कभी अपनी खुराक के लिए तरसने वाले इस पहलवान ने भारत को दिलाया गोल्ड मेडल

 
आप सभी अपने पसंदीदा खिलाड़ियों को देखने के लिए बेताब हो उठते होंगे। धोनी के छक्के से लेकर सचिन के शतक तक हर वह पल हमें झूमने को मजबूर कर देता है। लेकिन आप शायद ही कभी इस बात पर ध्यान नहीं देते होंगे कि जो इन ऊंचाइयों पर पहुंचते हैं वो कितने कठिन रास्तों से होकर गुजरते हैं। देश के लिए गोल्ड और सिल्वर पदक जीतने वाले खिलाड़ियों का संघर्ष हम इन पदकों की चकाचौंध में भूल जाते हैं। हर किसी को एक खिलाड़ी से एक सितारा बनने में एक लम्बा और कठिनाइयों भरा सफर तय करना पड़ता है। दुनिया में ऐसे कई खिलाड़ी हैं जो कि बहुत ही गरीबी से उठकर आज बुलंदी पर हैं।

आज हम आपको एक ऐसे ही भारतीय पहलवान की कहानी बताने जा रहे हैं जिन्होंने अपनी कड़ी मेहनत से ही सफलता की सीढ़ियों को चढ़ा। जिन्होंने जकार्ता में हो रहे 18 वें एशियाई खेलों में देश को पहला गोल्ड मेडल दिलाया। इनकी कहानी किसी प्रेरणा से कम नहीं है।

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इनका नाम है पहलवान बजरंग पूनिया। भारतीय पहलवान बजरंग पूनिया ने एशियन गेम 2018 में पुरुषों की 65 किलोग्राम भारवर्ग फ्रीस्टाइल रेसलिंग स्पर्धा में स्वर्ण पदक जीत कर हर किसी को ग़ैरवान्वित कर दिया। उन्होंने फाइनल मुकाबले में जापान के पहलवान तकातानी डियाची को एकतरफा मुकाबले में 11-8 से शिकस्त दी। हालांकि जापानी पहलवान ने बजरंग को अच्छी टक्कर जरूर दी। इस तरह वे एशियाई खेलों में गोल्ड मेडल जीतने वाले भारत के 9वें पहलवान हो गए। पर बजरंग पूनिया का यहाँ तक का सफर इतना आसान नहीं था।

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बजरंग पूनिया का जन्म 26 फरवरी 1994 को हरियाणा के झाझर गाँव में हुआ। इनके पिता का नाम बलवान सिंह पुनिया हैं। इनके पिताजी भी एक पेशेवर पहलवान है। बजरंग की माता का नाम ओमप्यारी हैं, जो गृहणी हैं और घर की देख रेख करती है। बजरंग को कुश्ती विरासत में मिली। पर आज बजरंग की यह उपलब्धि उस वक्त और भी बड़ी नजर आती है, जब हम उनके संघर्ष की कहानी पर नजर डालते हैं। बजरंग नें महज 7 साल की उम्र में पहलवानी करना शुरू किया था। इनके परिवार की आर्थिक स्थिति कमजोर थी पर बजरंग के सपने पूरे करने के लिए इनके पिताजी ने बहुत से त्याग किए। वे बस व ऑटो का किराया बचाकर साइकिल से अपना काम पूरा करते थे। बजरंग की प्रारंभिक शिक्षा गांव में ही पूरी हुई। कुश्ती शुरू करने पर उन्हें उनके पिता द्वारा बहुत सहयोग मिला। बजरंग ने महर्षि दयानंद यूनिवर्सिटी से अपना ग्रेजुएशन पूरा किया। बजरंग पूनिया ने स्पोर्ट्स कोटे से भारतीय रेलवे में टिकट कलेक्टर (TTE) का भी काम कर चुके हैं।

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2015 में पुनिया का परिवार सोनीपत में शिफ्ट हो गया ताकि बजरंग स्पोर्ट्स अथॉरिटी ऑफ इंडिया के रीजनल सेंटर में ट्रेनिंग ले सके। एक वक़्त था जब बजरंग को उनकी खुराक भी ठीक से नहीं मिल पाती थी,उन्हें कभी घी-दूध के लिए तरसना पड़ता था। पर उनके पिता नें उनकी जरूरतों को पूरा करने के लिए हर संभव मेहनत की। जिसका नतीजा यह रहा कि साल 2006 में महाराष्ट्र के लातूर में हुई स्कूल नेशनल चैंपियनशिप में बजरंग नें कांस्य पदक जीता था। बजरंग यही नहीं रुके और इसके बाद उन्होंने साल 2009 में दिल्ली में बाल केसरी खिताब अपने नाम किया। 2013 के विश्व कुश्ती चैम्पियनशिप, बुडापेस्ट के 60 कि.ग्रा वर्ग में उन्होंने कांस्य पदक अपने नाम किया था। ग्लासगो, स्कॉटलैंड में आयोजित वर्ष 2014 के राष्ट्रमंडल खेल के 61 कि.ग्रा वर्ग में रजत पदक जीता था। वर्ष 2014 में ही एशियाई खेल इनचियन, दक्षिण कोरिया में फिर से रजत पदक अपने नाम किया। दिल्ली में एशियाई कुश्ती चैंपियनशिप 2017 में बजरंग पूनिया ने गोल्ड मेडल जीता था। हाल ही में 2018 के राष्ट्रमंडल खेल में भी उन्होंने गोल्ड मेडल अपने नाम किया था।

 

एशियन गेम्स में गोल्ड मेडल जीत कर देश का नाम रोशन करनें वाले बजरंग पूनिया अब तक कुल 5 गोल्ड, 3 ब्रोनज, 4 सिल्वर मेडल जीत चुके हैं। 2015 में बजरंग को खेल के क्षेत्र में उत्कृष्ट प्रदर्शन के लिए भारत सरकार द्वारा अर्जुन अवार्ड से भी नवाज़ा जा चुका है।

 
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