करते हैं, उन्हें चंदन की खेती पकने के बाद एक किलो चंदन की लकड़ी के लिए 10 से 12 हजार रुपए तक की राशि मिलती है।

अल्पेश ने सब्र रखा और उन्हें इसका फायदा भी मिला। उनकी खेती पकने पर उन्हें करोड़ो का लाभ प्राप्त हुआ। 10 लाख रुपये के निवेश से प्रारम्भ हुई चंदन की खेती की कीमत आज 15 साल बाद करीब 15 करोड़ रुपये पहुँच गयी है। मतलब 150 गुना का फायदा चंदन की खेती से अल्पेश को प्राप्त हुआ। गौरतलब है कि गुजरात समेत कुछ राज्यों में किसानों को अपनी चंदन की फसल बेचने के लिए परेशान नहीं होना पड़ता क्योंकि राज्य सरकार ने इसे बेचने और एक्सपोर्ट करने तक की जिम्मेदारी स्वयं ले रखी है।

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अल्पेश को अपनी मेहनत के फलस्वरूप राज्य में सर्वश्रेष्ठ किसान का खिताब भी मिल चुका है और वे दक्षिण गुजरात में हजारों किसानों के लिए एक प्रेरणा बन चुके हैं। अल्पेश की सफलता को देखकर अन्य किसान भी अब जोखिम उठाने को तैयार हैं। और जो किसान चंदन की खेती नहीं कर पाए उन्होंने नीलगिरी की खेती शुरू कर दी है। नीलगिरी की लकड़ी से भी किसानों को काफी फायदा हो रहा है। यदि हमारे किसान इसी तरह जागरूक होने लगे तो वो दिन दूर नहीं जब यह कृषि प्रधान देश पुनः सोने की चिड़िया कहलाने लगेगा।

(यह आर्टिकल हिमाद्री शर्मा द्वारा लिखा गया है)

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