7 वर्षीय बेटी की माँ ने चलाया अनोखा अभियान सेल्फडिफेंस को बनाना चाहती है पाठ्यक्रम का अनिवार्य अंग

आज की महिलाएं अपने हक के लिए लड़ना जानती है जिसका उदहारण मी टू  कैंपेन  के माध्यम से हम सबके सामने है आज जहाँ एक ओर बड़े बड़े दिग्गजों की रातों की नींद और दिन का चैन खो चुका है वही महिलाओं ने अपनी बहादुरी का परिचय देकर आत्मविश्वास के साथ अपनी बात को अपने साथ हुई ज़्यादतियों के बारे में दुनिया के आगे खुलकर अपनी बात कही है। मी टू कंपेन की आंच ने जहाँ नेता ,अभिनेता ,निर्माता ,निर्देशक ,लेखक ,गायक सभी को अपनी चपेट में लिया है वही दूसरी तरफ दुर्गा पूजा के अवसर पर महिलाओं के आत्मविश्वास को भी बढ़ाया है। इससे एक बात तो साबित हो गयी की अगर महिला अपनी पर आजाये तो उसके लिए नामुमकिन कुछ भी नही है।

आज हर दिन हम महिलाओं और यहां तक कि बच्चों पर भी यौन उत्पीड़न के बारे में सुनते है जिससे हमारा सर शर्म से झुकने लगता है। लेकिन अब अत्याचारों से लड़ने के लिए महिलाओं ने भी कमर कस ली है जिसका जीत जगाता उदहारण है महाराष्ट्र की नेहा श्रीमाल  जो की एक आत्मरक्षा कोच है उन्हें तायक्वोंडो में ब्लैक बेल्ट हासिल है और इतना ही नही वे 7 वर्षीय बेटी की मां है और वे चाहती है की उनकी बेटी हिम्मत और साहस के साथ जिए और हर खतरे का मुकाबला खुद करे। नेहा पिछले कई समय से स्कूल पाठ्यक्रम में आत्म-रक्षा की पद्धतियों को शामिल करने के लिए प्रचार कर रही है ताकि बच्चे स्कूल में सेल्फडिफेंस की आधारभूत तकनीकों के बारे में सीख सकें।

नेहा ने स्कूल शिक्षा और खेल विभाग महाराष्ट्र राज्य मंत्री को दी गयी याचिका में नेहा ने निम्नलिखित बातों की तरफ ध्यान दिलाते हुए लिखा कि -
"जनवरी 2018 - हरियाणा के जिंद में 15 साल की लड़की के साथ क्रूरता से बलात्कार किया गया। उसके बाद मार्च 2018 में  बंगाल के बीरभूमि के रहने वाली 18 वर्षीय लड़की को परेशान करने वाले तीन लोगों की शिकायत वो पुलिस में करती है और उन्हें पकड़वाती है। क्योंकि बीरभूमि की वह लड़की पिछले 10 महीनों से मार्शल आर्ट सीख रही थी। उस लड़की से हमें यह सीख मिलती है की  लड़कियों को अपने आप को भयभीत, पीड़ित और असहाय महसूस करने के बजाय आत्मविश्वास के साथ ऐसी परिस्थितियों का सामना करने में सक्षम होती है।

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आज स्थिति यह है की भारत में 53% से अधिक बच्चों को यौन शोषण का सामना करना पड़ता है और जब भी ऐसी कोई घटना होती है हम केवल मदद के लिए पुलिस और कानूनी व्यवस्था की तरफ  देखते हैं। लेकिन हमें ये मानना होगा की हम खुद ऐसी परिस्थियों से लड़ने में सक्षम है।

नेहा बताती है कि " सेल्फडिफेंस के गुण कक्षा 5 से ही स्कूलों में पढ़ाया जाना चाहिए जिससे बच्चे अपनी रक्षा कर सकते है ऐसा मानस बना सकें।अवांछित तत्वों और किसी भी खतरे से निपटने के लिए मानसिक, शारीरिक और मनोवैज्ञानिक तैयारी बेहद जरूरी है। इसलिए आत्मरक्षा को स्कूलों के पाठ्यक्रम में अनिवार्य करना चाहिए।"
अभी तक नेहा का अभियान महाराष्ट्र में ही संचालित है लेकिन उनका लक्ष्य इस अभियान को देश के बाकी हिस्सों तक भी पहुँचाना है।

अपनी याचिका में उन्होंने बताया कि "  इस प्रशिक्षण को प्रदान करने के लिए आंतरिक शारीरिक शिक्षा शिक्षकों और खेल शिक्षकों को प्रशिक्षित किया जा सकता है। एक अवधि में आत्मरक्षा तकनीक सीखने के बाद, वे बच्चों को सिखाये जिससे बच्चे / किशोर न केवल खुद को बचाने में सक्षम होंगे, बल्कि उनके आसपास के अन्य लोगों को भी बचाएंगे।"

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अगर एक नजर बंगाल सरकार की तरफ डाले तो उन्होंने अंडरग्रेजुएट कॉलेजों में सालाना 3 सप्ताह की आत्मरक्षा कार्यशालाएं लॉन्च की हैं। साथ ही पुणे में एक कॉलेज पहले से ही इस दिशा में सक्रिय कदम उठाया जा चुका है आत्मरक्षा उस कॉलेज के पाठ्यक्रम का अनिवार्य हिस्सा है। अगर इस तरह की विचारधारा पर पूरा देश सहमत हो जाए तो वो दिन दूर नही महिलाओं और बच्चों पर होने वाले अत्याचारों से वो खुद ही लड़ने के काबिल बनेंगे और साथ ही हमारे समाज में पनप रही ऐसी विकृत मानसिकता को जड़ से उखाड़ फेकेंगे।



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