जीडी अग्रवाल: एक योद्धा जिसने ऐशोआराम की जिंदगी छोड़ गंगा के लिए अपना जीवन समर्पित कर दिया

भारत में पर्यावरणविदों की बातों को नज़रअंदाज़ किया जाता रहा है और किसी को उनकी परवाह नहीं रही है। गंगा की अविरलता को बरक़रार रखने के लिए लंबे समय से आन्दोलन करने वाले डॉ जीडी अग्रवाल की मौत के बाद एक बार फिर यह क्रूर सत्य सामने आया है। वह शख्स जिन्होंने गंगा की सुरक्षा के लिए 111 दिन के उपवास के बाद उन्होंने अस्पताल के रास्ते में ही दम तोड़ दिया और इस उपवास के पीछे का एकमात्र लक्ष्य था "गंगा को बचाना"।

उत्तर प्रदेश के एक छोटे से कस्बे कांधला में जन्मे जीडी अग्रवाल का आईआईटी प्रोफेसर से लेकर एक गंगा सेवक बनने तक का सफ़र बेहद प्रेरणादायक है। रुड़की स्थित भारतीय प्रोद्योगिकी संस्थान से सिविल इंजीनियरिंग में स्नातक करने के बाद उन्होंने यूपी के सिंचाई विभाग में एक इंजीनियर के रूप में अपने करियर की शुरुआत की। कुछ समय तक नौकरी करने के बाद वो आगे की पढ़ाई के लिए आईआईटी कानपुर चले गए। विदेश से पीएचडी करने के बाद लौटने के बाद वो कानपुर आईआईटी में ही सेवाएं देने लगे। जब भारत सरकार ने साल 1974 में केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड की स्थापना की, तो डॉ अग्रवाल को उनके पहले सदस्य सचिव के रूप में चुना गया। वह पिछली यूपीए सरकार में राष्ट्रीय गंगा नदी बेसिन अथॉरिटी में भी सेवाएं दी। साल 2012 में उन्होंने शरीर की अक्षमता का हवाला देते हुए इस्तीफा दे दिया।

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फ़ोटो साभार: इंडियन एक्सप्रेस

वापस अपने गाँव लौटने के बाद उन्होंने पर्यावरण से जुड़ी कुछ संस्थाओं के साथ मिलकर प्रदूषण की जांच करने वाले उपकरण भी बनाए। साथ ही कुछ समय चित्रकूट स्थित महात्मा गांधी ग्रामीण विश्वविद्यालय में सेवाएं देने के बाद वे साल 2008 में पूरी तरह से गंगा के पुनर्जीविनीकरण अभियान से जुड़ गए। पिछले चार दशकों से, उनका ध्यान गंगा के 'अबीरल धार' (निर्बाध प्रवाह) की रक्षा करना था। उनका मानना था कि यह न केवल नदी के अस्तित्व के लिए महत्वपूर्ण था बल्कि नदी के किनारे बसे जन-जीवन के लिए भी। उन्होंने गंगा के तटों पर हो रहे अवैध खनन और उस पर बनने वाले अवैध बांध को रोकने के लिए हमेशा संघर्ष किया।

गांधीवादी विचारधारा में विश्वास रखने वाले डॉ अग्रवाल ने अक्सर अपना विरोध जताने के लिए उपवास का ही साधन चुना। उन्होंने गंगा संरक्षण के लिए अब तक पांच उपवास किए। यह उनकी सबसे लंबी और अंतिम तपस्या थी। साल 2008 में, वह पहली बार सभी मौजूदा निर्माणाधीन परियोजनाओं को बंद करने के अलावा, भागीरथी नदी, गंगा की मुख्य सहायक नदियों में जल विद्युत परियोजनाओं के प्रस्तावित निर्माण के विरोध में बैठे थे।

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फ़ोटो साभार: पूर्णपरमपति डॉट इन

डॉ अग्रवाल का मानना था कि वर्तमान परिदृश्य में विकास को भौतिकता और भोग के पैमाने से नापा जा रहा है, जो गलत है। विकास में भोगवाद की तलाश से पर्यावरण सुरक्षित नहीं रह सकता है।  

दुर्भाग्य से डॉ अग्रवाल आज हमारे बीच नहीं हैं लेकिन पर्यावरण के प्रति उनका समर्पण और ख़ास कर गंगा के पुनर्जीवन में उनके योगदान को कभी भुलाया नहीं जा सकेगा। उन्हें यही सच्ची श्रद्धांजलि होगी, जब देश का हर एक नागरिक पर्यावरण की रक्षा के लिए प्रेरित रहेगा।

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