लंदन की सड़कों पर वड़ापाव बेचकर करोड़ों का साम्राज्य स्थापित करने वाले दो दोस्तों की कहानी

जब एक जमी हुई नौकरी से अचानक एक रोज काम छोड़ देने का आदेश मैनेजमेंट की तरफ से आता है तो यह बहूत ही दुःखद और निराशाजनक होता है। वर्तमान परिस्थिति में कंपनीयाँ अपनी लागत कम करने के लिए करती है। ऐसे में कई कर्मचारी अवसाद ग्रसित हो जाते हैं। पर ऐसे में और हिम्मत और आत्मविश्वास जागृत करके आगे नए अवसर की ओर देखने की जरुरत होती है। आज की परिस्थिति मेंऐसे संकट का सामना करने के लिए सदैव तत्पर रहना चाहिए। ऐसी ही 2007 की मंदी के शिकार दो दोस्तों ने कैसे विकट परिस्थितियों से ऊबरे यह जानना रोमांचकारी है।

जब दो दोस्तों सुजय सोहानी और सुबोध जोशी के स्टार्ट अप 'श्री कृष्णा वड़ा पाव' की कहानी कुछ ऐसी है। परिस्थितियों ने तो इन्हें निराशा के गर्त में डूबाने की तैयारी कर रखी थी परंतु ये दोनो जीवट कहाँ हार मानने वाले थे। संकट के समय से ऊबर कर सुजय और सुबोध ने 4.4 करोड़ के टर्नओवर का व्यवसाय कर रहे है। लंदन में इन्होंने मुंबईया वड़ा पाव को एक क्विक फिक्स स्नैक्स के रुप में स्थापित किया। आज लंदन में 'श्री कृष्णा वड़ा पाव' के 4 आउटलेट है। जहाँ देशी विदेशी ग्राहक वड़ा पाव से स्वाद से संतुष्टी प्राप्त करते हैं।

2009 में जब वैश्विक अर्थव्यवस्था मंदी के दौर पर थी जिसके चपेट में तमाम छोटे बड़े देश आ गये थे। इस आर्थिक मंदी का असर रोजगार पर भी पड़ा और कईयों को काम से हटा दिया गया। लंदन में काम कर रहे सुजय और सुबोध को भी उसके काम से हाथ धोना पड़ा। सुजय एक पाँच सितारा होटल में पेय पदार्थ के प्रबंधक थे। नौकरी जाने के बाद आर्थिक समस्या बढने लगी और पैसो कि किल्लत ने परेशान कर दिया। दूसरी तरफ सुबध भी नौकरी की तलाश कर रबे थे। निराश सुजय सोहानी ने सुबोध जोशी से बात करी। दोनो ही मित्र बांद्रा मुंबई के रिजवी काॅलेज से 1999 में साथ ही होटल मैनेजमेंट की पढाई की थी। सुजय ठाणे मे रहते थे जबकि सुबोध वडाला निवासी थे। दोनो लंदन में ही काम करते थे। इस बातचीत में सुबोध ने कहा कि उसके पास तो 'वड़ा पाव' तक खरिदने के पैसे नहीं है। और यही 'वड़ा पाव' वह कुंजी शब्द उन दोनो के लिए बन गया जिससे उन्हें लंदन में वड़ा पाव के बिजनेस का आईडिया आया।

15 अगस्त 2010 में उन्होंने 'श्री कृष्णा वड़ा पाव' की शुरुआत की। उस वक्त एक अच्छे स्थल का चुनाव कम बजट में कर पाना बहूत ही मुश्किल था। पर एक पोलिश आईसक्रिम पाॅर्लर मालिक ने हिचकिचाते हुए उन्हें ₹35000 (400 पौण्ड) मासिक किराये पर जगह दिया। उन्होने वड़ा पाव ₹80 (1 पौण्ड) और ढ़ेबली एक दूसरे प्रकार का मुंबई स्नैक्स ₹131 (1.5 पौण्ड) में बेचना शुरु किया। मगर यह कोई जबसदस्त शुरुआत न दे सका और लाभ बिल्कुल नगण्य ही रहा। उन्होंने निश्कर्ष निकाला की उन्हें वड़ा पाव के लिए थोड़ी मार्केटिंग करनी पड़ेगी। वे दोनो नवसिखुए बिजनेसमैन अपने वड़ा पाव को लेकर सड़क पर आये और इसे इण्डियन बर्गर के रुप में पहचान करानी शुरु किया। इसे नियमित बर्गर से सस्ता और स्वादिष्ट बताया और जो वाकई में है। जहाँ बर्गर 4 पौण्ड (₹ 440) में था वही यह इण्डियन बर्गर आधे से भी कम 2 पौण्ड (₹175) में था। आने जाने वालों को मुफ्त में ही इसका स्वाद चखने को दिया। उनका यह टैक्टिक काम कर गया और इसका लाभ यह हुआ कि जल्द ही लंदनवासियों के बीच वड़ा पाव काफी प्रसिद्ध हो गया। 

अब उनका व्यवसाय के लिए पोलिश कैफे छोटा पड़ने लगा। और उन्हें बड़े जगह की जरुरत महसूस होने लगी। तभी एक पंजाबी रेस्टूरेन्ट उनके पास साथ काम करने का प्रस्ताव ले कर आया। सुजय और सुबोध दोनो को यह प्रस्ताव फायदेमंद लगा और दोनो तैयार हो गये। 7 साल पहले शुरु हुआ 'श्री कृष्णा वड़ा पाव' स्टाॅल एक रेस्तराँ का रुप ले चुका है और लंदन में ही इसके 4 रेस्तराँ है। 50,000 पौण्ड (4.4 करोड़) का टर्नओवर कर रहे उनके व्यवसाय में 35 कर्मचारी उनके साथ काम करते हैं। जिन्में भारतीय, रोमानियन और पोलिश मूल के लोग हैं। 

"नर हो न निराश करो मन को, कुछ काम करो कुछ काम करो।"

मैथली शरण गुप्त जी की इस कविता को अमुमन बोलचाल में हम सभी सामान्य रुप से कभी न कभी तो प्रयोग करते हैं। पर जो वास्तविक जीवन में इसके भावार्थो को अपना ले वह कभी किसी परिस्थिति में अपने आस पास निराशा नहीं फटकने देता है और अपने पुरुषार्थ और श्रम से अपने गौरव, मान, सम्मान को प्राप्त करता है और उन सबके लिए प्रेरणा बनता है जो निराशा में डूबे होते है। सुजय सोहानी और सुबोध जोशी की सफलता की कहानी इसका जीवंत उदाहरण है।

 

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