तमिलनाडु के गाँवो में रहने वाले किसान दें रहें है जैविक खेती को प्रोत्साहन

खेती शुरुआत से ही हमारी अर्थव्यवस्था का आधारस्तम्भ रही है। लेकिन समय के साथ बदलते परिवेश में खेती के साथ भी कई तरह के प्रयोग होने लगे जिससे उत्पादन तो बहुत बढ़ा लेकिन उसकी गुणवत्ता बहुत कम हो गयी ऐसे में फिर से एक बार गुणवत्ता युक्त खेती पर बल दिया जाने लगा है। जैविक खेती के माध्यम से आज किसानों ने लुप्त हो रही कई फसलों को सफलता पूर्वक पुनः विकसित किया है साथ ही पारंपरिक धान की किस्मों जैसे मपिल्लै  सांबा और नीला सांबा को खत्म होने के कगार से बचाया है।

आज हम बात कर रहें है तमिलनाडु के नागपट्टिनम जिले के सिरकाज़ी तालुक की जहाँ के किसानों ने जैविक खेती को प्रोत्साहित करते हुए स्वदेशी बीज उत्पादन का सार्थक प्रयोग किया है। इस क्षेत्र के किसानों ने कार्बनिक प्रथाओं के माध्यम से कई तरह की फसलों और मपिल्लै  सांबा, नीला सांबा जैसे पारंपरिक धान की किस्मों को पुनः मूल रूप में संवर्धित किया है। इस क्षेत्र में जैविक खेती शुरू करने और स्वदेशी किस्मों का उत्पादन करने की पहल की शुरुआत एक एन.जी.ओ सेंटर फॉर इंडियन नॉलेज सिस्टम्स (CIKS) द्वारा की गयी। जिसके लिए लगभग 17 वर्षों तक सी.आई.के.एस की तरफ से  किसानों को जैविक खेती और पारंपरिक धान की किस्मों का उत्पादन करने हेतु प्रशिक्षण प्रदान किया जा रहा है। किसान भी जैविक खेती के महत्व को समझते हुए एन.जी.ओ के साथ कदम से कदम मिलाकर कार्य कर रहे है।स्थानीय किसानों ने वैलानाडु सस्टेनेबल एग्रीकल्चर प्रोड्यूसर कंपनी लिमिटेड (वी.एस.ए.पी.सी.एल) नामक एक निर्माता कंपनी बनाई है। जिसके द्वारा किसानों के उत्पादन को उचित मूल्य के साथ बाजार में बेचा जाता है।

सरकाजी तालुक के आंगनी पंचायत के तेनंगुड़ी गांव के रहने वाले किसान माणिकंदन जैविक खेती के माध्यम से परंपरागत बीजों की 100 से अधिक किस्मों का अपने खेतों में उत्पादन कर रहे हैं। जिसमे अनाज, धान और कई औषधीय मूल्य की फसलें शामिल है। एक समय था जब रासायनिक खेती के दुष्प्रभावों के चलते स्थानीय क्षेत्र में बहुतायत में होने वाले "मपिल्लै सांबा" नामक धान की किस्म खत्म होने की स्थिति में पहुँच चुकी थी लेकिन अब जैविक खेती के प्रयोग से यह पारंपरिक किस्म अब पुनः विकसित होने लगी जो किसानों के बीच बहुत ही लोकप्रिय है। "मपिल्लै सांबा" चावल की एक किस्म है जिसमे बहुत अधिक मात्रा में फाइबर पाया जाता है जिसे खाना बहुत ही लाभदायक है।  

किसान माणिकंदन कहते है कि " हम किसानों द्वारा चावल की इस किस्मों को पुनर्जीवित करने और उत्पादित करने के लिए कड़ी मेहनत करनी पड़ती है इसलिए कंपनी द्वारा स्वयं सहायता महिला समूह भी बनाया गया है जो की हमारी सहायता करती है।" कृषि-व्यापार और विस्तार योजना के तहत गांवों में महिला द्वारा पारंपरिक धान की किस्मों से वथल, अपलम, पुट्टू मावु आदि बनाने का कार्य किया जाता है। सिरकाज़ी के पगासालाई गांव में संचालित महिला समूह की अध्यक्ष जयलक्ष्मी बालासुब्रमण्यम बताती है कि "इस व्यवसाय के माध्यम से आय के अवसरों को बढ़ाने के लिए सक्रिय रूप से महिलाएं भागीदारी निभा रही है। सबसे पहले मुझे प्रशिक्षण दिया गया फिर नाबार्ड की सहायता से मेरे जैसी कई महिलाओं को अलग अलग गांवों में जाकर प्रशिक्षित किया गया।" शुरुआत में गांव जैविक खेती का काम गाँव के चार लोगों ने शुरू किया था और अब स्थिति यह है की गांव में 100 से ज्यादा लोग जैविक खेती कर रहें हैं। नाबार्ड की ओर से अलग अलग गांवों के 25 लोगों के लिए प्रशिक्षण दिया जिसमे कई महिलाएं शामिल है। जो की धान की किस्मों से तरह तरह के उत्पादन तैयार करती हैं। 

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जयलक्ष्मी बताती है कि "शुरुआत में उत्पाद को बेचने के विषय में स्थिति सामान्य नही थी लेकिन हमारे उत्पादों को चखने के बाद, लोगों ने हमसे संपर्क किया। फोन कॉल के माध्यम से हमारे पास ऑर्डर भी आने लगे।" जिला के जिला विकास प्रबंधक नागपट्टिनम डी गणेश कहते है कि "नाबार्ड ने कृषि क्षेत्र के प्रचार कोष पर एक कार्यक्रम तैयार किया और पारंपरिक बीजों के उत्पादन में वृद्धि के लिए सीआईकेएस के माध्यम से निर्माता कंपनी को अनुदान सहायता प्रदान की। हमारा लक्ष्य है की 2022 तक छोटे और सीमांत किसानों की आय को दोगुना करना।

वाक़ई अगर इस तरह की प्रभावी योजनाओ के अनुरूप काम किया जाये तो जैविक खेती को तो प्रोत्साहन मिलेगा ही साथ ही किसानों की आर्थिक स्थिति भी सुदृढ़ होगी।



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