रिक्शाचालक की बेटी ने साबित कर दिया कि चुनौतियों का मुकाबला करने से सफलता मिलती ही है

कहते हैं न मन के हारे हार है और मन के जीते जीत। अगर कुछ कर गुजरने का ठान लिया जाए तो कुछ भी असम्भव नहीं है। जीवन में मुश्किलें आना लाज़मी है लेकिन उन मुश्किल हालातों में भी जो लोग अपनी मंज़िल की तरफ बिना रुके बढ़ते रहते हैं सफलता उनके कदम चूमती है। हमारी आज की कहानी भी देश की एक ऐसी ही बेटी की है जिसने कई मुश्किल हालातों का सामना किया लेकिन अपनी हिम्मत नही हारी और आख़िरकार अपनी मंज़िल को पा ही लिया। 

यह कहानी है पुणे की रहने वाली 17 वर्षीय ऋतुजा भोइट ल्युकोडर्मा से ग्रसित है लेकिन उनकी मंजिल तक पहुँचने से उन्हें उनकी यह बीमारी भी नही रोक पायी अब वे फुल टाइम स्कॉलरशिप पर थाईलैंड में अध्ययन करेंगी। ऋतुजा के पिता एक ऑटोरिक्शा चालक है और माँ घर में ही ब्यूटी पॉर्लर चलाया करती थी। आर्थिक रूप ऋतुजा का परिवार इतना सक्षम नही था की उनका सही तरीके से इलाज करवाया जा सकें। शुरुआत में ऋतुजा को बहुत ही असहज महसूस होता कि आखिर वह दूसरों से अलग क्यों हूँ उसे किसी से मिलने में झिझक होती थी । 

ऋतुजा बताती है कि " मैं अक्सर लोगो का सामना करने में डर महसूस करती थी मेरे मन में ये सवाल होता था कि क्या ये लोग मुझे ल्युकोडर्मा के साथ स्वीकार करेंगे या नहीं।" बचपन से ही ऋतुजा की बीमारी उसके जीवन का हिस्सा बन गयी और समय के साथ ऋतुजा ने भी इसे स्वीकार कर लिया बचपन से ही शर्मीले स्वाभाव की ऋतुजा पढ़ाई में बहुत ही होशियार रही है।

उन्होंने पुणे नगर निगम के संत गाडगे महाराज अंग्रेजी माध्यमिक विद्यालय में कक्षा 9 तक अध्ययन किया और उसके बाद पुणे के पास अवसर अकादमी में आगे के अध्ययन के लिए उन्होंने दाखिल लिया। जिसके बाद मई 2013 में उन्हें टीच फॉर इंडिया (टीएफआई) ब्रॉडवे-स्टाइल संगीत माया नामक कार्यक्रम में चुना गया  जिसमें पुणे के अलग अलग स्कूलों के 30 अन्य बच्चों ने भी हिस्सा लिया। ऋतुजा बताती है कि " जब से मैं म्यूजिकल माया का हिस्सा बनी मेरे जीवन में सब कुछ बदल गया। उस दौरान मैंने साहस, करुणा और ज्ञान के मूल्यों को सीखा। मैंने नए लोगों के साथ मिलकर खुलकर बातें करना सीखा। "

उसके बाद ऋतुजा ने टीएफआई के डिजाइन फॉर चेंज प्रोजेक्ट के तहत यौन उत्पीड़न और यातायात नियमों पर आयोजित कई नुक्कड़ नाटकों में भी भाग लिया जिसके चलते उन्हें टीएफआई फेलो से समर्थन मिला। माया प्रशिक्षण के दौरान ही वह एक ऐसे छात्र से मिली जिसने इटली में अपना यूडब्ल्यूसी पाठ्यक्रम पूरा कर लिया था अब ऋतुजा को अपना आगे का रास्ता मिल गया था की उसे कहाँ तक जाना लेकिन यह इतना आसान भी नही था क्योंकि कुछ शिक्षक चाहते थे कि वह कक्षा XI और XII तक एक ही जगह रहकर अध्ययन करें।

ऋतुजा इसी असमंजस में थी की उसकी मुलाकात टीएफआई फेलो में से एक कार्तिक आरजी से हुई और उन्होंने ऋतुजा को स्कॉलरशिप के लिए प्रेरित किया। उसके बाद ऋतुजा ने चयन के लिए होने वाली परीक्षा में आवेदन किया। यह परीक्षा दो चरणों से होकर गुजरती है साथ ही इसमें पर्सनल इंटरव्यू  एक टीम निर्माण गतिविधि और ग्रुप डिस्कशन शामिल था इस प्रक्रिया से गुजरने के बाद  29 मार्च को ऋतुजा को अपने चयन की खबर मिली जो उसके लिए किसी सपने के सच होने से कम नही थी। यूडब्ल्यूसी में चयनित होने के बाद अब ऋतुजा दो साल तक जीवविज्ञान, गणित और फ्रेंच का अध्ययन करेगी। ऋतुजा को थाईलैंड में यूनाइटेड वर्ल्ड कॉलेज (यूडब्ल्यूसी) में पूर्णकालिक छात्रवृत्ति प्रदान की गयी है। अपने पूरे परिवार में विदेश जाने वाली वह पहली सदस्य है जिसे लेकर उनका पूरा परिवार बेहद उत्साहित हैं। 

ऋतुजा की माँ बताती है कि "मैंने मेरी बेटी को हमेशा एक दर्द के साथ जीते देखा है लेकिन उसने हिम्मत नही हारी और ना ही अपनी पढ़ाई बन्द की वह आगे बढ़ती गयी।

टीच फॉर इंडिया की सीइओ शाहीन मिस्त्री का कहना है कि " हम बदलाव लाना चाहते है और ऋतुजा जैसे बच्चे अपनी क़ाबिलियत पर बदलाव के नायक बनते है।"

ऋतुजा ने साबित कर दिया की अगर आत्मविश्वास से मंजिल की और कदम बढाये जाए तो कोई रास्ता कठिन नही होता।

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