जूठन से बायोगैस तैयार कर मुंबई में लोग पका रहे हैं भोजन, हर दिन होती है 250 रुपये की बचत

पर्यावरण का बदलता स्वरूप हम सभी के लिए बहुत चिंता का विषय है जिसके चलते कई तरह की समस्याओं जैसे प्रदूषण, ग्लोबल वार्मिग, अल्प वर्षा, अति वर्षा आदि का सामना करना पड़ रहा है और यदि यही हालात रहे तो वो दिन दूर नहीं जब मानव जाति का अस्तित्व संकट में पड़ जायेगा। पर्यावरण को स्वच्छ बनाये रखने का दायित्व किसी एक का नहीं बल्कि हम सभी का है इस बात को ध्यान में रखते हुए ही मुम्बई के चेंबूर इलाके के स्वास्तिक पार्क क्लब स्थित भाभा परमाणु अनुसंधान केंद्र के सहयोग से मार्च में एक बायोगैस संयंत्र स्थापित किया और जुलाई से इसका उपयोग शुरू किया गया।

पूर्वी उपनगरों में सबसे बड़ी समस्या अपशिष्ट का निस्तारण करना है जिसके लिए चेम्बूर क्लब एमेराल्ड अपना सहयोग देते हुए पिछले दो महीनों में 30,000 किलो कार्बनिक अपशिष्ट का निस्तारण करते हुए उसे खाना पकाने की गैस में परिवर्तित करने का सकारात्मक और सफल प्रयोग किया है। भाभा परमाणु अनुसंधान केंद्र (BARC) के सहयोग से स्वास्तिक पार्क क्लब में मार्च में एक बायोगैस संयंत्र स्थापित किया गया, जिसके माध्यम से क्लब क्षेत्र में उत्पन्न खाद्य अपशिष्ट को बायो-मेथेनेशन के माध्यम से बायोगैस में परिवर्तित किया जाता है। बायो-मेथनेशन तकनीक के माध्यम से रसोईघर से निकलने वाले कचरे को परिष्कृत कर एनएरोबिक पाचन के माध्यम से मीथेन गैस उत्पन्न की जाती है। एनएरोबिक पाचन सूक्ष्मजीवों के दौरान ऑक्सीजन की अनुपस्थिति में बायोडिग्रेडेबल सामग्री को तोड़ता है।

क्लब के कार्यकारी निदेशक निखिल मेहता ने बताया कि "स्रोत पर 100% पृथक्करण सुनिश्चित करने के बाद हमने बायोगैस प्रौद्योगिकी को अपनाने का फैसला किया क्योंकि हमारे पास सेटअप स्थापित करने की जगह थी जहाँ बड़ी मात्रा में अपशिष्ट को कम किया जा सकता था।" क्लब में स्थापित बायोगैस संयंत्र में सबसे पहले अपशिष्ट को कोल्हू में डालकर उसे छोटे छोटे टुकड़ों में तोड़ दिया जाता है उसके बाद उसे एक फीड टैंक में भेजा जाता है। जहाँ से वह जैव-डाइजेस्टर में पंप किया जाता है उस स्थान पर स्थित एक कक्ष में अपशिष्ट का तेजी से अपघटन होता है और उसके घोल को दूसरे टैंक में छोड़ा जाता है उसके बाद बायो-डाइजेस्टर को पानी की आवश्यकता होती है ताकि मेथनेशन प्रक्रिया पूरी हो सके जिसके बाद बायोगैस बनती है। उसके बाद तैयार  बायोगैस को एक भंडारण कक्ष में भेजा जाता है जहाँ से उसे समय-समय पर खाना पकाने के लिए उपयोग किया जाता है।

msqseewu8h9vwbinxrwurt5qjjbvbczf.jpgफोटो साभार - द बेटर इंडिया 

निखिल बताते हैं कि "प्रतिदिन उत्पन्न दैनिक कचरे से क्लब के रसोईघर में 4-6 क्यूबिक मीटर गैस में परिवर्तित किया जाता है। जिससे हम खाना पकाने की गैस खरीदने से पहले किए गए खर्चों पर हर दिन रु. 250 बचाते हैं। बीएआरसी द्वारा पेटेंट की गई पूरी परियोजना रु. 11 लाख की लागत से स्थापित की गई है।" क्लब के चेयरमैन जशवंत मेहता बताते हैं कि "हमारा फोकस शहर डंपिंग ग्राउंड में जाने वाली कचरे की मात्रा को कम करना है। अपशिष्ट को बायोगैस में बदलकर हमने पर्यावरण संरक्षण की दिशा में छोटा सा कदम बढ़ाया है।"

पर्यावरण संरक्षण के इस प्रयास को यदि बड़े पैमाने पर लागू किया जाए तो काफी हद तक पर्यावरण को प्रदूषण से बचाया जा सकता है। साथ ही अपशिष्ट पदार्थो का भी सही स्थिति में प्रयोग किया जा सकता है।




Share This Article
843