जैविक खेती के जरिये सफलता की कहानी लिख रही हैं मध्यप्रदेश की यह किसान, आप भी लें प्रेरणा

"पति करे बाहर का काम और पत्नी करे घर का काम" यह कहानी अब बीते जमाने की बात हो गई है। कहा जाता रहा है कि कुछ काम केवल पुरुष ही कर सकते हैं पर अब ऐसा नहीं है। क्योंकि महिलाएं जहां पुरुषों के साथ पाताल की गहराईयां नाप रही हैं वहीं अंतरिक्ष की ऊंचाई भी छूने में पुरुषों से पीछे नहीं हैं। महिला सशक्तिकरण का यह उदाहरण केवल शहरों तक ही सीमित नहीं है बल्कि गांवों तक भी पहुंच गया है। हाथों में बेलन पकड़ने वाली महिलाएं आज कुदाल और फावड़ा लेकर खेतों में जाने से भी नहीं कतराती। पुरुषवादी समाज में कृषि क्षेत्र में भी महिला किसान न केवल आत्मनिर्भर बन रही हैं,बल्कि महिला सशक्तिकरण के नए सोपान भी गढ़ रही हैं।

आज हम आपको एक ऐसी ही महिला के बारे में बताने जा रहे हैं जिन्होंने ऑर्गेनिक खेती की बदौलत ना केवल दुनिया भर में नाम कमाया बल्कि अवार्ड भी हासिल किया।

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इनका नाम है ललिता मुकाती। मध्य प्रदेश के धार के मानवाड़ तहसील में सिरसाला के छोटे गांव में पैदा हुई ललिता नें आज जैविक खेती में वह मुकाम हासिल किया है जो बड़े बड़े नहीं कर पाते। आज जब अधिकांश किसान रासायनिक खाद का प्रयोग कर अधिक से अधिक उपज लेने के लिए तत्पर रहते हैं, ऐसे में बड़वानी की महिला किसान ललिता मुकाती ने 36 एकड़ में चीकू, सीताफल और कपास उगा कर जैविक खेती से रिकॉर्ड उत्पादन कर अपने साथ-साथ छोटे से गांव बोरलाय को दिल्ली तक पहचान दिलाने जा रही हैं। यदि सबकुछ ठीक रहा तो एक साल बाद वे अपने खेत में उगाए इन फलों को सीधे विदेशों में निर्यात कर पाएंगी। यही नहीं वे गांव की महिलाओं का समूह बनाकर उन्हें भी जैविक खेती के लिए प्रोत्साहित भी कर रही हैं।

ललिता के माता-पिता पेशे से किसान तो थे, लेकिन वे बेटी को किसानी कराने की बजाय हमेशा पढ़ाई के लिए प्रोत्साहित करते रहे। महज 19 साल की उम्र में जब ललिता की शादी सुरेश चंद्र मुकाती से हुई तो वूमेन एजुकेशन के हिमायती उनके सुसर ने भी ललिता को पढ़ाई के लिए प्रेरित किया। इसी प्रेरणा के दम पर ललिता ने ओपेन यूनिवर्सिटी के जरिये बी.ए. की डिग्री हासिल की। आर्ट ग्रेजुएट की डिग्री एग्रीकल्चर में बहुत काम नहीं आ सकती है, पर ललिता ने इसे झूठा साबित कर दिखाया। आज वह न केवल एक अवॉर्ड विनर ऑर्गेनिक फार्मर हैं, बल्कि 21 महिलाओं का एक एसोसिएशन बनाकर पेस्टिसाइड्स फ्री फार्मिंग को बढ़ावा दे रही हैं। इसी क्रम में उन्होंने बरवानी जिले के बोर्लाई गांव की अपनी 36 एकड़ एग्रीकल्चर लैंड को पेस्टिसाइड्स फ्री कर दिया है, जहाँ वे ऑर्गेनिक फसल उगाती हैं।

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ललिता ने ऑर्गेनिक खेती में कदम अपने पति 50 वर्षीय सुरेंशचंद्र मुकाती की मदद के लिए उठाया था। ललिता के पति ने एग्रीकल्चर में एमएससी किया था और उन्हें ट्रेनिंग एवं अन्य कारणों से अक्सर बाहर जाना पड़ता था। ऐसे में खेती पर ध्यान नहीं दे पाने के कारण काफी नुकसान उठाना पड़ता था, दौरान खेतों में मजदूरों को देखने वाला कोई नहीं था, इसलिए उन्होंने निर्णय किया कि वे खुद खेतों में जाएंगी और कृषि कार्य में पति का हाथ बंटाएंगी।इसलिए ललिता ने बच्चों के बड़े हो जाने के बाद साल 2010 में पति से ही खेती के गुर सीखने लगी। घर से खेतों तक पहुंचने के लिए उन्होंने पहले स्कूटी चलाना सीखी और धीरे-धीरे सारे खेती उपकरण चलाना शुरू किया। इसके लिए उन्होंने ट्रैक्टर चलाना भी सीखा।

ललिता के आठ साल के लगातार प्रयासों का रिजल्ट यह रहा कि मध्य प्रदेश स्टेट ऑर्गेनिक सर्टिफिकेशन एजेंसी से उनके खेत को ऑर्गेनिक स्कोप सर्टिफिकेट मिल गया है। ललिता अपने खेत में अर्थवर्म्स पालती हैं, जो खेत के अपशिष्ट को वर्मीकंपोस्ट में बदल देता है। सर्वश्रेष्ठ जिला किसान पुरस्कार और सर्वश्रेष्ठ फार्म महिला अवॉर्ड से सम्मानित ललिता को मुख्यमंत्री किसान विदेश अध्ययन योजना के तहत चुना गया था। जहां 2014 में ललिता और उनके पति को साथ में उन्हें जर्मनी और इटली जैसे देशों में घूमने का मौका मिला। खेती के नए, कम लागत वाले और बेहतर उपज के तरीके जानने के लिए उन्हें जर्मनी और इटली के हाई-टेक ऑर्गेनिक खेतों में जाने का अवसर मिला। इसी के साथ केंद्र सरकार ने भी उन्हें देश की उन 114 महिला फार्मर्स में शामिल किया है, जिन्होंने भारतीय कृषि में बेहतरीन योगदान दिया है। उन्हें प्रधानमंत्री द्वारा अवार्ड से सम्मानित किया गया।

फ़ोटो साभार: सोशल मीडिया 

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