महिला कैदियों को रोजगार प्रशिक्षण देने वाली महाराष्ट्र की यह जेल देश के लिए बनी आदर्श

सम्मान के साथ जीवन जीना प्रत्येक व्यक्ति का हक है जिसे उससे कोई नही छीन सकता है। कई बार हालातों की मार इंसान को गुनाह के अँधेरे रास्तों पर छोड़ देती है लेकिन यह भी सच है उम्मीद की एक किरण उनका जीवन पूरी तरह से बदल सकती है उनके मन में सम्मान से जीने का जज़्बा जगा सकती है कुछ ऐसा ही नजारा देखने को मिला मुम्बई की एक जेल में अब वो दिन दूर नही जब भायकल्ला महिलाओं की जेल महाराष्ट्र में ऐसी पहली जेल बन जाएगी जहाँ पर कैदियों को उनके हुनर को तराशने और सम्मान का जीवन जीने के लिए अवसर प्रदान किये जायेंगे। इस जेल में बंद महिला कैदियों को कारखानों में काम सीखने और कमाई करने के लिए कारखानों में जाकर काम करने की अनुमति मिल सकती है जिससे की जेल से रिहा होने से पहले उन्हें रोजगार प्राप्त हो सकें जिससे की वे आत्मनिर्भर बन सकें।

साथ ही जेल के अधिकारियों ने यह भी कहा है कि वे जेल छोड़ने के बाद इन महिलाओं को नौकरी पाने में भी मदद करेंगे जिससे की ये महिलायें आत्मनिर्भर बने और दोबारा गुनाह के रास्ते पर ना चलें। अलग अलग कारखानों में  महिलाओं को भेजा जायेगा जिनमे ज्यादातर कारखाने वे है जहाँ नाइटगॉउन, मैक्सी आदि बनाये जाते है और कई मध्य-पूर्व और अफ्रीकी देशों को निर्यात किए जाते हैं।

पुलिस महानिरीक्षक (जेल) राज्यवर्धन सिन्हा ने बताया कि   "हम महिलाओं को रोजगार कौशल की तकनीक सिखाना चाहते है ताकि वे रिहा होने के बाद समाज में अपनी सम्मानजनक जगह पुनः प्राप्त करें। इसके लिए महिलाओं को जेल में ही प्रशिक्षण प्रदान किया जाएगा। इसके अलावा हम उन्हें रिहा होने के बाद नौकरियां दिलाने में भी सहायता करेंगे।"

रोजगार की इस पहल से ना केवल महिलाएं आत्मनिर्भर बनेंगी बल्कि उनका आत्मविश्वास भी बढेगा और जीवन के प्रति सकारत्मक्ता भी। 

eerf29vtpiqaaefeytwdx2hxudx4fnng.jpgफोटो  साभार - thetimeofindia.com

भायकल्ला जेल के अधीक्षक अरुणा मुगुतराव ने योजना के बारे में विस्तार से बात करते हुए कहा कि "प्रत्येक महिला को दिन में 10 गाउन सिलाई करना होगा जिसके लिए उसे 55 रुपये का भुगतान किया जाएगा और अगर वह इससे ज्यादा सिलाई करेगी तो अतिरिक्त भुगतान किया जायेगा। इतना ही नही इसके अलावा प्रत्येक महिला के लिए प्रति दिन 55 रुपये की राशि उसके खाते में जमा की जाएगी और 15 रुपये कैदियों के कल्याण निधि खाते में योगदान दिया जाएगा।"

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वर्तमान में ठाणे सेंट्रल जेल में एक कारखाना है जहां कैदी काम करते हैं और उन्हें उनके काम के अनुसार 55 रुपये प्रति दिन मिलते हैं जबकि जो कैदी अभी प्रशिक्षण प्राप्त कर रहें है उन्हें पारिश्रमिक के रूप में 45 रुपये प्रति दिन दिया जाता है।  शहर के ही उद्योगपति आशीष पोद्दार और उनके दामाद विवेक गादिया  जो की एक कपडा निर्यातक है और मुंबई वेस्टर्न एलिट के रोटरी क्लब से जुड़े हैं इस परियोजना में जेल अधिकारियों की मदद कर रहे हैं। वे बताते है कि "इससे पहले हमारे समूह ने महिला कैदियों को स्वच्छता नैपकिन प्रदान की थी और जेल में पानी के शुद्धिकरण संयंत्र स्थापित किए थे। अब हम इस विचार के साथ आए है कि आखिर महिलाएं जेल में क्या नया सीख सकती हैं और कमा सकती है जिससे की उनका भविष्य सुरक्षित हो सकें।" वर्तमान में भायकल्ला जेल में 420 महिलाएं और 25 बच्चे हैं। साथ ही ऐसी कई महिलाएं हैं जिनके रिश्तेदार उनकी  जमानत का भुगतान नहीं करते हैं तो कुछ लोगों के पास 1,000 रुपये से 5,000 रुपये भुगतान करने के लिए है ही नही ऐसे में यह योजना उन्हें पैसे बचाने और उनकी जमानत के लिए भुगतान करने में मदद करेगी।

वाक़ई देश की प्रत्येक जेल में इस तरह की योजनाओं का क्रियान्वयन किया जाए तो कैदियों की आय तो बढ़ेगी ही साथ ही वे दोबारा कभी जुर्म का रास्ता अख्तियार नही करेंगे और स्वाभिमान के साथ जीवन यापन कर सकेंगे।



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