गरीबी जिसको डिगा न पायी, रोज़ाना 90 लीटर दूध बेचकर अपने सपनो को साकार रूप देने में लगी है गांव की एक लड़की

अपने सपनों को साकार करने तथा अपने घर का खर्चा चलने के लिये रोज़ सुबह 4 बजे उठकर 90 लीटर दूध कंटेनरो में  भरकर ,उसकी बाइक शहर का रुख करती हैं। इतना पढ़ने पर निश्चित रूप से अपने किसी पुरुष की कल्पना कर ली होगी। जी नहीं हम बात कर रहे है चट्टान से भी ज्यादा मजबूत इरादो वाली एक लड़की “नीतू शर्मा’ की जो कठिन परिस्थितियों होने के बावजूद उनके आगे झुकने की बजाए उसको चुनौती देते हुए अपने सपनों का पीछा कर रही हैं।

राजस्थान के भरतपुर के एक गांव भंडोर खुर्द की रहने वाली 19  वर्षीय नीतू शर्मा दिखने में किसी  साधारण लड़की की तरह ही है परन्तु उनकी कहानी असाधारण और लोगो को प्रेरित करने वाली है। नीतू बेहद गरीब परिवार से आती है और  उनका सपना टीचर बनना है,लेकिन पिता बनवारी लाल शर्मा जो की एक  मज़दूर है, के पास इतने पैसे  नहीं थे  कि वह अपनी बेटी का पढ़ाई का खर्चा उठा पाएं, ने नीतू से कह दिया की हम लोगो की आर्थिक स्थिति काफी ख़राब हैं अतःवह अपनी पढ़ाई का ख्याल दिल से निकल दे और घर के कामों में मदद करे। लेकिन वो कहते हैं ना कि अगर सपने को पूरा करने की जिद्द कर लो तो दुनिया की कोई भी ताकत आपको रोक नहीं सकती और इसी जज़्बे से ओतप्रोत  नीतू ने फैसला किया की वह खुद आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर होगी लेकिन किसी भी कीमत पर अपनी पढ़ाई नहीं रोकेंगी और अपने टीचर बनने का सपना पूरा करेंगी। जिस गांव में लड़कियों को बिलकुल भी छूट नहीं दी जाती है. या तो उन्हें घर पर बैठा दिया जाता है या फिर शादी करवा दी जाती है वहाँ नीतू ने  आर्थिक रूप से स्वतंत्र होने के लिए गांव से दूध इकट्ठा  कर बाइक द्वारा  शहर में बचने का व्यवसाय चुना जहाँ अभी तक सिर्फ मर्दो का ही वर्चस्व था। इस काम में उनकी मदद उनकी बड़ी बहन सुषमा करती है ,उनके दिन की शुरुवात रोज़ सुबह 4 बजे होती है जब वह गांव के अलग अलग  किसान परिवारों के यहां से दूध इकट्ठा  करती है उसके बाद करीब 60 लीटर दूध को कन्टेनरो में भरकर व बाइक पर लाद कर अपनी बहन के साथ गांव से 5 किलोमीटर दूर शहर में बाटती है। करीब 10  बजे तक दूध बाँट लेने के बाद नीतू अपने एक रिश्तेदार के यहाँ जाकर कपड़े बदलती है और 2 घंटे के  कंप्यूटर क्लास में चली जाती है। क्लास खत्म होने के बाद लगभग 12 बजे वह गांव चली जाती है। गांव पहुँच कर वह पढ़ाई में लग जाती हैं और शाम होते ही दुबारा सुबह की तरह लगभग 30 लीटर दूध लेकर शहर चली जाती हैं। नीतू के परिवार में 5 बहने व 1 भाई है ,जिनमें से 2 की शादी हो चुकी है ,पिता मिल में मजदूरी करते है लेकिन उनको बहुत ही कम पैसे मिलते है।  इसलिए बाकी  बचे सभी भाई बहिनों  की जिम्मेदारी आज वह अकेले ही उठती हैं। नीतू दूध बेचकर 12 हजार महीना कमा लेती है। इसके अलावा गांव  में ही उनकी 10वी में पढ़ने वाली  छोटी बहन राधा की परचून की दुकान है जिससे थोड़ी मदद मिल जाती हैं। नीतू बताती जब तक वह अपनी दो बड़ी बहनो की शादी और स्वंम टीचर नहीं बन जाती तब तक वह दूध बेचना नहीं छोड़ेंगी।

नीतू की मेहनत और लगन देख स्थानीय लोग और अख़बार भी उनकी मदद के लिए आगे आये। खबर छपने के बाद लूपिन संस्था के समाजसेवी सीताराम गुप्ता ने नीतू शर्मा और उनके परिवार को बुलाकर 15 हज़ार का चेक और पढ़ाई के लिए एक कंप्यूटर दिया और साथ ही उनके पिता को आश्वस्त किया की उनकी सभी बेटिओ की शादियों  के खर्च के लिए  सरकार द्वारा चलायी योजनाओं को तहत धन मुहैया कराया जाएगा। नीतू के पिता बताते है कि "पहले उन्हें इस बात की बहुत चिंता थी कि कैसे वह अपनी बेटिओ की शादी करेंगे लेकिन आज नीतू ने उनकी सभी चिंता दूर कर दी।

सपने देखना तो हर किसी का हक़ है परन्तु हमारे समाज में कई बार सपने देखने का हक़ भी छीन लिया जाता है। अंत में विजेता वही बनता है जो पूरी शिद्दत के साथ अपने सपनो को पूरा करने के लिये ऐसे समाज को चुनौती देता है जिसका जीता जगता उदाहरण है नीतू जिन्होंने धारा के विपरीत जा कर अपनी एक अलग पहचान बनायीं है।

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