कभी सरकारी बसों में सफाई करने वाला शख्स आज एशियन पैरा गेम्स में गोल्ड जीतकर रच दिया इतिहास

हमारे किसी अंग में विकलांगता सिर्फ शारीरिक तौर पे विकलांग बनाते हैं जबकि मानसिक विकार एक अच्छे भले इंसान को किसी काम का नहीं छोड़ते। कहते हैं इंसान शारीरिक रूप से भले ही अपंग हो जाए, लेकिन उसकी सोच अपंग नहीं होनी चाहिए। क्योंकि शारीरिक रूप से अपंग व्यक्ति फिर भी अपने हौसलों से सारे जहाँ को जीतने की क्षमता रखता है, पर अगर किसी की सोच ही विक्षुद्ध हो जाए तो वह जीवित होकर भी एक मृत प्राणी की भाँति होता है। कई बार एक सामान्य व्यक्ति को भी परिस्थितियाँ अपंग व विकलांग बना देती है। समाज में शारीरिक रूप से अक्षम या दिव्यांग लोगों को एक अलग ही नज़रिये से देखा जाता है। कहीं न कहीं एक साधारण व्यक्ति के मन में ऐसे लोगों के प्रति नकारात्मक भावना होती है। और इसी नकारात्मक सोच के कारण ऐसे दिव्यांगों के मन में एक कुंठा का भाव पैदा हो जाता है। पर ऐसा कदापि नहीं है कि शारीरिक रूप से अक्षम व्यक्ति में प्रतिभा की कोई कमी होती है।

आज हम आपको एक ऐसे ही दिव्यांग शख्स के बारे में बताने जा रहे हैं जो कभी सरकारी बसों में सफाई करते थे और आज इतिहास रचते हुए जकार्ता में हुए पैरा एशियन गेम्स में पुरुषों की 100 मीटर T35 में गोल्ड मेडल जीता है।

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इनका नाम है नारायण ठाकुर। उत्तर पश्चिम दिल्ली के झुग्गियों में रहने वाले 27 साल के नारायण ठाकुर जन्म से ही दिव्यांग हैं।ठाकुर को बाएं तरफ की हेमी पैरेसिस की समस्या है। यह एक ऐसी समस्या है जिसमें दिमाग में स्ट्रोक के कारण बाएं तरफ के अंगों में लकवा मार जाता है। जकार्ता में चल रहे एशियन पैरा गेम्स में 100 मीटर T 35 स्पर्धा में गोल्ड मेडल जीतकर इन्होंने इतिहास रचने का काम किया है। नारायण का जन्म मूलतः बिहार में हुआ। दिल की बीमारी के चलते मेरे पिता को दिल्ली शिफ्ट होना पड़ा। कुछ वर्षों बाद उन्हें ब्रेन ट्यूमर हो गया और इसी बीमारी ने उनकी जान ले ली। महज आठ साल की उम्र में उनके पिता का निधन हो गया था जिसके बाद अगले 8 साल उन्होंने एक अनाथ आश्रम में गुजारे। नारायण के पिता प्लास्टिक फैक्टरी में काम करते थे। पिता की मौत के बाद उनकी मां के लिए तीन बच्चों को पालना काफी मुश्किल हो गया जिसकी वजह से उन्होंने नारायण ठाकुर को दरियागंज के एक अनाथालय में दाखिल करा दिया।

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अनाथालय में नारायण को दो वक्त का खाना और पढ़ने को मिल जाता था। ठाकुर बचपन से क्रिकेट खेलना चाहते थे लेकिन ऐसा हो नहीं पाया। लोग यह कहकर उन्हें खेलने नहीं देखे थे कि तुम विकलांग हो ये खेल तुम्हारे लायक नहीं है। 2010 में उन्होंने अनाथालय छोड़ दिया ताकि वो खेल के दूसरे विकल्पों की तलाश कर पाएं। उनका अनाथालय छोड़ देना परिवार के लिए काफी दुखद था। क्योंकि उनकी आर्थिक स्थिति बहुत दयनीय थी। वहां से निकलने के बाद अपना पेट पालने के लिए डीटीसी की बसें साफ करने का काम किया और सड़क किनारे ठेलों पर वेटर का काम भी किया। इन विपरीत परिस्थितियों में भी उन्होंने खुद को नहीं टूटने दिया और आगे चल कर एक मिसाल कायम की।

ठाकुर की जिंदगी में तब बदलाव आया जब किसी ने उन्हें जवाहरलाल नेहरू स्टेडियम में एथलेटिक्स की प्रैक्टिस करने की सलाह दी। लेकिन समस्या यह थी कि घर से स्टेडियम तक जाने के लिए मेरे पास पैसे नहीं थे। स्टेडियम तक पहुंचने के लिए उन्हें तीन बस बदलने पड़ते थे। तब उन्होंने अपना ठिकाना पानीपत बदलने की कोशिश की। लेकिन यह भी नहीं हो सकता, क्योंकि उनके पास बस टिकट के लिए 40 से 50 रुपये नहीं थे। तब वे अपनी ट्रेनिंग के लिए त्यागराज स्टेडियम शिफ्ट हो गए। उन्होंने अपने खेल पर काफी मेहनत की। लोगों ने उनके काम की काफी तारीफ भी की और कुछ अंतरराष्ट्रीय प्रतियोगिताओं में भी उन्होंने अपने प्रदर्शन से लोगों को प्रभावित किया। इसके बाद जकार्ता खेलों में जाने का रास्ता तैयार हुआ।

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आज नारायण एशियन पैरा गैम्स या एशियाड में 100 मीटर में गोल्ड जीतने वाले इकलौता भारतीय हैं। नारायण के इस सफलता को खुद पीएम मोदी ने भी सम्मानित किया और उन्हें 40 लाख रुपये का चेक दिया। वे इन पैसे का इस्तेमाल अपनी ट्रेनिंग पर और कुछ अपने घर वालों पर करना चाहते हैं।




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