IIT बॉम्बे की टीम कर रही है पश्चिमी घाट से ऊर्जा उत्पन्न करने की खोज, इससे देश में बिजली की समस्या दूर हो सकती है

अक्सर लोग भारत में मानसून का मज़ा लेने वेस्टर्न घाट जाते हैं। भारत के पश्चिमी तट पर स्थित पर्वत श्रृंखला को पश्चिमी घाट कहते हैं। दक्‍कनी पठार के पश्चिमी किनारे के साथ-साथ यह पर्वतीय शृंखला उत्‍तर से दक्षिण की तरफ 1600 किलोमीटर लम्‍बी है। विश्‍व में जैविक विविधता के लिए यह बहुत महत्‍वपूर्ण है और इस दृष्टि से विश्‍व में इसका 8वां स्थान है। 2012 में यूनेस्‍को ने पश्चिमी घाट क्षेत्र के 39 स्‍थानों को विश्‍व धरोहर स्‍थल घोषित किया था। वेस्टर्न घाट में अनेक पर्वत मालाएं स्थित हैं जैसे सतपुड़ा, सहयाद्रि, नीलगिरि और अन्नामलाई। यह गुजरात और महाराष्‍ट्र की सीमा से शुरू होती है जो गोवा, कर्नाटक, तमिलनाडु और केरल से होते हुए कन्‍याकुमारी में समाप्‍त हो जाती है। वेस्टर्न घाट इतनी दूर तक फैले हैं कि आप एक साथ पूरा नहीं देख सकते। हां यहां के कुछ टूरिस्ट स्पॉट्स हैं जिन्हें लोग बहुत पसन्द करते हैं और बरसात के दिनों में यहां की प्राकृतिक सुंदरता को निहारने खिंचे चले आते हैं। यहाँ के प्राकृतिक गर्म झरनों का भी अपना महत्व है। लोगों के बीच इसके चिकित्सीय और धार्मिक महत्त्व हैं। पर अब आईआईटी बॉम्बे और अन्य संस्थानों की टीम ने इससे बिजली पैदा करने के तकनीक की बात कही है. जो भारत के लिए बहुत बड़ा बिजली उत्पादन का स्रोत बन सकता है।

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महाराष्ट्र में पश्चिमी घाटों के प्रसिद्ध गर्म पानी के स्रोतों का अध्ययन करने वाली आईआईटी-बॉम्बे की अगुवाई वाली टीम ने किया है। उन्होंने पाया कि यह केवल पर्यटकीय या धार्मिक ही नहीं बल्कि वैज्ञानिक रूप से भी समृद्ध है। उन्होंने इसमें ग्रीन ऊर्जा के साथ-साथ नौकरियों के स्रोत के रूप में अपनी विशाल संभावनाओं की आशा जताई है। अशीम संभावना को देखते हुए आईआईटी-बॉम्बे में पृथ्वी विज्ञान विभाग के त्रिप्ती चंद्रशेखर और आईआईटी-हैदराबाद, राजीव गांधी पेट्रोलियम प्रौद्योगिकी संस्थान, अमेठी और फ्लोरेंस विश्वविद्यालय, इटली ने आपसी सहयोग से महाराष्ट्र के 350 किमी तक के पश्चिमी घाट के अध्ययन करने के लिए तैयार हुए हैं।

पश्चिमी तट भू-तापीय प्रांत (डब्ल्यूसीजीपी) नामक क्षेत्र भारत के सात भू-तापीय क्षेत्रों में से एक है। 18 स्थानों में 60 से अधिक गर्म पानी के झरने हैं, जहां खनिजों में खड़ी पानी 40 से 72 डिग्री सेल्सियस के बीच तापमान पाया जाता है। महाराष्ट्र और कोंकण क्षेत्र के गर्म पानी के झरनों की स्थानीय लोगों के लिए पेय जल के साथ-साथ औषधीय और धार्मिक महत्व का स्रोत भी है। शोधकर्ताओं के विश्लेषण ने महाराष्ट्र के तट पर भू-तापीय प्रणालियों की अत्यधिक गर्म करने की क्षमता का प्रमाण प्रस्तुत किया है और सुझाव दिए हैं कि इसका कॉमर्शियल उपयोग किया जा सकता है। इसके तहत पश्चिमी तट भू-तापीय प्रांत प्राकृतिक ग्रीनहाउस के रूप में कार्य करता है। इसी तरह के सिस्टम तुर्की, रूस, हंगरी, चीन और इटली में जगह पर हैं। खराब हो जाने वाले खाद्य उत्पादों के संरक्षण के लिए इकाइयां जो व्यापक रूप से पश्चिम एशिया और चीन के शेन्जेन क्षेत्र में उपयोग किया जाता है।

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शोधकर्ताओं के मुताबिक झरने की तीव्र गति वाले इस क्षेत्र में भू-तापीय ऊर्जा उत्पन्न करने के लिए ज़बरदस्त गुंजाईश है। अगर कुशलतापूर्वक उपयोग किया जाए तो इस गर्म पानी से बिजली उत्पन्न किया जा सकता है। ऐसा अनुमान लगाया जा रहा है कि भू-तापीय संसाधनों का उपयोग कर प्रतिदिन 10,000 मेगावाट बिजली बिजली उत्पन्न किया जा सकता है। 350 किलोमीटर की दूरी तक यह महाराष्ट्र के पालघर, रायगढ़ और रत्नागिरी जिलों के माध्यम से रैखिक रूप से बहता है। इसमें कैल्शियम, सोडियम, और क्लोरीन जैसे खनिज पदार्थ पाय जाते हैं। इसके अलावा इसमें आयन, ट्रेस और दुर्लभ पृथ्वी तत्व क्वार्ट्ज और चेलसेनी जैसे खनिज भी मौजूद हैं। यही कारण है कि इस पानी को औषधीय और उपचार के रूप में भी लोगों की मान्यता है।

वर्तमान में इन भू-तापीय जल को भारत में वाणिज्यिक उपयोग के लिए इस्तेमाल नहीं किया गया है। अभी इन गर्म झरनों का उपयोग केवल धार्मिक महत्व के स्थान या स्नान और सफाई के लिए होता है। अगर इसका उपयोग भू-तापीय ऊर्जा को उत्पन्न करने के लिए हुए तो ना केवल हमें ऊर्जा का स्रोत मिलेगा बल्कि भारत सरकार द्वारा कोयले के आयात में कटौती करने में भी मदद मिलेगी जिसका सीधा असर सरकार के बजट पर पड़ेगा। इससे देश को भूगर्भीय और जल विद्युत से बड़ी मात्रा में बिजली प्राप्त होगी और जीवाश्म ईंधन पर से निर्भरता कम हो जाएगी।

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