दृष्टिबाधितों के जीवन में रोशनी लाकर एक सशक्त दिव्यांग समाज का निर्माण कर रही है यह महिला

आपने अब तक कई ऐसे स्‍टार्टअप के बारे में सुना होगा जो घर के कमरे से शुरू हुए और करोड़ो की सीमा पार कर कामयाबी की नई ऊंचाइयों को छूते चले गए लेकिन आज जिस स्‍टार्टअप के बारे में हम बताने जा रहे हैं वह मात्र कमाई के साधनों तक सीमित नहीं है वह समाज सेवा से संबंधित है। 

पिछले 26 सालों से मधु सिंघल भारत में रह रहे दिव्‍यांगों की सहायता कर उन्‍हें शिक्षित और आत्‍मनिर्भर बना कर रही हैं। 90 के दशक में अपने पड़ोस के गरीब दिव्‍यांग बच्‍चों की सहायता करने के उद्देश्य से जो मुहिम मधु ने शुरू की थी उसमें दिव्‍यांग नई आशा लेकर उनसे जुड़ते चले गए और वह हरेक की कसौटी पर खरी उतरीं। 

मूक बधिर लोगों ने मधु सिंघल से गुहार लगाई कि वह पढ़ना चाहते हैं लेकिन ब्रेल लिपि में उनके लिए किताबें उपलब्‍ध नहीं है। इसके लिए 1992 में मधु ने बोलने वाली किताबों की लाइब्रेरी की शुरूआत की जिसमें उनका सहयोग 50 लोगों ने ऑडियो टेप बना कर दिया आज यह संख्‍या 2500 तक पहुंच चुकी है।

मधु ने दिव्‍यांगों को ही अपने कार्यक्षेत्र के लिए क्‍यों चुना इसका कारण भी बड़ा ही मार्मिक है। रोहतक हरियाणा में जन्‍मीं मधु बचपन से रोशनी की तरफ देख कर कुछ प्रतिक्रिया नहीं कर पाती थीं डॉक्‍टर से पूछने पर पता चला कि मधु की आंखों में देखने की शक्ति न के बराबर है। 50 लोगों के संयुक्‍त परिवार में मधु ने सामान्‍य जीवन जीते हुए 5 वर्ष बिता दिए। उनके माता पिता ने एक नेत्रहीन अध्‍यापक द्वारा ब्रेल लिपि में उन्‍हें पढ़वाना शुरू किया। 12 वर्ष की उम्र तक उन्‍होंने मधु को सामान्‍य स्‍कूल में पढ़ने के लिए तैयार कर दिया। सामान्‍य बच्‍चों के साथ नए स्‍कूल में मधु ने बेहद विषम परिस्थितियों का सामना किया लेकिन अपने सहपाठियों को अपनी योग्‍यता के आधार पर बता दिया कि वह किसी अलग ग्रह की प्राणी नहीं बस एकमात्र देख नहीं सकतीं अन्‍यथा उनमें और सामान्‍य बच्‍चों में कोई अंतर नहीं है। अपनी योग्‍यता का परिचय मधु ने बारहवीं में उत्‍तम स्‍कोर लाकर दिया। 

कॉलेज में भी मधु सभी लैक्‍चर्स को अपनी आवाज में रिकॉर्ड करतीं और घर आकर प्रतिदिन 40 से 50 पेज ब्रेल लिपि में लिख कर किताबें तैयार करतीं मानो अपनी उंगलियों को ही आंखे बना लिया हो। स्‍नातक और परास्‍नातक की डिग्री मधु ने प्रथम श्रेणी में उत्‍तीर्ण की। 

पिता के देहांत के बाद भाई ने अपना व्‍यापार और परिवार कानपुर ले जाने का निर्णय लिया तो मधु भी कानपुर चली गईं। पिता के बिना मार्गदर्शन की कमी उन्‍हें हमेशा खलती थी। वह चार साल तक भविष्‍य की राहों के बारे में शायद सोचती भर रहीं लेकिन कुछ कर नहीं पाई। इसी बीच ब्रेल लिपि की पुस्‍तकें पढ़ते हुए उन्‍हें पता चला कि कितने ही लोग इस विषय पर काम कर रहे हैं इसलिए वह भी बहुत कुछ समाज के लिए कर सकती हैं। 

स्‍वयं नेत्रहीन होते हुए उन्‍हें दिव्‍यांगों के लिए आत्‍मनिर्भरता सबसे ज्‍यादा जरूरी लगी। इसलिए वह प्रतिबद़ध हो गईं इस प्रोजेक्‍ट पर कार्य करने के लिए। मधु के बहनोई ज्ञान प्रकाश गोयल ने रोहतक में अपने ऑफिस में कई लोगों से मिलवाया और ऐसी संस्‍थाओं से भी मिलवाया जो समाज सेवा के लिए कार्यरत हैं। 

इस नई शुरूआत से मधु ने भी 1990 में मित्रज्‍योति के नाम से एक चैरिटेबल संस्‍था की शुरूआत की जिसका कार्य मूक बधिरों और दिव्‍यांगों की सहायता शिक्षा, सलाह, मार्गदर्शन और नई तकनीक के माध्‍यम से करना है। अपने कठिन परिश्रम और सेवा की सच्‍ची भावना के कारण ही उनहें अनेकों पुरस्‍कारों से नवाजा गया है। अपने कार्यक्षेत्र की नई चुनौतियों को वह नए सुअवसर कह कर संबोधित करने वाली मधु सिंघल एक सशक्‍त भारतीय दिवयांग समाज की रचनाकार हैं। 

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