एक पुलिसकर्मी जिन्होंने आदिवासी बच्चों के सपनों को पूरा करने के लिए शुरुआत की एक मॉडल स्कूल

अक्सर गरीबों की मदद करने की बात हम किसी से सुनते रहते है और कई लोग वाक़ई में मदद करते भी है ऐसा हो भी क्यों ना आखिरकार इंसान ही तो इंसान के काम आता है इसे  ही इंसानियत कहा जाता है। इंसानियत की कुछ ऐसी ही मिसाल पेश के ही कोलकाता के एक यातायात पुलिसकर्मी अरुप मुखर्जी ने उन्होंने ये साबित कर दिया कि दुनिया में इंसानियत आज भी जिंदा है।

42 वर्षीय कॉन्स्टेबल अरूप मुखर्जी भारत के भविष्य को नयी दिशा देने के लिए प्रयासरत है इसलिए उन्होंने नक्सल प्रभावित क्षेत्र पुरुलिया के पूंछा में जनजातीय छात्रों के लिये एक स्कूल की स्थापना की जिसका नाम है पुंछा नाबादिशा मॉडल स्कूल है उनके स्कूल में बच्चों को  मुफ्त में शिक्षा दी जाती है। नक्सल प्रभावित क्षेत्र में शिक्षा की ज्योत जलना बेहद ही कठिन काम है क्योंकि वहाँ का जीवन समाज के मुख्यधारा से बहुत ही अलग सा है लेकिन ऎसे में भी अरूप की स्कूल में पढ़ने वाले काजल , उसका भाई  लादेन, बसुदेब, बलुकडी ,सबारपारा को अपना स्कूल इतना पसन्द है की वे वहाँ से अपने घर वापस जाना ही नही चाहते बल्कि हमेशा के लिए स्कूल में रहना चाहते हैं।

अरूप मुखर्जी बताते है कि "मुझे खुशी होती है जब ये बच्चे मुझे पिताजी या बाबा कहकर पुकारते है। मैंने इस स्कूल को 15-20 बच्चों के साथ शुरू किया था अब यह संख्या 100 से अधिक है। मैं यहां हर महीने 45,000 रुपये स्कूल के संचलान और बच्चों की शिक्षा के लिए देता है लेकिन कमी सिर्फ यह है कि मैं उन्हें अच्छा भोजन नहीं दे पा रहा हूँ क्योंकि मैं सरकार से कोई मदद नहीं लेता हूँ और मेरे पास संसाधन बहुत ही सिमित है।" बचपन से ही अरूप ने अपने दादाजी से साबर क्षेत्र के बारे में कई कहानियां सुनी थी। जिसके चलते अरूप के मन में हमेशा एक ही बात थी की अगर वे लोग शिक्षित हो जाये तो उनका भविष्य सुधर जायेगा इसलिए अरूप हमेशा उनके लिए एक स्कूल शुरू करना चाहता था। सन् 1999 में जब वो कोलकाता पुलिस में शामिल हुए तो अरूप अपनी तनख़्वाह में से कुछ पैसे बचाने लगे और उसके बाद उन्होंने कुछ पैसे उधार पर लिए और साल 2011 में अपना स्कूल शुरू किया।

शुरूआती दौर में अरूप के स्कूल में बस दो कमरे और एक बरामदा था जहाँ 20 छात्रों  के बैठने की व्यवस्था थी लेकिन अब वर्तमान में स्कूल में नौ कमरे, एक रसोईघर, कक्षाकक्ष, सीसीटीवी कैमरे,13 शौचालय हैं जिसमे से 9,000 वर्ग फीट जमीन पर केवल शौचालय है। उनके स्कूल में बच्चों को आवास, भोजन, शिक्षा, कपड़े, वर्दी और शिक्षा सामग्री निःशुल्क प्रदान की जाती है।

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अरुप बताते है कि "पूर्व भारतीय कप्तान सौरव गांगुली द्वारा आयोजित एक बंगाली टेलीविजन शो में मुझे सम्मानित करने के बाद काफी लोग मेरी सहायता के लिए आगे आये। समारोह के बाद चैनल और उसके प्रायोजकों ने मुझे कुछ पैसे दिए। जिससे मैंने एक और कमरा बनाया, रामकृष्ण मिशन स्कूल के कुछ पूर्व छात्र मुझे 1 क्विंटल चावल और  10 किलो दालें देते हैं। जिससे बच्चों का खाना बनता है।" अरुप के इस मिशन के तहत पुंछा ब्लॉक स्वास्थ्य केंद्र के स्थानीय डॉक्टर भी उन्हें सहायता देते हैं डॉक्टर समय समय पर  बच्चों के स्वास्थ्य की जांच कर उन्हें मुफ्त में इलाज भी प्रदान करते हैं। अरूप की स्कूल में पढ़ाने वाले शिक्षक 24 वर्षीय पीयू प्रमाणिक बताते है कि "बच्चों को सिखाने और उनके साथ समय बिताना बहुत अच्छा लगता है। मैं इसे तब तक जारी रखूंगा जब तक कि मुझे उचित नौकरी न मिल जाए ।"

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आज अरूप के प्रयासों से आदिवासी इलाकों के बच्चें पढ़ने में रूचि लेने लगे है सामज की मुख्यधारा में आने लगे है इतना ही नही बच्चों को विश्वास है की अब उनके सपने जरूर पूरे होंगे।

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