भारत की प्रथम मुस्लिम शिक्षिका जिन्होंने लड़कियों की शिक्षा में अपना अतुल्य योगदान दिया

हम अक्सर सुनते आये हैं की एक बेटा शिक्षित होता है तो एक परिवार शिक्षित होता है लेकिन एक बेटी शिक्षित होती है तो दो परिवारों में शिक्षा का उजियारा होता है और कई पीढियों में शिक्षा की ज्योत जल जाती है। भारत की प्रथम महिला शिक्षिका और समाज सुधारक सावित्रीबाई ज्योतिराव फुले के नाम से तो हम सब वाकिफ़ है और हो भी क्यों ना हमारे रूढ़िवादी समाज को एक नई दिशा देने की शुरुआत जो की उन्होंने। आज हम आपको सावित्रीबाई की सहयोगी रही फ़ातिमा शेख़ के व्यक्तित्व से रूबरू करवाने जा रहें हैं। फ़ातिमा शेख़ वो महिला है जिन्होंने भारत का पहला कन्या स्कूल खोलने में सावित्रीबाई का हर कदम पर सहयोग किया।

इन दोनों महिलाओं के प्रयासों से  बेटी पढ़ाओ अभियान की शुरुआत तो 19वीं शताब्दी में ही हो गई थी जब आज से लगभग 150 साल पहले सावित्रीबाई फुले और उनके पति जोतीराव फुले ने निचली जाति वाले समुदायों की लड़कियों और महिलाओं को शिक्षित करने संकल्प लिया था। इस बात में भी कोई दो राय नही है की उस समय समाज कितना रूढ़िवादी था जिसके चलते उन्हें आलोचनाओं का शिकार भी होना पड़ा यही नहीं और उस समय मजबूरी में सावित्रीबाई को अपना घर तक छोड़ना पड़ गया ऐसे में जब ज्योतिराव और सावित्रीबाई फुले ने लड़कियों के लिए स्कूल खोलने का निर्णय लिया था तो उनकी इस मुहीम में फ़ातिमा शेख़ ने कंधे से कन्धा मिलाकर उनका सहयोग किया।

e2eizztxhnmgeph63h5b7xmb7tvcvzqa.jpgफातिमा शेख एवं सावित्रीबाई फुले

फ़ातिमा शेख़ ने सावित्रीबाई की स्कूल में पढ़ाने की ज़िम्मेदारी उठाई ऐसे में उन्हें समाज के विरोध का भी सामना पड़ा। कई बार सावित्रीबाई और फ़ातिमा पर लोगों ने पथराव भी किया। लेकिन दोनों ही महिलाओं ने अपने बढ़ते कदम को नहीं रोका बस आगे बढ़ती गयी शिक्षा की ज्योत लेकर। फ़ातिमा ने अपने पड़ोसियों के घर जाकर उन्हें उनकी बेटियों को शिक्षित करने के लिए प्रोत्हासित करने की जिम्मेदारी को बख़ूबी निभाया और सन् 1848 में फ़ातिमा और उनके भाई उस्मान शेख़ ने सावित्री के साथ मिलकर अपने घर से ही पहले कन्या विद्यालय का श्री गणेश किया। वह समय ऐसा समय था की जब हिंदू और मुस्लिम दोनों ही समुदाय के लोग महिलाओं की शिक्षा के ख़िलाफ़ थे और उसका पुरजोर विरोध करते थे। ऐसे समय में भी फ़ातिमा के भाई उस्मान शेख ने उनका समर्थन किया और उनकी हर सम्भव मदद की  उन्होंने न सिर्फ़ अपनी बहन को पढ़ने के लिए प्रोत्साहित किया, बल्कि उसे अन्य लड़कियों को शिक्षित करने की सलाह भी दी।

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सन् 1856 तक सावित्रीबाई ने फातिमा के साथ मिलकर पांच स्कूलों की स्थापना कर ली थी जिसमें फ़ातिमा बतौर शिक्षिका छात्राओं को पढ़ाती थी।                   

सावित्री बाई फुले और फातिमा शेख की जोड़ी ने ये साबित कर दिया की शिक्षा किसी मज़हब की जंजीरों में नही बंध सकती बल्कि शिक्षा तो नाम है बन्धनों को खोलकर मजहबी जंजीरों को तोड़ने का। 

 

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