जिसके करीब जाने की नहीं है किसी को अनुमति, इस महिला ने उस ख़ूँख़ार जनजाति को गले लगाया

आजकल हमारे के लिए बिजली, इंटरनेट और मोबाइल आम जरूरत है।इसके बिना लोगों का गुजारा नहीं होता। हर छोटी से छोटी चीज के लिए इसकी जरूरत पड़ती है। लेकिन दुनिया में कुछ ऐसी जगह भी है जहां बिजली, मोबाइल और इंटरनेट तो छोड़िए लोगों के पास पहनने के लिए हमारे जैसे कपड़े भी नहीं है। जांगलों और टापुओं पर रहने वाले इस समुदाय को हम जनजाति या आदिवासी के रुप में जानते हैं। 

विविध जांगलों और सुदूर क्षेत्रों मे निवास करनें के कारण ये जनजातीय समुदाय आज भी अशिक्षित एवं तथाकथित सभ्यता से दूर है। इनकी अपनी सामान्य संसकृति है जो उन्हें अन्य समाजों से अलग पहचान दिलाती है। विविध जंगलों, पर्वतों एवं पठारों में निवास करने के कारण ये जनजातियां आज भी समाज के एक बड़े हिस्से से कटी हुई है और भौतिक सुख-सुविधाओं से बिल्कुल अनजान हैं। आज भी ये या तो पत्तियों से व खालों से बनीं पोशाक पहनते हैं या फिर नंगे ही रहते हैं। उनकी भाषा भी बिल्कुल अलग होती है इसलिए आम इंसानों से उनका संपर्क व विचारों का आदान प्रदान लगभग असंभव हो जाता है। ऐसी ही एक जनजाति इंडियन ओशन के नॉर्थ सेंटिनल आइलैंड में रहती है, जिसे बहुत आक्रामक माना जाता है। लोगों का वहाँ जान तक प्रतिबंधित है। पर आज हम आपको उस पहली महिला के बारे में बताने जा रहे हैं जिन्होंने उनसे पहली बार संपर्क किया था।

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इनका नाम है डॉ मधुमाला चट्टोपाध्याय। करीब 27 वर्ष पहले एक युवा महिला शोधकर्ता को अंडमान और निकोबार के सेंटिनिलीज आदिवासियों ने अपने द्वीप के तट पर पांव रखने की अनुमति दी थी। डॉ मधुमाला चट्टोपाध्याय को यह दुर्लभ उपलब्धि मिली थी कि वह पहली शख्स बनीं जो दुनिया से कटे पड़े सेंटिनल द्वीप के आदिवासियों से रूबरू हो सकी। युवा शोधकर्ता के रूप में मधुमाला जनवरी-फरवरी 1991 में अपने सहयोगियों के साथ इस अनजान द्वीप के रहस्यमय जनजाति से मिलने गयी थीं। दल में नाविकों सहित कुल 13 लोग थे। यह शोधकर्ता दल अपनी जान जोखिम में डाल कर सेंटिनलीज लोगों के बारे में अध्ययन करना चाहता था। द्वीप की ओर पहली यात्रा में आदिवासियों ने उनपर बाण चलाये लेकिन दूसरी बार मधुमाला का स्वागत किया गया और उन्हें तट पर आने दिया गया।

उस दिन जब वह अपने दल के साथ द्वीप पर पहुंची तो सुबह के 8 बज रहे थे। जब उन्होंने वहां धुंआ देखा तो वह उसी दिशा में चल दिए। कुछ ही देर बाद वहां सेंटिनल भी आ गए। उनमें अधिकतर पुरुष थे और चार लोग ऐसे थे जिनके पास तीर-कमान थे। उन्होंने कहा कि उनके दल के लोगों ने नारियल पानी में फेंक दिए और सेंटिनल नारियल लेकर चले गए। जब उनका दल दोबारा नारियल लेकर लौटा तो सेंटिनल अपनी भाषा में जोर जोर से कहने लगे 'नरियाली जाबा जाबा' यानी और नारियल आये हैं। उस समय कई सेंटिनल युवक नाव तक आए और नारियल ले गए। वहीं एक अन्य सेंटिनल युवक नदी के पास खड़ा था और वह तीर कमान लेकर उनके दल पर  निशाना साधने लगा। उतने ही वहां खड़ी सेंटिनल महिला ने उस पुरुष को धक्का दे दिया। ऐसा लगा कि वह उसे निशाना लगाने से रोक रही हो। इसके बाद अब नारियल पानी में नहीं फेके गए बल्कि उनके हाथ में दिए जाने लगे।

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इसके बाद हमले की परवाह नहीं करते हुए मधुमाला नाव से पानी में कूद गयीं और सेंटिनलीज लोगों के एकदम पास पहुँच गयीं। वह अपने हाथ से आदिम दोस्तों को नारियल देने लगीं। दुनिया के नृवंश अध्ययन इतिहास में वह एक नयी इबारत लिख रही थी। शायद टीम में एक महिला के होने से सेंटिलीज लोगों को यह भरोसा हो गया कि ये लोग उन्हें नुकसान पहुंचाने नहीं आये हैं। इतना सब होते हुए भी सेंटिनलीज लोगों ने टीम के सदस्यों को तट पर नहीं आने दिया। लेकिन मधुमाला 21 फरवरी को फिर वहां पहुंचीं। सेंटिनलीज ने उन्हें पहचान लिया और इस बार उनका व्यवहार दोस्ताना था। वे उनकी नाव के पास आ गए। कुछ तो नाव पर चढ़ गए। इसबार मधुमाला को तट पर पांव रखने की अनुमति मिल गयी।

अपनें लोगों को सुरक्षित रखने के प्रति जागरूक सेंटिनलीज लोगों ने ऐसे सभी घुसपैठियों का प्रतिकार बहुत ही आक्रमण ढंग से धनुष-बाण से करते हैं। हाल ही में अंडमान द्वीप पर रहने वाले सेंटिनल जनजाति के लोगों ने अमेरिकी नागरिक 26 वर्षीय जॉन एसन चाऊ की हत्या कर दी थी। इस घटना के बाद से एक बार फिर सेंटिनल का मुद्दा पूरी दुनिया में उठ गया। लोगों के मन में इस जनजाति के प्रति काफी डर आ गया। दुनिया की नजर में ये छवि बन गई कि जनजाति के सामने यदि कोई आ जाए तो ये लोग उसे मार सकते हैं। लेकिन इसी सेंटिलीज लोगों के साथ सर्वप्रथम आत्मीय संपर्क कायम करने का श्रेय मधुमाला चट्टोपाध्याय को ही मिला। मधुमाला उस समय केंद्र सरकार के सामजिक कल्याण और अधिकारिता मंत्रालय में वरिष्ठ अधिकारी हैं। अभी मधुमाला सामाजिक न्याय और सशक्तिकरण मंत्रालय में जॉइंट डायरेक्टर के रूप में कार्यरत हैं।

मधुमाला ने अंडमान के आदिम लोगों पर दशकों तक अध्ययन किया है और इस विषय पर एक पुस्तक ‘ट्राइब्स ऑफ़ कार निकोबार’ (कार निकोबार की जनजातियों) लिखी है।

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