इस छात्रा ने खाद्य पदार्थों की जैविकता की जांच के लिए बनाया एक सरल और सस्ता उपकरण

अधिक उत्पादन की चाह में किसानों ने अंधाधुंध कीटनाशकों तथा रासायनिक उर्वरकों का इस्तेमाल शुरू किया तो धरती की कोख में जहर भर गया। यही जहर खाद्य सामग्री के रूप में हमारे शरीर में गया और जानलेवा बीमारियों ने जकड़ना शुरू कर दिया है। इतना ही नहीं, मिट्टी की भी उर्वरा शक्ति छिनती जा रही है। इसी से सबक लेते हुए अब जैविक खेती की मांग बढ़ी है। जैविक उत्पादों के लिए देश ही नहीं, विदेशों से भी मांग हो रही है।भारतीय जैविक खाद्य बाजार इकाई द्वारा दिए गए एक रिपोर्ट के मुताबिक आज जैविक उत्पाद का बाजार $533 मिलियन के करीब होने का अनुमान है और 2020 तक इसके 1.6 अरब डॉलर तक पहुंचने की उम्मीद है। पर ऐसे में एक सवाल जेहन में आता है कि कैसे यह सुनिश्चित किया जाय कि हमें जो भोजन बेचा जा रहा जाए उसमें कैमिकल या कीटनाशक का उपयोग नहीं हुआ है। ऐसे में खाद्य पदार्थों की गुणवत्ता और उसके ऑर्गेनिक होने की जाँच वाले किसी उपकरण की जरूरत महसूस होती है।

चेन्नई की एक छात्रा नें इसका हल ढूंढ लिया है। किसी भी खाद्य पदार्थ की ऑर्गेनिकता की जांच के लिए उन्होंने एक उपकरण बनाया है जी सस्ता भी है और सरल भी।

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इनका नाम है हेमालता राजेंद्रन। चेन्नई के सेंट जोसेफ कॉलेज ऑफ इंजीनियरिंग की छात्रा हेमलता नें इसी वर्ष बॉयोटेकनोलॉय में बीटेक पूरा किया है। हेमलता ने एक ऐसी कीटनाशक डिटेक्टर उपकरण बनाई है जो बहुत कम लागत में दूध में यूरिया की उपस्थिति का पता लगा लेता है। उन्होंने इंडियन नेशनल एकेडमी ऑफ इंजीनियरिंग द्वारा उनके इन आविष्कारों के लिए इनोवेशन प्रोजेक्ट पुरस्कार जीता है। उन्होंने दूध में यूरिया या किसी केमिकल को जाँच के लिए एक सरल और सस्ता मेकेनिज्म वाला उपकरण बनाया है।

इसका नाम है यूरिया डिटेक्शन स्ट्रिप। उनका यह उपकरण सरल और उपयोग में आसान है। कीटनाशकों का पता लगाने वाला यह उपकरण रंग बदलने वाले स्केच कार्ट्रिज से बना है जिसमें अभिकर्मक का उपयोग किया गया है। यह 10 दिनों तक सुरिक्षत रहता है और इसकी कीमत महज 5 रुपये प्रति 10 स्ट्रिप हैं। चूंकि यह कोलोरीमेट्रिक विधि पर आधारित है, इसकी मदद से एक आम आदमी भी बिना किसी तकनीकी कौशल के इसका उपयोग कर सकता है। यूरिया डिटेक्शन स्ट्रिप अभिकर्मक में भिगो कर एक A4 शीट से बनाई गई थी। यह इसकी लागत केवल 2 रुपये प्रति 10 स्ट्रिप्स है। वे एक कीटनाशक प्रयोग के रोकथाम के एक उपकरण पर काम कर रही थीं तभी यूरिया डिटेक्शन यूनिट का आइडिया उनके दिमाग में आया।

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दोनों उपकरणों में एक आसान विधि का उपयोग किया गया है। इसके इस्तेमाल के लिए ज़रूरत है दूध में इस A4  सीट के बने पट्टियों को डुबाने की। इसके बाद यदि दूध में यूरिया होगा तो यह रंग बदलता है। अगर दूध में यूरिया की मात्रा पाए जाती है तो यह उजले रंग से बदलकर हल्के पीले रंग से गहरे रंग की एक अलग चमकदार छाया तक बदलता है। पीलापन जितना ज्यादा होगा दूध में यूरिया की मात्रा भी उतनी ही अधिक होगी। फलों और सब्ज़ियों के ऑर्गेनिकता का पता लगाने के लिए, किसी भी फल या सब्जी से कुछ बूंद रस निकालकर इस स्ट्रिप पर डालना होता है, अगर स्ट्रिप नीले रंग में बदलने लगे तो समझें यह ऑर्गेनिक नहीं है। 

आमतौर पर यूरिया या कीटनाशक का पता लगाने के लिए प्रयोगशालाएं होती हैं लेकिन एक प्रशिक्षित पेशेवर द्वारा प्रयोगशाला में होने वाली यह प्रक्रिया जटिल है और आम आदमी के लिए संभव नहीं होता। लेकिन हेमलता द्वारा तैयार किया गया यह उपकरण सरल भी है, उपयोगी भी है और सस्ता भी है। दैनिक घरेलू उपयोग के लिए यह एक बेहतर टूल साबित हो सकता है क्योंकि इसने एक जटिल प्रक्रिया को बहुत आसान बना दिया है।

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दूध को लोग अपने स्वास्थ्य को बेहतर करने के लिए इस्तेमाल करते हैं। लेकिन आजकल, हम जिस दूध का उपभोग करते हैं, वह यूरिया, डिटर्जेंट, सोडा आदि से दूषित होता है। टिकाऊ और रंग को बढ़ाने के लिए उसमें शरीर के लिए नुकसानदायक पदार्थ डाले जाते है। हेमालता वर्तमान में अपनी यूपीएससी परीक्षाओं की तैयारी कर रही हैं और डीआरडीओ के साथ काम करना चाहती हैं। वे आरएमएटीएस बायोटेक ट्रेनिंग एंड रिसर्च इंस्टीट्यूट में अपने शोध को आगे बढ़ाने की योजना बना रही हैं।  हेमलता में अपने इस उत्पाद के सेल्फ लाइफ को बढ़ाना चाहती है। अभी केवल 10 दिनों तक ही यह ठीक रहती है पर हेमलता इसे 45 दिनों तक बढ़ाना चाहती है।


 

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