बिहार की पुलिस कोंस्टेबल रंजीता पिछले दस वर्षों से दे रही फ़ुट्बॉल का नि:शुल्क प्रशिक्षण

भारत ने अपनी हॉकी का हुनर दिखाया तो मैरीकॉम ने मुक्केबाजी में देश का मान बढ़ाया है और अगर गर बात पहलवानी की हो तो गीता और बबीता ने दंगल में अच्छे अच्छे को हराया है। इस बात में कोई दो राय नही है कि देश की महिलाओं ने जब जब अपना हुनर बताया है मैदान फतह कर दिखाया है। लेकिन अब बहुत जल्दी ही हमें फुटबॉल में भी हमारे बच्चों का हुनर दिखाई देने वाला है क्योंकि बिहार के मुंगेर की रहने वाली कांस्टेबल रंजीता ने ठान लिया है बच्चों को फुटबॉलर बनाने का।

रंजीता अपनी नौकरी के साथ ही बच्चों को फुटबॉल सिखाने का काम कर रही है और खास बात ये है कि  कांस्टेबल होते हुए भी उनकी इस अनोखी शुरुआत में उन्हें कोई सरकारी मदद भी नहीं मिली है वे सब कुछ अपने दम पर कर रही है। रंजीता की पहचान जिला पुलिस बल की आरक्षी (कांस्टेबल) से नही बल्कि फुटबॉल कोच के रूप में ज्यादा है।  32 साल की रंजीता बिहार के भोजपुर जिले की रहने वाली है और साल 2008 में उन्हें मुंगेर जिले के नक्सल प्रभावित क्षेत्र में बतौर कांस्टेबल के पद पर नियुक्त है। जब रंजीता ख़ाकी वर्दी में इस क्षेत्र में आई थी  तब उन्हें वहाँ कोई नहीं जानता था, किसी को नही पता था की वो एक कांस्टेबल से कई आगे एक कोच साबित होंगी। रंजीता खुद भारतीय महिला फुटबॉल टीम की सदस्य रह चुकी है और पिछले 10 साल से बच्चों को निःशुल्क फुटबॉल का प्रशिक्षण दे रही है उनके द्वारा प्रशिक्षित खिलाड़ी अपने दम पर राष्ट्रीय फुटबॉल टीम में अपनी जगह सुनिश्चित कर रहें हैं।

रंजीता बताती है कि "जब मैं छोटी थी तो गंगा किनारे छोटे बच्चों को लोगों का सामान ढोते देखती थी और उसके बाद इसके बदले मिले पैसों से बच्चे नशा किया करते थे लेकिन कांस्टेबल की नौकरी मिलने के बाद मैंने इन बच्चों को इकट्ठा किया और इनका नामांकन स्कूल में कराया उसके कुछ दिन बाद मैंने उन्हें फुटबॉल का प्रशिक्षण देना शुरू किया बस तब से लेकर अब तक यह काम बदस्तूर जारी है।"

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रंजीता ने जब उस क्षेत्र और क्षेत्रवासियों को देखा तो उनके मन में एक विचार आया की उन्हें वहाँ के लोगों के जीवन में आवश्यक परिवर्तन लाना होगा इसके लिए उन्होंने सबसे पहले खेल को माध्यम बनाया रंजीता ने बस्तियों में रहने वाले बच्चों को समान अवसर उपलब्ध कराने के लिए उन्हें फुटबॉल का प्रशिक्षण देना शुरू किया उसके बाद एक कदम आगे बढ़ाते हुए बच्चों को पढ़ाई से भी जोड़ा। कूड़ा-कचरा बीनने वाले बच्चों को साथ लेकर रंजीता ने 'चक दे फुटबॉल' नाम से क्लब बनाया जिसमें न सिर्फ बच्चों को फुटबॉल का प्रशिक्षण दिया जाता है बल्कि सुबह और शाम में एक निजी शिक्षक की मदद से उन्हें ट्यूशन भी पढ़ाया जाता है और इन सब का खर्चा खुद रंजीता वहन करती हौ वो भी अपनी नौकरी की तनख़्वाह से।

वर्तमान में रंजीता भागलपुर के मिर्जा चौकी क्षेत्र के 35 आदिवासी बच्चों को प्रशिक्षण प्रदान कर रही है वे बच्चों की जरूरतों को ध्यान में रखते हुए उन्हें मुंगेर स्थित अपने आवास पर नि:शुल्क आवासीय सुविधा तक प्रदान करती है। रंजीता ने बताया कि "मुझे ख़ुशी है कि मुंगेर के चार बच्चे पिछले वर्ष राष्ट्रीय फुटबॉल अंडर-13 टीम में और दो बच्चे राष्ट्रीय फुटबॉल टीम अंडर-19 में चयनित हुए हैं।" रंजीता पुलिस में अपनी ड्यूटी को भी बख़ूबी निभाते हुए इन बच्चों को फुटबॉल का प्रशिक्षण दे रही हैं। देश की प्रतिभाओं को तराश रहीं रंजीता को न तो किसी औद्योगिक घराने से कोई मदद मिली और न ही सरकार से वह अपने वेतन और समय-समय पर वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों की मदद से ही बच्चों को प्रशिक्षण देती है।

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रंजीता बताती है कि " बच्चों को प्रशिक्षण देने  के दौरान मैं बच्चों को पूर्व राष्ट्रपति ए़ पी़ जे. अब्दुल कलाम की उस पंक्ति को जरूर याद दिलाती हूँ  जिसमें उन्होंने ऊंचे सपने देखने की बात कही थी।" पिछले दिनों राज्य के पुलिस महानिदेशक अभयानंद ने जब मुंगेर का दौरा किया तो उन्होंने रंजीता को शाबाशी देते हुए पांच हजार रुपये का पुरस्कार दिया था साथ ही उन्हें भागलपुर में तिलकमांझी राष्ट्रीय सम्मान से सम्मानित भी किया गया।

वाक़ई रंजीता जो कर रही है वह सराहनीय है क्योंकि उनके इस सार्थक प्रयास से ही भारत का भविष्य तैयार हो रहा हैं।

 

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