पूर्व नक्सली कमांडर अब पत्नी के साथ जला रहे हैं लोकतंत्र की अलख

"हूँ आज उठा फ़लक नापता,

दिमाग से दिमागी फ़ितरत भांपता

अचेतन-अवचेतन का संगम

दिल में ज्वाला लिए क्रांति की

खड़ा हुआ हूँ बाहर से मैं

भीतर एक शमशान हूँ

शायद मैं इंसान हूँ

हाँ शायद मैं इंसान हूँ"

राम निरंजन रैदास की लिखी निम्नलिखित पंक्तियाँ स्पष्ट रूप से इंसान के टूटने की तड़प को दर्शाती हैं। और इन्हीं पंक्तियों को चर्चित करते दिखे पूर्व नक्सली कमांडर रमेश पोड़ियाम

वाक्या सोमवार को छत्तीसगढ़ के बस्तर इलाके का है। यहाँ पोलिंग बूथ बने केवरामुंडा सरकारी स्कूल में नक्सलियों के चुनाव बहिष्कार व हिंसक घटनाओं के बीच पूर्व नक्सल कमांडर रमेश पोड़ियाम उर्फ़ बदरन्ना अपनी पत्नी के साथ जब पोलिंग बूथ पर वोट डालने पहुँचे तो लोग उन्हें देखकर दंग रह गए। उनकी पत्नी लता भी उन्हीं की कमेटी में मैम्बर थीं।

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बासागुड़ा एरिया कमेटी के कमांडर रहे रमेश उर्फ़ बदरन्ना ने कहा कि "हमने ख़ुद को वोट डालने के लिए वोटिंग से पहली रात ही तैयार कर लिया था। जब नक्सली गलियारों में दाख़िल हुआ था तब मुझे वही नीतियाँ क्रांतिकारी लगती थीं। कुछ वक़्त बाद मैं जब शीर्ष पर पहुँचा तो एहसास हुआ कि किसी भी समस्या का समाधान बंदूक की नोंक पर नहीं किया जा सकता।"

वो आगे कहते हैं, "उसी वक़्त में ही मेरा विवाह लता से हो गया। फ़िर दोनों ने ही लोकतंत्र के रास्ते को अपनाया और "गन नहीं गणतंत्र" की विचारधारा के साथ सभी समस्याओं को सुलझाने की ठानी। हम दोनों ने सन् 2000 में आत्मसमर्पण कर दिया था। इसके बाद मेरी पत्नी पुलिस फोर्स में तैनात हुई जो कि अभी सहायक आरक्षक के पद पर हैं। मैं सरकारी स्विमिंग पूल में हूँ। हम दोनों ने अपना वोट उसे दिया जो बस्तर में शांति लेकर आये। मैं उम्मीद करता हूँ कि भटके हुए लोग भी जल्द ही गणतंत्र को अपनाएंगे और शांति के रास्ते पर चलेंगे। बस्तर में फ़िर से एक नया सवेरा आयेगा।" 

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बता दें कि समर्पण करने और लोकतंत्र का रास्ता अपनाने के पश्चात रमेश उर्फ़ बदरन्ना व उनकी पत्नी लता तब से अभी तक सभी पंचायत और लोकसभा चुनावों में अपने मत का प्रयोग करते हैं। इसी के साथ वह लोगों को इस रास्ते पर चलने के लिए प्रेरित करते हैं। वह अब साधारण जीवन बिता रहे हैं और सरकारी मकान में रहते हैं। 

उन्हें आइकॉन मान कर अब तक तकरीबन सत्तर नक्सली सरेंडर कर चुके हैं। बस्तर में पहली बार सरेंडर के बाद नक्सलियों के परिवार बसाने के लिए नसबंदी खोलने की शुरुआत बदरन्ना से ही हुई थी। अब समर्पण करने वाले सभी नक्सलियों को इनके बारे में ज़रूर बताया जाता है।

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रमेश उर्फ़ बदरन्ना व उनकी पत्नी ने इस बात को समझा कि नक्सली रास्तों से कहीं बेहतर सुख शांति व लोकतंत्र का रास्ता होता है। हमें बुराई को त्याग कर अच्छाई की ओर कदम बढ़ाना चाहिए। इनकी ये सच्ची कहानी हमसे बस यही कहती है कि "आप कब बदलेंगे...?"

 

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