गरीबों के लिए लंगर लगाने में बेच दी करोड़ो की संपत्ति, कंगाली में भी किसी को नहीं सोने देते भूखा

आज की तारीख में कोई किसी के लिए कुछ करता है तो बदले में बहुत सी अपेक्षाएं भी पाल लेता है। मानवीयता को झकझोर के रख देने वाली घटनाएं हमारे सभ्य कहे जाने वाले समाज में आम होने लगी है। दूसरों के दुःख दर्द से हमे कोई फर्क नहीं पड़ता है आखिर क्यों हम ऎसे पत्थर हुए जा रहे है? हमारे शास्त्रों में तो परोपकार को सबसे बड़ा धर्म माना गया है जो दूसरे का दर्द समझ सके वही तो मनुष्य कहलाने का अधिकारी है और वर्तमान में ऎसे परोपकारी लोग बहुत कम मिलते हैं। कुछ इसी तरह के विलक्षण परोपकारी व्यक्तित्व के धनी व्यक्ति है जगदीश लाल आहूजा जिनसे हम आपको रूबरू करवाने जा रहे है। ये कलयुग में भी मानवीय मूल्यों को जीवित रखे हुए हैं दूसरों के दुःख को दूर कर रहे है। जगदीश जी जैसे लोग ही है जिन्होंने मानवता की डोर को थामे रखा है।

कभी करोड़पति रहे आहूजा ने एक–एक कर अपनी सारी संपत्ति परमार्थ हित में बेच दी और अब गरीबों के लिए लंगर लगा रहे हैं। आहुजा जी के लंगर का सिलसिला आज से 35 साल पहले उनके बेटे के जन्मदिन पर शुरू हुआ था जब उन्होंने सेक्टर-26 मंडी में लंगर लगाया था। और तब से अब उनका लंगर लगाने का सिलसिला बदस्तूर जारी है।

जगदीश लाल आहूजा का जन्म पेशावर में हुआ था और विभाजन के समय इनका परिवार रिफ्यूजी के रूप में 1947 में पटियाला आ गया। आहुजा जी 12 साल की उम्र में पटियाला में टॉफिया बेचकर अपना घर चलाया। 1950 में जब चंडीगढ़ पंजाब की नई राजधानी बनी तो उनके परिवार ने पटियाला से चंडीगढ़ का रुख कर लिया। तब जगदीश की उम्र 14 वर्ष थी और जेब में सिर्फ 12 रुपए थे। कई सालों तक उन्होंने ठेलों में घूम घूमकर फल और सब्जी बेचने का कार्य शुरू किया और अपनी मेहनत के बल पर 10 वर्षों में ही वे सब्जी और फल के थोक व्यापारी बन गए। 40 साल तक सफलता पूर्वक व्यापार करने के बाद उन्होंने व्यापार अपने पुत्रों को सौंप दिया। और अब वे तन– मन– धन से गरीबों के लिए अन्नदाता बने हुए हैं। आहुजा जी पढ़े–लिखे नहीं है उनके इस काम के लिए कई बार सम्मानित भी किया जा चुका है। साल 2004 में पंजाब के गवर्नर ने उन्हें सोशल वर्कर अवॉर्ड और चंडीगढ़ प्रशासन ने 2009 में उन्हें प्राइड ऑफ चंडीगढ़ के सम्मान से विभूषित किया था।

जगदीश को लोग ‘बाबा‘ और इनकी पत्नी को ‘जय माता दी‘ के नाम से जानते हैं। 80 साल के ये बुजुर्ग दम्पति प्रतिदिन एक हजार से डेढ़ हजार लोगों का पेट भरते हैं। वो भी बिना कोई विश्राम लिए। 15 साल से आहूजा दम्पति PGI के बाहर दाल, रोटी, चावल और हलवा बांट रहे हैं। उन्हें जानने वाले लोग कहते हैं कि “आहूजा जी ने एक से डेढ़ हजार लोगों को गोद ले रखा है।” आहूजा जी की उम्र आज 82 साल है और उम्र के इस पड़ाव पर स्वास्थ्य का पाया कमजोर होने लगता है लेकिन अपनी खराब सेहत के बावजूद वो आज भी रोज चंडीगढ़ PGI के बाहर जरुरतमंदों को खुद खाना खिलाने हैं। ये बुजुर्ग दंपति आज भी जिंदादिली और बिना किसी फायदे–नुकसान के जरुरतमंदों को खाना खिला रहे हैं।

जगदीश आहुजा ने भूखों को भोजन देने के लिए एक–एक कर अपनी करोड़ों की 7 प्रॉपर्टी बेच चुके हैं। यहाँ तक की हाल ही में उन्होंने अपने लंगर को चलने के लिए 1 करोड़ 60 लाख में अपना घर तक बेच दिया है। इस परोपकार के कार्य में उन्हें कई मुश्किलें आई लेकिन उनके सेवा भावना के आगे मुश्किलें बौनी साबित हुई। आज भी हर दोपहर आहूजा बाबा अपनी गाडिय़ों में भोजन भरकर सहायकों के साथ मेडिकल कालेज पहुंचते हैं और मरीजों के संबंधियों की विशाल संख्या को नि:शुल्क स्वच्छ पौष्टिक भोजन करवाते हैं। उसी प्रकार शाम को वे PGI में भोजन वितरण करते हैं। उन्होंने इस पुनीत कार्य के लिए 12 कर्मचारी नियुक्त किए हैं जो रोज एक क्विंटल आटे से 5000 चपातियां तथा अन्य सामग्री तैयार करते हैं।

इस कार्य का पूरा खर्चा आहूजा बाबा स्वयं उठाते हैं। इस कार्य के लिए किसी अन्य से वे किसी तरह की सहायता नहीं लेते। इस में कार्य में लगने वाले धन का प्रश्न है तो आहूजा जी कहते है की  “1950 से 1960 के बीच मैने चंडीगढ़ में कुछ प्लाट खरीद लिए थे। आज उनकी कीमत करोड़ों में है। बस उन्हीं को बेच–बेच कर यह कार्य कर रहा हूँ। मुझे नहीं मालूम कि इसमें कितना पैसा खर्च होता है। ना ही मैं इस ओर कभी ध्यान देता हूँ।“

आज आर्थिक स्थिति कमजोर होने पर भी उन्होंने लंगर के लिए किसी से पैसे नहीं मांगे। कभी वे PGI के अलावा 9 जगहों पर जरूरी सामान भी बांटा करते थे लेकिन रुपयों की कमी के कारण उन जगहों पर जाना कम हो गया है। बीच में एक समय ऐसा भी आया की आहूजा जी की आंतों में कैंसर हो गया। इसके लिए लंबे समय तक उनकी केमोथैरेपी होती रही। लेकिन इस बीच भी यह मुफ्त भोजन सेवा का सिलसिला निरंतर चलता रहा। आहूजा बड़े ही सहज भाव से कहते हैं कि “मुझे जब भी कोई भूखा नजर आता है तो मैं उसमें अपने बच्चे को देखते हैं और मैं अपने बच्चे को भूखा कैसे रख सकता हूँ।“

जगदीश लाल आहूजा दो साल पहले तक अपना सारा कामकाज खुद देखते थे। लेकिन गिरती सेहत की वजह से सिर्फ दो घंटे के लिए ही PGI जा पाते हैं। साथ ही अब धन की कमी की वजह से यह लंगर चलाना मुश्किल हो रहा है। वह कहते हैं कि ” मैं जब तक जीवित रहूँगा तब तक यह लंगर चलता रहेगा। लेकिन मैं चाहता हूँ की कोई व्यक्ति या संस्था आकर इस लंगर को चलाने की जिम्मेदारी ले जिससे बाद में भी यह यूँ ही चलता रहे।“

आहुजा जी का एक बेटा है जिसके बारे में वे बताते है कि “मेरे बेटे ने मुझे ये काम करने से कभी नहीं रोका। यहां तक की जब मैंने इस काम के लिए प्रॉपर्टी बेचने का फैसला किया तब भी मेरा बेटा मेरे साथ था मेरे बाद मेरा बेटा इस नेक काम को आगे बढ़ाएगा ऐसा मेरा विश्वास है।“आहूजा दम्पति का मानना है की आने वाली पीढ़ी को अपनी कमाई का कुछ हिस्सा गरीबों को देना चाहिए जिससे गरीबों की मदद हो। क्योंकि युवाओं के हाथ में ही देश को बदलने का जिम्मा है और यदि गरीबी को दूर करने में युवा अपना योगदान दें तो गरीबी को समाप्त करना कठिन नहीं है। इस करोड़पति को आज की तारीख में कंगाल कहना मुनासिब नहीं होगा क्योंकि बेशक जगदीश लाल आहूजा ने अपनी करीब करीब सारी संपत्ति बेच दी है और अब जेब में पैसे भी ज्यादा नहीं है लेकिन हजारों लोगों की दुआओं का बेशकीमती खजाना इसके पास है। जो कभी खत्म नहीं हो सकता।

किसी ने सच ही कहा है “शख्स बनकर नही शख्सियत बनकर जियो क्योंकि शख्स तो एक दिन चले जाते है और शख्सियत हमेशा ज़िंदा रहती है।“

 

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