भुखमरी के ख़िलाफ़ जंग की शुरुआत करने वाले अजहर हर दिन हज़ारों भूखे लोगों को भोजन मुहैया करा रहे

भोजन जीवन निर्वाह के लिए बहुत आवश्यक है। इसकी उपलब्धता की असमानता का मुकाबला कर पाना भारत जैसे प्रगतिशिल देश में आज भी एक बड़ी चुनौति है। भूख और भूखमरी का देश में अपने अस्तित्व का दावा अपने आप में एक कलंक है। जहाँ दोषपूर्ण खाद्य वितरण प्रणाली जिम्मेवार है वहीं कुछ लोग ऐसे भी हैं जो अपने स्तर पर इस जिम्मेदारी को उठाकर देश से इस कलंक को मिटाने की जुगत में लगे हैं।

भूख के खिलाफ इस जंग के यह महानायक न तो कोई संगठन चलाते हैं न कोई रईश बिजनेसमैन, न नेता, न कोई धार्मिक संस्था चलाते हैं या कोई ऐसी शख्सियत हैं जो अपने इस काम से कोई लाभ या ख्याति चाहते हो। एक सामन्य से पालास्टर आॅफ पेरिस के कामगार अजहर उस्मान मकसूसी खुद की दुकान में काम करते हैं। मगर हर रोज 100 से अधिक असहाय निर्धन और भूख से संधर्ष करते लोगों के लिए हर दिन एक वक्त के खाने की व्यवस्था की शुरुआत से आज देश के 8 जगहों पर हर दिन 1000 से अधिक लोगों के खाने की व्यवस्था करते हैं। उनके फेसबुक पोस्ट के मुताबिक उनकी मुहिम हंगर हैज नो रिलिजन (Hunger has NO Religion) के आज 2054 दिन हो गए। अनवरत रुप से चल रही उनकी मुहिम को अब पहचान मिलने लगी है और कई लोग इस काम में उनका साथ देने लगे हैं।

मई 2012 को हैदराबाद के दाबीरपुरा फालाईओवर, चंचालगुड़ा के नीचे जब पहली बार अजहर और उनकी पत्नी ने 15 लोगों को खिचड़ी के पैकेट बना कर बाँटने से शुरुआत की थी। मगर बाद में वे उस पुल के नीचे ही एक हेल्पर की मदद से भोजन तैयार करवा कर दोपहर में स्वयं लोगों को बैठा कर खिलाते हैं। हर दिन 25 किलो चावल, 2 किलो दाल और 1 लीटर तेल जिसका खर्च 1500 से 1700 रुपये होता था जिसमें बनाने वाले का खर्च भी शामिल था। जिस खर्च को वे खुद ही उठाते थे।

अभी फिलवक्त अजहर का यह मिशन 8 जगहों पर चल रहा है। जिसमें हैदराबाद में चार जगहों के साथ साथ कर्नाटका रायचुर और बेंगलुरु निमहांस हाॅस्पिटल एक असाम और एक अलिगढ़ में उनका आयोजन होता है। जिसमें हर दिन 1000 जरुरतमंदों के लिए भोजन की व्यवस्था होती है।

अजहर बताते हैं कि वे शायद ही कभी उस रास्ते से जाया करते थे। मगर एक रोज जब उनका स्कूटर पंचर हो गया तो वे ट्रेन पकड़ने के लिए उन्हें उस रास्ते से जाना पड़ा। उस पुल के नीचे एक औरत जिसका नाम लक्ष्मी था वह भूख से बिलख रही थी और लोंगो से पैसे की जगह खाना माँग रही थी। उसके एक पाँव कटे हुए थे। यह देख अजहर ने उसे अपना टिफिन खाने को दिया। इस से वे इतने उद्वेलित हो उठे और घर आ कर अपनी पत्नी और माँ से अपने इस इच्छा को रखा दोनो ही अजहर के इस निर्णय में उनका साथ देने का तय किया। 

अजहर मकसूसी भूख के दर्द को समझते हैं। क्या होता है जब भूखे पेट सोना पड़ता है? अजहर जब 4 साल के थे तो उनके पिता इस दुनिया में नहीं रहे। तमाम मुश्किल हालातों में उनकी माँ ने उन्हें पाला। कभी कभी जब वे अम्मी से खाना माँगते और घर में कुछ न होता तो वह कहती थी तुम पढ़ाई करो जब खाना बन जाएगा तो तुम्हें उठा कर खीला दूँगी और अजहर को भूखे सोना पड़ता था। 12 साल के अजहर एक दर्जी की दुकान में हर दिन 1 रुपये काम शुरु किया था। सिर्फ 5वीं जमात तक उर्दू में तामिल हासिल की। अल्लाह के रहमो करम से वे उस स्थिति में हैं जहाँ वे अच्छी जिन्दगीं जी रहे हैं। उनका रहन सहन बेहद साधारण है। जिस कारण वे यह कर पा रहें हैं। शुरुआत में लोंगो ने कहा कि यह कितने दिन कर पाएगा 2 से 3 दिन मगर आज 2054 दिन हो गए कारवाँ बढ़ता गया पर कभी रुका नहीं।

इन सब के बावजूद कभी भी उन्होंने किसी से कोई पैसे नहीं लिए सभी खर्च वे खुद के पाॅकेट से करते थे। लगभग डेढ़ साल बाद एक व्यक्ति रास्ता भटक कर उस फ्लाईओवर के नीचे आया। वह उधर से गुजरता था पर फलाईओवर के नीचे क्या होता है उसे नहीं पता था। उसने अपने भाई को यह बताया जो अमेरिका से आया हुआ था। उसने 25-25 किलो के 16 बोरे हर महीने देने शुरु किए। ऐसे प्रोत्साहन से अजहर को और हिम्मत मिलती गई। उनके कई दोस्त भी उनके इस मुहिम में साथ दे रहें हैं। 

केनफोलिओ़ज से विशेष बातचीत के माध्यम से अपने तमाम सोशल मिडिया मित्रों का शुक्रिया अदा करते हुए उनके साथ और हौसला अफजाई के लिए सब के शुक्रगुजार कहा है।

उन्होंने एक अपिल करते हुए कहा, "हमारे नाम, हमारे या हमारे लिए कोई किस्म की फण्डिंग के लिए लोंगो से अपिल न करें। अगर ऊपरवाला हमसे काम लेना चाहेगा तो हमारे पास सीधे जरीया आ जाएगा। हम जहाँ बैठे हैं वहाँ आ जाएगा। और इसके तहत ही इतने सालों से काम हो रहा है। तो यदि चाहने वाले हैं जोहमारे काम को आगे बढ़ाना चाहते हैं वो अपनी दुआओं से हमारा साथ दे न कि हमारे लिए किसी से कोई फण्ड की अपिल करें।"

वे अब भी किसी से कोई पैसे की मदद नहीं लेते। वे सिर्फ सामान लेते है। वे कहते हैं कि वे फेसबुक पर तस्विरे दान लेने के लिए नहीं डालते। वे लोंगो के बीच जागरुकता लाना चाहते हैं कि आज कितने लोग एक वक्त के खाने के लिए भी तड़पते हैं। अजहर चाहते हैं कि बेघर जनो को कपड़े और भोजन देने चाहिए पैसे नहीं क्योकिं कुछ लोग तो उन पैसों से खाना खाते हैं वहीं कुछ नशे पर खर्च कर देते हैं। कभी कभी कोई कोई नशे के हाल में खाना खाने आ जाते हैं। अजहर पहले तो कुछ नहीं कहते मगर खाने के बाद उन्हें बेहद प्यार से समझाते हैं।

युवाओं के लिए उनका संदेश है, "अपने लिए तो सभी जीते हैं, दूसरों के लिए जी कर देखो जिन्दगीं कामयाब लगने लगेगी। कोई भी दुनिया की डिग्री लेने से पहले अपने घर से इंसानियत की डिग्री लेकर निकलना।"

अजहर मकसूसी का मानवता के लिए शुरु किया यह एक छोटा सा प्रयास एक कारवाँ बन गया है। लोग इसमें सहर्ष भाग ले रहे हैं। भूख के खिलाफ की इस जंग में उन्हें और कामयाबी मिलें और भूख की समस्या का ऐसा हल हो कि किसी भी पेट को कभी भी भूखा न रहना पड़े।

 

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