सड़क ही नहीं पानी के रास्ते पहुंचे एम्बुलेंस स्टॉफ, बचाई गर्भवती महिला और बच्चे की जान

दूरस्थ ग्रामीण क्षेत्रों की गर्भवती महिलाओं को बेहतर स्वास्थ्य सुविधा उपलब्ध कराने एवं घर से अस्पताल एवं अस्पताल से घर तक पहुंचाना किसी बड़ी चुनौती से कम नहीं है। अधिकांश दूरस्थ और ग्रामीण क्षेत्रों में प्राथमिक स्वस्थ्य केंद्रों की कमी है जिससे गर्भवती महिलाओं को ख़ासी दिक्कत का सामना करना पड़ता है। डॉक्टर हो या नर्स को लोग भगवान की संज्ञा देते हैं। और दें भी क्यों ना वो डॉक्टर ही होता है जो किसी मरते हुए व्यक्ति को भी नई ज़िन्दगी देता है। कभी-कभी स्थिति ऐसी होती है जब लोग मरीज़ के समीप जाने से भी कतराते हैं, वैसी स्थिति वह नर्स ही होती है जो उस व्यक्ति का इलाज़ से पहले उसके जख्मों को साफ करती है। पर आज के समय में यह भावनात्मक संबंध कहीं ना कहीं टूटता जा रहा है। अब डॉक्टरी बस एक पेशा मात्र बनकर रह गया है। डॉक्टरों के लिए अस्पताल अब सिर्फ एक व्यापार का ज़रिया है और मरीज़ उनके लिए सिर्फ एक ग्राहक होता है।  डॉक्टर और अस्पताल का नाम सुनते ही आज लोगों के मन में लंबे-चौड़े बिल और परेशानी का चित्र बनकर उभरता है। बहुत कम ही ऐसे अस्पताल और वहाँ के स्टाफ बचे है वो दिल से इस प्रोफेशन मानते हैं और सेवा भाव से लोगों का इलाज़ करते हैं। पर आज एक नर्स और एम्बुलेंस ड्राइवर की बात करने जा रहें हैं जिन्होनें रास्ते में आयी हर कठिनाई को पार कर एक गर्भवती महिला की बचाई।

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इनका नाम है के. रोजा और एम अरुण कुमार। रोजा तमिलनाडु में कोयम्बटूर के मेट्टूपालयाम गवर्मेंट हॉस्पिटल में इमरजेंसी मेडिकल टेक्नीशियन और अरुण इमरजेंसी एम्बुलेंस के ड्राइवर के तौर पर काम करते हैं। दोनों नें दूरस्थ ग्रामीण इलाके में तड़प रही महिला मरीज तक पहुंचने के लिए हर मुसीबत को पार किया और उस गर्भवती महिला की जान बचाई। दरअसल, हुआ ये था कि  कोयंबटूर के गंधवायाल के निकट स्थित गांव सिरमुगई के रहने वाले ननजप्पन की गर्भवती पत्नी कविता को सुबह के 5:15 पर लेबर पेन हुआ, तो उन्होंने फौरन 108 पर एंबुलेंस को फ़ोन किया। सब लोग जानते हैं कि लेट-लतीफ़ी के लिए प्रसिद्ध एंबुलेंस कभी टाइम पर नहीं पहुंचती है, लेकिन इस बार ऐसा नहीं हुआ। जब एंबुलेंस श्रीमुगाई के पास के गांव में पहुंची, तो बारिश की वजह से वो रास्ता जाम था। इस रास्ते से एम्बुलेंस को ले जाना नामुमकिन था। इसके चलते एंबुलेंस को थोड़ी दूर पर खड़ा करके रोज़ा और अरुण ने दूसरे रास्ते से जाना चाहा तो पैदल जाना भी  बहुत मुश्किल था और समय भी लगता। पर दोनों नें हार नहीं मानी और वापस लौटने की जगह किसी भी हालत में मरीज़ तक पहुँचने का फैसला किया।

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उन्होंने चेक पोस्ट से करीब आधे किलोमीटर पहले एम्बुलेंस को खड़ा कर दिया। इसके बाद उन्होंने एक नाव के सहारे पानी को पार किया लेकिन इसके बाद भी रास्ता बहुत खराब था। दोनों नें कुछ देर के लिए एक सज्जन से उनकी मोटरसाइकिल माँगी और कविता की घर की ओर चल दिये। जब तक वो नर्स और ड्राइवर पहुंचे तबतक कविता की डिलीवरी हो चुकी थी, और उसने एक लड़के को जन्म दिया था। रोज़ा से फौरन उपचार शुरू किया और प्राथमिक सहायता की। रोजा ने बच्चे का अम्बलीकल कॉर्ड यानि नाभि रज्जू काट दिया। बच्चे के हाथ पैर नील पड़ रहे थे ऐसे में उसे फौरन अस्पताल ले जाना जरूरी थी। उधर कविता का भी काफी खून बह चुका था और उसका भी शरीर कमजोर हो गया था। अगर वो इंतज़ार करते तो ख़तरा हो सकता था, क्योंकि बच्चे के हाथ और पैर नीले पड़ने लग गए थे। वे फौरन बच्चे को लेकर अस्पताल के लिए निकल गए।

अब मां और बच्चा दोनों ठीक है। बच्चे को अभी और ट्रीटमेंट की ज़रूरत है इसके लिए उसे मेट्टूपालयाम गवर्मेंट हॉस्पिटल में रखा गया है और डिलीवरी के समय कविता का काफ़ी का खून बह गया है इसलिए उसे कोयम्बटूर मेडिकल कॉलेज हॉस्पिटल भेजा गया है। रोजा और अरुण अगर हर मुश्किलों को पार कर कविता तक नहीं पहुंचते तो शायद माँ और बच्चे दोनों को बचा पाना मुश्किल था।

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