8000 रुपये की मामूली रकम, पर आइडिया दमदार था आज होती है करोड़ो की कमाई

बहुत कम लोग ही हैं जो अपनी अच्छी-खासी कॉर्पोरेट नौकरी को छोड़कर एक उद्यमी बनने का ख्वाब देखते हैं, लेकिन बेंगलुरु के 23 साल के सौरव मोदी ने बिलकुल कुछ ऐसा ही कर दिखाया है। उन्होंने अपनी कॉर्पोरेट की जॉब छोड़कर बिसनेस में हाथ आजमाने की कोशिश की और आज एक सफल उद्यमी हैं।

13 साल बाद आज जब वे पलट कर पीछे देखते हैं तो अपने 2015-16 के 6.5 करोड़ के टर्न-ओवर के साथ उनके मन में कोई पछतावा नहीं है। आज उनकी कंपनी बैग्स, बेल्ट, वॉलेट्स जैसे जूट प्रोडक्ट्स और कॉर्पोरेट गिफ्ट्स बनाती है। उनके प्रोडक्ट्स भारत के लगभग सभी रिटेल चेन में उपलब्ध हैं और कुछ यूरोपियन देशों में भी ये प्रोडक्ट निर्यात किये जाते हैं। बिना किसी शुरूआती अनुभव के शुरू कर उन्होंने धीरे-धीरे खुद से ही सब-कुछ सीखा और आज सफ़लता उनकी कदम चूम रही।

सौरव एक मिडिल क्लास परिवार से आते हैं और उन्होंने अपना बिज़नेस सिर्फ 8000 रूपये से शुरू किया वो भी अपनी माँ से कर्ज लेकर। उन्होंने सबसे पहले 1800 रुपये की एक सेकंड-हैण्ड सिलाई मशीन खरीदकर और एक पार्ट टाइम टेलर को जॉब में रखकर एक किराये के 100 स्क्वायर फीट के गेराज से अपना यह बिज़नेस शुरू किया। उनका यह शुरुआती दौर काफी मुश्किलों भरा था। सौरव 2007 में बहुत ही मुश्किल दौर से गुजर रहे थे, जब उनके 30 काम करने वालों ने स्ट्राइक कर दी पर उन्होंने इस कठिन समय को भी अपने साहस और मजबूत इच्छाशक्ति के बल पर झेल गए। आज उनके पास करीब 100 से ज्यादा काम करने वाले लोग हैं और उनकी यह फैक्ट्री बेंगलुरु के कामाक्षीपाल्या में 10,000 स्क्वायर फीट क्षेत्र में फैल चुका है।

क्राइस्ट कॉलेज से कॉमर्स में ग्रेजुएशन करने के पश्चात् सौरव ने अर्न्स्ट एंड यंग कंपनी में टैक्स एनालिस्ट की नौकरी ज्वाइन की और वहां उन्होंने लगभग डेढ़ साल गुजारे। इसके बाद वे यूएस से एमबीए करना चाहते थे, लेकिन आर्थिक स्थिति अच्छी नहीं होने की वजह से उनका सपना अधूरा ही रह गया।

मैंने कैलिफ़ोर्निया की यूनिवर्सिटी से एमबीए के लिए अपनी सीट सुरक्षित कर रखा था पर पीछे मुड़कर देखने से यह लगता है कि शायद यही मेरी नियति थी – जूट के सामान बनाना — सौरव मोदी

कुछ दिनों तक कॉर्पोरेट जॉब करने के बाद सौरव अपने पिता के बिज़नेस में लग गए। दो साल पिता के साथ काम करने के बाद कुछ नया करने की चाह में उन्होंने पिता का बिज़नेस छोड़ दिया। पिता ने भी उनके इस निर्णय का सम्मान किया क्योंकि वे खुद भी एक सेल्फ-मेड आदमी थे।

अपने पिता के सुझाव पर उन्होंने जूट के बिज़नेस में अपना भाग्य आजमाया क्योंकि बेंगलुरु में एक भी जूट प्रोडक्ट्स का उद्योग नहीं थाऔर फिर उनका यह आईडिया जस्ट जूट के नाम से उभर कर सामने आई। पिता के कस्टमर के द्वारा ही उनकी कंपनी को पहला ऑर्डर 500 जूट बैग बनाने का मिला। उनका सबसे बड़ा ऑर्डर 70,000 रूपये का था जो एककैंडल एक्सपोर्टर ने उन्हें दिया और फिर इस तरीके से उनका यह बिज़नेस चल पड़ा। और जैसे-जैसे उनके पास पैसे आते गए उनका बिज़नेस बढ़ता चला गया।  

साल2008 में उनका विवाह निकिता नाम की एक लड़की से हुआ, जो डिजाईन बैकग्राउंड से ताल्लुक रखती थी और इसलिए निकिता ने भी इस बिज़नेस को आगे बढ़ाने में सौरव की पूरी मदद की। आज उनके इस जूट बिज़नेस में विस्तृत कलेक्शन के हैंडबैगस, स्लिंग्स, वॉलेट्स, लैपटॉप बैग्स, और ऐसे बहुत सारे जरूरतमंद प्रोडक्ट्स हैं। इसके अलावा कुछ ऑर्गेनिक कॉटन और पोल्यूरेथेन जैसे फैब्रिक्स में प्रयोग करके उन्होंने और भी बहुत सारे प्रोडक्ट्स बनाये हैं। सौरव ने अपना बिज़नेस जस्ट जूट का लक्ष्य निर्धारित किया है कि आने वाले दस सालों में उनकी कंपनी का टर्नओवर लगभग 100 करोड़ हो जायेगा।

 

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