उसने भारत का प्रतिनिधित्व करने के लिए पिता के अंतिम संस्कार तक को छोड़ दिया, आज हैं हॉकी के बादशाह

जिंदगी ने हर मोड़ पर उसकी परीक्षा ली। जब वे 12 साल के थे तब उनकी माँ इस दुनिया से चल बसी और 20 साल के होने से पहले ही सर से पिता का भी साया उठ गया। उन्होंने भारत का प्रतिनिधित्व करने के लिए पिताजी के अंतिम संस्कार को छोड़ दिया जिंदगी में उनका साथ सिर्फ एक चीज़ ने दिया और वह है उनका जुनून। इस जुनून की बदौलत ही आज वे भारतीय हॉकी टीम का एक चमकता सितारा हैं वरना वे भी नशे का शिकार हो चुके होते। 

जी हाँ, हम बात कर रहे हैं आने वाले एशियाई खेलों में भारतीय टीम के गोलकीपर के रूप में दूसरे विकल्प के तौर चयनित हुए प्रतिभाशाली खिलाड़ी कृष्ण पाठक के बारे में। एक बेहतर जीवन के लिए नेपाल से भारत की ओर पलायन किये कृष्ण के परिवार को यहाँ भी आर्थिक परिस्थितियों से जूझना पड़ा। उनके पिता टेक बहादुर पंजाब के कपूरथला में एक क्रेन ऑपरेटर का काम करते थे। उनकी आय बस इतनी थी कि किसी तरह परिवार को दो जून की रोटी नसीब हो पाती थी। बचपन से ही कृष्ण भी अपने पिता के साथ निर्माण स्थलों पर मजदूरी करने जाने लगे, ताकि घर की आर्थिक स्थिति को थोड़ी और मज़बूती मिल सके।

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परिस्थितियों से जूझते हुए बड़े हुए कृष्ण ने हॉकी में अपने सुनहरे सपने को ढूंढा। वो कहते हैं न जब लक्ष्य को पाने की चाहत प्रबल हो तो परिस्थितियों को आपके आगे झुकना ही होता है। कठिन मेहनत कामयाब हुई और उनका चयन जूनियर हॉकी वर्ल्ड कप में भाग लेने वाली टीम में हुआ। लेकिन दुर्भाग्य ने अब भी उनका साथ नहीं छोड़ा था। उनके पिता की देहांत उनके अंतरराष्ट्रीय टूर्नामेंट से दो दिन पहले हुई। 

उनके जिंदगी की सबसे बड़ी परीक्षा अब उनके सामने थी। एक तरफ पिता का अंतिम संस्कार करना और दूसरी तरफ उन्हें इंग्लैंड की जूनियर टीम के साथ 7 मैच की सीरीज खेलनी थी। साल 2016 में होने वाले जूनियर हॉकी वर्ल्ड कप की तैयारी के लिए यह टूर्नामेंट बेहद जरूरी था। परिस्थितियों को देखते हुए कोच ने उन्हें छुट्टी पर जाने की अनुमति भी दे दी लेकिन कृष्ण के सामने देश के लिए खेलना सर्वोपरि था। 

वे बताते हैं कि मेरे लिए यह फैसला करना बहुत मुश्किल था। जब मैंने घरवालों से फोन पर बात की तो उन्होंने मुझे वापस आने के लिए नहीं कहा बल्कि मुझे आश्वासन दिया कि मुझे भारत के लिए खेलना चाहिए। 

छह महीने बाद भारत जूनियर हॉकी का विश्व चैंपियन बना और इसके पीछे कृष्ण जैसे प्रतिभाशाली और जुनूनी खिलाड़ी की मेहनत ही छिपी थी। परिस्थितियों को मात देकर सफल की एक शानदार कहानी लिखने वाले कृष्ण सच में प्रेरणा के स्रोत हैं।  

 

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