पैसों की कमी के कारण छोड़ी थी पढ़ाई अब पाठ्यपुस्तकों को मुद्रण के लिए दान की राशि

आज के समय में शिक्षा कितनी आवश्यक है इस बात से हम सभी परिचित है। शिक्षा ही एक ऐसा हथियार है जो हमें विकास के पथ पर अग्रसर होने के लिए उत्साहित रखता है। लेकिन आज भी हमारे समाज में कई लोग है जो पढ़ना तो चाहते है लेकिन उनके पास इतनी सुविधा नही है की अपनी पढ़ाई सुचारू रख सकें उन लोगो को समाज की मुख्यधारा से जोड़ने का केवल एक विकल्प है शिक्षा। हमारी आज की कहानी एक ऐसे व्यक्ति की है जो शिक्षा के क्षेत्र में अपना अभूतपूर्व योगदान दे रहे है लेकिन सबसे आश्चर्य की बात है की एक समय था जब उन्हें आर्थिक संकट के चलते अपनी पढ़ाई को बीच में ही छोड़ना पड़ा।

हम बात कर रहें है कोझिकोड के रहने वाले एक किसान 89 वर्षीय सी. के. नारायण पानिकर की जो पढ़ना तो चाहते थे लेकिन आर्थिक स्थिति ठीक नही होने के कारण वे अपनी पाठ्यपुस्तकें नही खरीद पाते थे जिसके चलते उन्हें मजबूर होकर अपनी पढ़ाई को अलविदा कहना पड़ा लेकिन साथ ही एक संकल्प भी लिया की वो हर उस बच्चें की सहायता करेंगे जो पढ़ना चाहता है ।

वर्तमान में नारयण आदिवासी छात्रों के लिए पाठ्यपुस्तकों को मुद्रित करने के लिए कई बाद धन दान करते है। कोझिकोड के इडुक्की में जनजातीय छात्रों की शिक्षा के लिए नारायण ने 40,000 रुपये का योगदान दिया है। नारायण पानिकर ने कार्यकारी संपादक पी. आई. राजीव के उपस्थिति में मथुभूमी संयुक्त प्रबंध संपादक पी.वी. निधिश को जनजातीय बच्चों के लिए किताबों के मुद्रण हेतु यह राशि प्रदान की है।

इस पैसे से इडुक्की के इदामालक्कुड़ी में सरकारी जनजातीय एल.पी. स्कूल के छात्रों के लिए मुथुवन उनकी आदिवासी भाषा में पाठ्यपुस्तक 'इदामलक्कुड़ी गोथरा पदवली' को मुद्रित किया जायेगा जिससे बच्चे अपनी भाषा में पढ़ पाएंगे। केरल राज्य  में स्थित इदामालक्कुड़ी एकमात्र जनजातीय पंचायत है जहाँ काफी अधिक संख्या में आदिवासी निवास करते है और उनके बच्चों की शिक्षा के लिए नारायण का यह प्रयास बहुत सराहनीय है जो उन्हें समाज की मुख्यधारा में जोड़ने में सहायक होगा ।
नारायण ने मथुभुमी के एक दैनिक समाचार पत्र में पढ़ा की स्थानीय भाषा के पाठ की पांडुलिपि को मुद्रित करने के लिए वित्तीय सहायता की आवश्यकता है। मुथुवन जनजातीय भाषा में कोई लिपि नहीं है इसलिए पुस्तक मलयालम लिपि में लिखी गई थी। नारायण पनिकर ने खबरों पर ध्यान दिया और मदद के लिए हाथ आगे बढ़ाया। नारायण ने कार्यकारी संपादक पी. आई. राजीव की उपस्थिति ने 40000 रु की राशि इदामलक्कुड़ी सरकारी जनजातीय एल.पी. स्कूल के हेडमास्टर आर. रविचंद्रन को प्रदान की जिसके बाद हेडमास्टर ने बच्चों और जनजातीय लोगों की तरफ से नारायण के प्रति कृतज्ञता व्यक्त की।

hgkkgd6gwwhw3ge7yl9pxmpinvbcx5yv.jpgफोटो साभार - मातृभूमि 

नारायण की अपनी शिक्षा भले ही पूरी नही हो पाई लेकिन जनजातीय बच्चों की शिक्षा पूर्ति के लिए उन्होंने हो प्रयास किया है उससे ना जाने कितने बच्चों के सपने साकार हो जाएंगे।

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