अनफिट होने के बावजूद भी बुलंद हौसलों के दम पर भारत को इस एथलीट ने दिलाया गोल्ड

इरादों में जूनून, मन में हौसला और जीत का इरादा हो तो व्यक्ति नामुमकिन को भी मुमकिन कर दिखा सकता है। कई बार लोग शरीर में दर्द के चलते जीवन से हार मान लेते है उम्मीद खो देते है लेकिन जो लोग शारीरिक अक्षमताओं को मात देकर अपनी मंजिल की तरफ बढ़ते है वो ही इतिहास रचते हैं। कुछ  ऐसा ही प्रेरणादायक उदाहरण देखने को मिला जब इंडोनेशिया की राजधानी जकार्ता में खेले गए 18वें एशियाई खेलों में भारतीय एथलीट स्वप्ना बर्मन ने हेप्टैथलॉन स्पर्धा में गोल्ड मेडल हासिल कर देश का मान बढाया। एशियाड खेलों में स्वप्ना भारत की पहली ऐसी एथलीट है जिसने हेप्टैथलॉन प्रतिस्पर्धा में भारत को स्वर्ण पदक पर काबिज किया है।

स्वप्ना पश्चिम बंगाल की रहने वाली है और गरीब परिवार से ताल्लुक़ रखती है उनके पिता एक ऑटो चालक है। स्वप्ना ने ग़रीबी में पलकर भी अपने सपनों को पूरा किया और अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर अपनी एक अलग पहचान बनाई। स्वप्ना के लिए खेल संबंधी महंगे उपकरण ख़रीदना तो एक सपने जैसा ही था और ट्रेनिंग का ख़र्च उठाना नामुमकिन लेकिन स्वप्ना की हिम्मत जोश और जूनून का ही नतीजा है की कड़ी मेहनत के दम वो एथलीट बनी और उन्होंने  वो कर दिखाया है जो आज तक कोई अन्य खिलाड़ी नहीं कर पाया। स्वप्ना जब खलने के लिए मैदान पर उतरी तो वो दर्द से जूझ रही थी स्वप्ना के लिए शारीरिक रूप से फ़िट न होने के बावजूद इस मुकाम तक पहुंचना अपने आप में बहुत बड़ी बात है।

स्वप्ना को मीठा बेहद पसंद है और वो चॉकलेट , मिठाईयों के बिना रह नहीं पाती हैं लेकिन ज़्यादा मीठा खाने की वजह से उनके दांतों में अकसर दर्द रहता था और एशियन गेम्स के दौरान भी वो दांत दर्द से जूझ रहीं थी। फ़ाइनल से तीन दिन पहले जब वो वॉर्म-अप सेशन के दौरान 100 मीटर की दौड़ में भाग लेने वाली थी तब ही अचानक उनका दर्द बहुत ज़्यादा बढ़ गया जिसके बाद फ़िज़ियोथेरेपिस्ट ने उन्हें सलाह दी की वे फ़ाइनल में टेप लगाकर खेले नही तो तकलीफ़ बढ़ सकती है। उसके बाद वो टेप लगाकर फाइनल खेली और तेज़ दर्द के बावजूद उन्होंने भारत के लिए गोल्ड मेडल जीता। तेज़ दर्द के बावजूद एथलीट स्वप्ना ने 100, 200 और 300 मीटर की दौड़ पूरी की और इतना ही नहीं भारी भरकम जेवलिन से ऊंचाई तक कूदना फिर मुंह के बल ज़मीन पर गिरना उस दर्द में कोई हँसी खेल का काम नही था लेकिन उन्होंने उफ़ तक नहीं की क्योंकि उनका लक्ष्य केवल जीतना था।

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स्वप्ना बताती है कि " फ़ाइनल से एक रात पहले मैं दर्द से बहुत ज्यादा परेशान थी यहाँ तक की मैं दर्द के चलते पूरी रात सो नही पाई। हर 30 सेकेंड बाद मुझे बाथरूम जाना पड़ रहा था और दर्द कम करने के लिए मैं लगातार गर्म ,ठंडा और सॉल्टेड पानी पी रही थी जिससे की दर्द में कुछ टाइम के लिए कमी होती। उसके बाद मैंने दांतों पर कोलगेट लगाया , पेनकिलर ली लेकिन दर्द में कोई राहत नही मिली। आज जब भी मैं उस टाइम को याद करती हूँ तो मुझे हँसी आ जाती है लेकिन उस समय वो वक्त मेरे लिए बहुत ही गंभीर और दर्द भरा था।"

सिर्फ एक दर्द ही नही बल्कि एशियन गेम्स से पहले स्वप्ना बैक पेन, घुटने के दर्द और टखने की इंजरी से भी जूझ रही थीं उनका एशियन गेम्स में खेल पाना लगभग मुश्किल लग रहा था क्योंकि उनके घुटने का दर्द लेवल थ्री तक पहुंच चुका था बावजूद इसके उन्होंने कड़ी मेहनत कर इस परेशानी से जल्द ही निजात पा ली। ऐसा केवल एक बार ही नही हुआ साल 2014 में भी उन्हें इंजरी से गुज़ारना पड़ा था उस वक़्त उनकी आर्थिक स्थिति इतनी भी अच्छी नहीं थी कि वो अपना इलाज़ करा सके तब  एक एनजीओ ने उनकी मदद की और वो अपना करियर जारी रख पायी।

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बात यही खत्म नहीं होती है स्वप्ना बचपन से एक और बड़ी समस्या से भी जूझ रही है। स्वप्ना के दोनों पैरों में 6 - 6 उंगलियां है जिसके चलते उन्हें सामान्य जूते पहनने में काफ़ी दिक्कतें होती है लेकिन वे इस समस्या को दरकिनार कर आगे बढ़ती गयी। लेकिन गोल्ड हासिल करने के बाद भावुक होकर स्वप्ना ने अपने लिए स्पेशल जूते बनाने की अपील की। स्वप्ना ने मेडल जीतने के बाद कहा कि "मैंने ये पदक 'नेशनल स्पोर्ट्स डे' के मौक़े पर जीता है इसलिए ये मेरे लिए बेहद ख़ास है। मैं अक्सर सामान्य जूते ही पहनती हूं जिसमें पांच उंगलियों की जगह होती है और ट्रेनिंग के दौरान इसमें काफी परेशानी होती है मुझे काफ़ी दर्द सहना पड़ता है।" उनकी इस अपील के बाद खेल मंत्री राज्यवर्धन सिंह राठौड़ ने 'भारतीय खेल प्राधिकरण' को निर्देश दिए और निर्देश मिलने के बाद SAI ने अब स्पोर्ट्स शूज़ बनाने वाली मशहूर कंपनी 'एडिडास' से करार किया  जो स्वप्ना के 12 उंगलियों वाले पैरों के लिए विशेष रूप से डिज़ाइन किए हुए जूते तैयार करेगी।

वाक़ई स्वप्ना ने  साबित कर दिया की मुश्किलें तो सभी के जीवन में आती है लेकिन जो मुश्किलों में भी हार नही माने वो ही लक्ष्य तक का सफ़र तय कर पाता है ।

 

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