जल-संकट के दौर में मिलिए एक ऐसे शख्स से जो पिछले दो दशकों से सिर्फ बारिश का पानी इस्तेमाल कर रहे हैं

पूरी दुनिया के सामने जल-संकट की समस्या गहराती जा रही है। समस्त पृथ्वी पर कुल जल का विश्लेषण करने पर पता चलता है कि पृथ्वी पर उपलब्ध कुल जल का केवल 2.07 फीसद ही पीने योग्य शुद्ध जल है। संयुक्त राष्ट्र की जारी रिपोर्ट का जायजा लें तो पानी की समस्या से जूझते लोगों की तादाद 2050 में 5.7 अरब तक पहुंच जाएगी। आज दुनिया भर में 3.6 अरब लोग पीने के पानी को तरस रहे हैं। अगर भारत की बात करें तो यहाँ 76 मिलियन लोगों को पीने के लिए साफ़ पानी नहीं मिलता है। 

ऐसे में हम सब की जिम्मेदारी है कि पानी का सही और समुचित इस्तेमाल करें ताकि हमारी आने वाली पीढ़ी जल-संकट से बच सके। आज हम एक ऐसे ही शख्स से आपको मिला रहे हैं जो पिछले 23 वर्षों से पानी का बिल भरे सामान्य जीवन जी रहे हैं। जी हाँ, आप भी यही सोच रहे होंगे कि भला यह कैसे संभव हो सकता है। लेकिन हाँ, बंगलुरु में रहने वाले शिवकुमार वर्षा जल संचय की मदद से पिछले दो दशकों से बारिश के पानी से ही अपनी जरूरतें पूरी कर रहे हैं। 

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फ़ोटो साभार: सोशल मीडिया

गौरतलब है कि साल 2015 में जब वे अपना घर बना रहे थे, तभी उनके मन में यह ख्याल आया कि क्यों न कुछ ऐसे तरीके से घर बनाया जाए कि वर्ष के जल का संचय हो और फिर बाद में उस जल का उपयोग दैनिक ज़रूरतों को पूरा करने के लिए किया जाए। इसके लिए उन्होंने भरपूर रिसर्च की, उन्हें पता चला कि औसत परिवार की लगभग सभी ज़रूरतें लगभग 500 लीटर पानी में पूरी हो जाती है। फिर उन्होंने पाया कि पीछे सौ वर्षों में कोई भी वर्ष ऐसा नहीं रहा कि बेंगलुरु शहर में हो रहे मानसून से पानी की ज़रूरतें पूरी नहीं हो सकती थी। इन सब कैलकुलेशन के बाद उन्होंने अपने घर में RWH सिस्टम लगाने का फैसला किया।

चुकी शिवकुमार खुद एक वैज्ञानिक हैं इसलिए उन्होंने वर्ष जल संचय के लिए एक प्रभावी सिस्टम बनाने की दिशा में काम करना शुरू किया। काफी शोध और मेहनत के बाद उन्होंने पॉप-अप फ़िल्टर नामक एक यंत्र बनाया। यह यंत्र सिल्वर शीट का इस्तेमाल करता है और बारिश के पानी में मौजूद गंदगी को हटाता है।

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फ़ोटो साभार: गज़बपोस्ट

शिवकुमार बेंगलुरू की जनता के बीच भी वर्षा जल संचयन को मशहूर बनाना चाहते हैं। उनका मानना है कि यदि शहर के आधे घरों में भी यह सिस्टम लग जाये तो पानी की समस्या कभी नहीं होगी और पूरे देश में इसे अमल में लाना चाहिए।

विकसित होने की रेस में देश इतनी तेज़ी से आगे बढ़ रहा है कि प्राकृतिक संसाधन ख़त्म होते जा रहे हैं और साल 2022 तक बेंगलुरू और दिल्ली जैसे महानगरों में ग्राउंड वॉटर भी ख़त्म हो जाएगा। ऐसी भयावह स्थिति से बचने के लिए अभी ही शिवकुमार से प्रेरणा लेते हुए जल-संचयन की प्रक्रिया में हर व्यक्ति को साथ देना चाहिए। 

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