अपने दोनों हाथ खोने के बाद भी हौसला नही खोया और आज है टेबल टेनिस के जाने माने कोच

ये राहें ही लेकर जाएंगी मंजिल तक हौसला तो रख सुना है कभी अँधेरे ने सवेरा नही होने दिया। जीवन में कामयाबी यूँ ही नही मिलती है उसके लिए कड़ी मेहनत करनी पड़ती है विपरीत हालातों का सामना करना होता है मन को मजबूत बनाना पड़ता है एक उम्मीद मन में जगानी पड़ती है तब जाकर मंजिल का सफ़र तय किया जा सकता है। दुनिया में कुछ एेसे लोग होते हैं जो अपनी हिम्मत आैर कामयाबी से इतिहास रच देते है और दूसरों के लिए एक प्रेरणा बनकर उनका मार्ग प्रशस्त करते है। आज हम आपको एक एेसे ही शख्स से रूबरू करवाने जा रहें हैं जिनके जीवन में हार शब्द को कोई जगह नही है उनका नाम है काजल डे

त्रिपुरा की राजधानी अगरलता के रहने वाले काजल डे को  संघर्षों के दौर से गुजर कर सफलता मिली है । काजल डे दिव्यांग है लेकिन वे जन्म से दिव्यांग नही थे एक भीषण हादसे में अपने दोनों हाथ गवां बैठे थे। लेकिन उन्हाेंने कभी हार नहीं मानी आैर मंजिल की तरफ आगे बढ़ते रहें उनके आत्मविश्वास का ही परिणाम है की आज काजल डे टेबल टेनिस के जाने माने खिलाडी है। उनका पूरा जीवन संघर्षो की एक दास्तां है जिसके बारे में बात करते हुए काजल डे बताते है कि " उस समय मेरी उम्र 21-22 साल थी और मेरे में ज्यादा समझ भी नहीं थी। मेरे पिता सरकारी अस्पताल में ड्राइवर की नौकरी करते थे लेकिन एक दिन अचानक पिता राजेन्द्र चन्द्र डे का साया मेरे सिर से उठ गया जिसने मेरे परिवार को एक सदमा सा दे दिया पापा के जाने के बाद मेरी नौकरी अगरतला के सरकारी विद्युत विभाग में लग गई, लेकिन नौकरी में मेरा ज्यादा मन नहीं लगता था। उस दौरान मैं राजनीतिक पार्टी सीपीएम के लिए काम करता था। जवानी का जुनून सिर चढ़कर बोल रहा था। लोग मुझसे डरते थे हम बम बनाने का काम भी करते थे तभी एक दिन बम बनाते वक्त वह फट पड़ा, जिससे मेरे हाथों के चीथड़े उड़ गए। चार महीने अस्पताल में मेरा इलाज चला। मुझे इस बातका जिंदगी भर अफसोस रहेगा कि जिन लोगों के लिए मैं जान पर खेल जाया करता था उन्होंने मेरी कोई मदद नहीं की। इस हादसे ने मेरी आँखे खोल दी।"

काजल डे का बुरा समय यही नही थमा कुछ समय बाद एक के बाद एक दुखों का पहाड़ उन पर टूट पड़ा थोड़े समय बाद उनकी मां भी चल बसी तीन भाई और तीन बहनें थी। लेकिन कुछ ही समय बाद डायबिटीज़ ने उनके दोनों बड़े भाइयों को भी उनसे छीन लिया। काजल डे बताते है कि " इस दौरान खेल में मुझे  दोबारा जीने की उम्मीद नजर आई। मैं कई दिन निराश रहा लेकिन खेल ने मुझे नई ऊर्जा से भर दिया। उसके बाद सोचा कि अब नई शुरुआत करूंगा और मैंने टेबल टेनिस खेलना शुरू किया। अपनी गलतियों पर अफसोस मुझे आज भी सताता  है, लेकिन ज़िंदगी के लिए मेरा उत्साह इस खेल ने मुझे लौटा दिया।"

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साल 1992 में  पुणे में डॉक्टर श्याम भादुड़ी ने भगवान बनकर 5 महीने 17 दिन तक काजल डे का उपचार किया और किसी तरह से उनका दायां हाथ बना दिया जिससे की वे टेबल टेनिस खेलते है। उसके बाद साल 1993 से काजल डे ने टेबल टेनिस खेलना प्रारंभ किया और फिर दोबारा कभी पीछे मुड़कर नही देखा वे पिछले तीन साल से अगरतला में अंतर विभागीय टेबल टेनिस खेल रहे है। साथ ही उन्होंने अगरतला में एक मल्टीनेट टेबल टेनिस सेंटर बनाया है। पूरे त्रिपुरा में ऐसा सेंटर किसी के पास नहीं है। मल्टीनेट में खिलाड़ियों को तीन तरह की गेंदों फास्ट, मीडियम और स्लो गेंदों पर अभ्यास करना होता है।

gu5cgb7ug8wikzf6heynzbqtg8bafisy.jpgफोटो साभार - इंडियन एक्सप्रेस 

काजल कहते है कि "मैं अपने सेंटर के बच्चों से इतना ज्यादा अभ्यास कराता हूं कि वे थककर चूर हो जाते हैं और मुझसे कहते हैं,  'आप हिटलर हो'।

कड़ी मेहनत का ही परिणाम है कि मेरी शिष्याओं ने राष्ट्रीय टेबल टेनिस में त्रिपुरा को चार पदक दिलवाए हैं। मौमिता शाह, औरित्रा पाटारी, कल्याणी डे (मेरी बेटी) आज देश की टॉप रैंकिंग के टेबल टेनिस खिलाड़ी हैं। लड़कों में अर्धजीत चौधरी, अपूर्व दास, जयंत डे, अर्जित डे ने भी राष्ट्रीय स्पर्धा में त्रिपुरा का नाम चमकाया है। इस बात का मुझे गर्व है। काजल डे कुछ दिनों पहले इंदौर में 22 से 25 मार्च तक आयोजित पहली राष्ट्रीय पैरा टेबल टेनिस चैम्पियनशिप में भाग लेने के लिए अगरतला (त्रिपुरा) से आए थे लेकिन काजल डे को इस बात का मलाल है कि सही क्वालिफिकेशन न होने की वजह से वे पहले ही दौर में हार गए।

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काजल ने कहा कि " यदि मुझे राष्ट्रीय स्पर्धा में सही क्वालिफिकेशन मिलता तो मैं अपने वर्ग में यहां से रजत पदक लेकर लौटता। चूंकि मेरे दोनों हाथ नहीं हैं, लिहाजा मैं विमान से एक सहयोगी के साथ इंदौर पहुंचा और इसमें 37 हजार 700 रुपए खर्च हो गए। यदि ट्रेन से आता तो यहां तक आने में 7 दिन का वक्त लग जाता...स्पर्धा की तैयारी के लिए 2 महीने पहले ही मैंने 8000 रुपए का नया बैट खरीदा था। मेरा यह निवेश भी पानी में चला गया। पर कोई बात नही आज नही तो कल मैं बेहतरीन प्रदर्शन कर मेडल अपने नाम जरूर करूँगा। साथ उन्होंने कहा कि वर्तमान समय में त्रिपुरा के हालात इतने खराब हैं कि सीपीएम नेता टेबल टेनिस के कोच बने बैठे हैं। मैं चाहता हूं कि अपने अनुभव का लाभ बच्चों को दूं, ताकि और अधिक प्रतिभाएं राष्ट्रीय नक्शे पर त्रिपुरा का नाम रोशन करें। मेरा सरकार से अनुरोध है की वे बच्चों को उचित साधन सुविधा उपलब्ध करवाये जिससे की बच्चों का टीटी के प्रति उत्साह बढे।"

वाक़ई काजल डे मुसीबतों से लड़कर जिस तरह से आगे बढे है वो बहुत ही प्रेरणादायक है और एक नए उत्साह और उम्मीद को जन्म देते  है।




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