लोग ताना मारते थे "शराब बेचनेवाले का बेटा शराब ही बेचेगा", उसने IAS बनकर दिया करारा जवाब

कहते हैं कि दृढ़ संकल्पित होकर अगर कोई व्यक्ति कठिन-से-कठिन असंभव सा दिखने वाले लक्ष्य का भी पीछा करे तो सफलता एक-न-एक दिन अवश्य ही मिलेगी। जहाँ राह में आने वाली कठिनाईयों का सामना करते हुए कई बार हममें से ज्यादातर लोग टूट जाते हैं और अपने सपनों का त्याग कर देते। वहीं, कुछ लोग कठिनाईयों को चुनौती देकर सफलता की ऐसी शानदार कहानी लिखते कि पीढ़ी-दर-पीढ़ी उनकी कहानी प्रेरणा के लिए याद की जाती। हमारी आज की कहानी एक ऐसे ही व्यक्ति की है ,जिसने भीषण गरीबी को मात देकर समाज के सामने एक उदाहरण पेश किया है।

2013 बैच के आईएएस अफसर डॉ. राजेंद्र भारूड ने बचपन से ही जिन परिस्थितियों का सामना किया, वह अकल्पनीय है। महाराष्ट्र के धुले ज़िले से ताल्लुक रखने वाले राजेन्द्र जब अपनी माँ के कोख में थे, तभी उनके पिता का देहावसान हो गया। दो जून की रोटी के लिए माँ ने शराब बेचना शुरू कर दिया। 

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अपने संघर्ष के दिनों को शब्दों में बयां करते हुए राजेन्द्र कहते हैं कि " जब मैं माँ के गर्भ में था तभी पिता चल बसे। लोगों ने मेरी माँ से अबॉर्शन कराने को कहा, लेकिन उन्होंने इनकार कर दिया। घर का खर्चा चलाने के लिए माँ देसी शराब बेचने लगी, तब मैं 2-3 साल का था। मैं रोता था तो शराबियों को दिक्कत होती थी, इसलिए वो दो चार-बूंद शराब मेरे मुंह में डाल देते और मैं चुप हो जाता था। 

जिस बच्चे को दूध की जरूरत थी, उसके मुँह में शराब दे दिया जाता था। हालांकि, उस बेसहारा और भूखे बच्चे की भूख मिट जाती थी। वक्त बीतता गया, और राजेंद्र थोड़े बड़े हो गए। परिस्थितियां ज्यों की त्यों ही रही, लेकिन उन्हें इस बात का अहसास जरूर हो गया कि यदि इन परिस्थितियों से बाहर निकलना है तो शिक्षा ही एकमात्र ज़रिया है। उनकी मानें तो जब वे थोड़े बड़े हो गए तो शराब पीने आने वाले लोग उनसे कोई न कोई काम करने को कहते जैसे स्नैक्स आदि मंगाते। उसके बदले उन्हें कुछ पैसे देते। इन्हीं पैसों से वे किताबें खरीदते और पढ़ाई करने शुरू कर दिए। माँ ने भी उनका भरपूर साथ दिया। उनकी मेहनत रंग लाई और उन्होंने 10वीं 95 फीसदी अंकों के साथ पास की तथा 12वीं में 90 फीसदी अंक लाए। इस शानदार प्रदर्शन ने उन्हें आगे की पढ़ाई को जारी रखने के लिए प्रोत्साहित किया। फिर उन्होंने मेडिकल की परीक्षा भी सफलतापूर्वक क्रैक की और मुम्बई स्थित सेठ जीएस मेडिकल कॉलेज में दाखिला लिया। यह उनके सफलता की पहली सीढ़ी थी। उसके बाद उन्होंने कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा।

"शराब बेचनेवाले का बेटा शराब ही बेचेगा" ऐसा बोल कर उनके मेहनत का मज़ाक उड़ाने वाले लोगों को उन्होंने ऐसा जवाब दिया कि उन लोगों के लिए भी प्रेरणा के प्रतीक बन गए। इतना ही नहीं, सफलतापूर्वक मेडिकल की पढ़ाई खत्म करने के बाद उन्होंने यूपीएससी की परीक्षा में बैठने का निश्चय किया। दिन-रात के निरंतर मेहनत का नतीजा यह रहा कि उन्होंने सफकतापूर्वक यूपीएससी भी क्रैक कर दिखाया। उन्होंने साल 2012 में 527वें रैंक के साथ कामयाबी की एक नई कहानी लिखी। 

वर्तमान में राजेंद्र महाराष्ट्र के नंदूरबार ज़िले के कलेक्टर हैं। उनकी कहानी सच में प्रेरणा से भरी है। उन्होंने साबित कर दिखाया है कठिन मेहनत और दृढ़ इच्छाशक्ति से कुछ भी हासिल किया जा सकता है।

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