तमिलनाडु के दो गाँव जहाँ दशकों से नहीं मनाई जाती दिवाली, वजह है बेहद प्रेरणादायक

भारत देश में एक कहावत बहुत प्रचलित है "सात वार और नौ त्यौहार" इसलिए तो हमारे देश को त्योहारों का देश कहा जाता है। दशहरा, होली, दीपावली ऐसे त्यौहार हैं जिनका हर देशवासी को बेसब्री से इंतजार रहता है और ऐसे में बात अगर दीपावली की हो तो रौशनी का यह उत्सव बच्चे बड़े बूढ़े सभी के चेहरों पर रौनक ले आता है। शायद ही देश का कोई कोना हो जो दीपावली के उत्साह से अछूता रहता हो लेकिन हमारी आज की कहानी इस बात को गलत साबित करती है। एक तरफ जहाँ खुशियों की सौगात दीपावली का इंतज़ार हर भारतीय को रहता है जगमग जलते दीपक, ढेर सारी मिठाईयाँ और पटाखों की गूंज के साथ पूरा देश हर्षोल्लास के माहौल में डूब जाता लेकिन वहीं दूसरी तरफ तमिलनाडु में स्थित दो गांव ऐसे भी हैं जहां दिवाली के दिन भी अंधेरा ही पसरा रहता है वहाँ न उत्सव होता है और न ही पटाखों की गूंज सुनाई देती है। यहाँ दीपावली का दिन एक आम दिन की तरह ही गुजरता है। लेकिन इसके पीछे की वजह है बेहद प्रेरणादायक।

जब पूरा देश दीपावली मनाता है तो तमिलनाडु के शिवगंगा ज़िले के एस मामपट्टी और कोलुकुड्डीपट्टी गांव में जिंदगी आम दिन की तरह ही चलती है। ऐसा इसलिए है क्योंकि कोलुकुड्डीपट्टी के पास ही वेट्टनगुड़ी बर्ड सेंचुरी है पक्षियों को नुकसान ना पहुंचे इसलिए गाँव में बाशिंदे पटाखे नहीं छोड़ते हैं। इस गांव के लोगों को पक्षियों से बहुत लगाव है वो उन्हें अपना साथी मानते हैं और जानते हैं कि पटाखों की तेज़ आवाज़ से उन्हें परेशानी होती है। इसलिए इस गांव के लोगों से कुछ सालों से नहीं बल्कि कई दशक से दीपावली पर पटाखों का इस्तेमाल करना बंद कर दिया है।

ugu4qflpykv9quvty2r74ngdckzwcgh9.jpgफोटो साभार - द लॉजिकल इंडियन 

ज़िले में कार्यरत वन अधिकारी संपथलाल गुप्ता की माने तो " यहां अक्टूबर और मार्च के बीच ग्रे होर्न्स , डार्टर्स, स्पूनबिल्स ,एशियन ओपन बिल स्ट्रोक, लिटिल कॉर्मोरेंट, फ्लेमिंगो आदि पक्षी आते हैं।"

लेकिन दूसरी तरफ एस मामपट्टी गांव की दास्तां बिलकुल हटके है इस गाँव में सालों पहले दीपावली मनाई जाती थी लेकिन एक दौर ऐसा आया की गांव के लोग दीपावली मनाने के लिए महाजनों से पैसे उधार लेने शुरू कर दिए। मगर उसका ब्याज न चुका पाने के चलते लोग कर्ज़ के बोझ के तले दबने लगे, कर्ज बढ़ता गया और खुशियां कम होने लगी।

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बढ़ते कर्ज से परेशान गांव वालों ने मिलकर एक रोज अपनी कुलदेवी के सामने कभी भी दिवाली न मनाने का प्रण ले लिया और तब से लेकर अब तक कभी दीपावली नहीं मनाई गयी। इस गांव में 1958 से आज तक दीपावली का त्यौहार नहीं मनाया जाता। यहाँ दीपावली आम दिन की तरह ही गुजर जाती है। सुनने में यह कहानी बहुत अलग लगती है लेकिन यह सच है कि इस गाँव के लोग आज भी 1958 में लिए गये अपने प्रण को पीढ़ी दर पीढ़ी निभा रहे हैं। अब यह प्रण इस गाँव की परम्परा का हिस्सा बन गया है।

हमारे देश की यही ख़ासियत है कि  कदम कदम पर कुछ नए किस्से हैं, कहानियां है, परम्परा है और इन सब से मिलकर बनता है महान भारतवर्ष।

 

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