दो भाई जो बना रहे हैं टेक्नोलॉजी के माध्यम से गावों को डिजिटल और दे रहे हैं बेरोज़गारों को रोज़गार

"अगर उद्देश्य निश्चित हैं तो कामयाबी आपके पास जरूर आयेगी भले ही वक़्त थोड़ा ज्यादा लग जाए।" यह विचार एक ऐसे इंसान के हैं  जो आज सफलता के शिखर पर हैं लेकिन उसके कदम जमीन से अछूते नहीं हैं। हम बात कर रहे हैं पवन और श्याम गोदारा की जिनका लक्ष्य अपनी कंपनी का टर्नओवर बढ़ाना नहीं बल्कि ऐसे लोगो को रोज़गार दिलाना हैं जो अच्छी शिक्षा प्राप्त करने के बाद भी बेरोज़गार हैं। साथ ही भरतीय ग्रामीण लोगो को टेक्नोलॉजी के माध्यम से डिजिटल बनाना हैं जिसके चलते आज वह 11 हज़ार से भी ज्यादा लोगो को रोज़गार दे चुके हैं। वह लगभग  2  हज़ार शहरो और गांव में अपनी कंपनी के आउटलेट बनवा कर वहाँ के लोगो को डिजिटल बना रहे हैं। 

श्रीगंगा नगर में ताख़रा गांव के रहने वाले पवन व शयाम गोदारा शुरू से ही कुछ नया करना चाहते थे। कुछ ऐसा जो समाज में आमूल परिवर्तन ला सके। 2007 में पवन पढ़ाई करने जयपुर आये उसके बाद उन्होंने वही पर प्राइवेट यूनिवर्सिटी में लेक्चरार की जॉब ज्वाइन कर ली ,तभी इनके एक दोस्त ने इन्हे आईटी   कंपनी खोलने की सलाह दी। इस सलाह पर गंभीरता से सोचने में इन्हे थोड़ा समय लगा और नौकरी में रहते ही इन्होने  29 जनवरी 2010 में अपनी आईटी  कंपनी  "डोग्मा सॉफ्ट " का शुभारम्भ अपने 10 बाई 10  के कमरे से किया और 6 महीने बाद मात्र 500 रूपए में उसका रजिस्ट्रेशन करवाया।केनफोलिओस टीम  से बात करते हुऐ पवन बताते हैं कि " उन्होंने कंपनी तो खोल ली थी लेकिन समस्या यह थीं कि उनके पास कंप्यूटर नहीं थे ,इसके लिये उन्होंने अपने दोस्तों की मदद ले उनके कम्पूटरो पर काम शुरू किया। उनकी  कंपनी कॉलेज ,स्कूल व अन्य एजुकेशन सेक्टर के लिए वेबसाइट बनाने का काम करती थीं। जैसे जैसे तरक्की होती गयी उन्होंने मार्केट में एक दुकान किराये पर ली जिसका किराया 10 हज़ार रूपए था और उनकी खुद का  वेतन 11 हज़ार 8 सौ रूपए था ,लेकिन जब सफलता अर्जित करनी हो तो कुछ समझौते तो करने ही पड़ते हैं। इसलिये इन्होने और इनके भाई शयाम ने यह फैसला किया की यह अधिक फायदे के लिये और अधिक मेहनत करेंगे जिसमे वह सफल भी हुऐ और 2011 में अपनी कंपनी का प्राइवेट लिमिटेड के रूप में रजिस्ट्रेशन करवाया जिसके बाद उनकी कंपनी का नाम "डोग्मा सॉफ्ट प्राइवेट लिमिटेड " हो गया था और इसके  साथ ही इन्होने नौकरी छोड़ कंपनी को फुल टाइम देना शुरू कर दिया।"

जब दोनों भाइयो को अपने बिज़नेस से अच्छा रिस्पांस मिलने लगा तब इन्होने जयपुर में एक बड़ा फ्लैट लिया और अपने माता पिता को गांव से बुलाकर अपने पास रखा। इसी बीच दोनों भाइयो का विवाह भी हुआ। इस बारे में पवन बताते हैं कि "मेरी धर्म पत्नी को शुरू में कंप्यूटर की कोई जानकारी नहीं थी लेकिन मैने उनको कम्प्यूटर कोर्स करवाया और आज वह मेरे साथ कंपनी को सफल बनाने में कदम से कदम मिला कर चल रहीं हैं।" 

2014 में पवन की कंपनी पर  सफलता का टैग लग चुका  था।  लेकिन तब वह कुछ नया करना चाहते थे जो मॉर्केट में बड़ा बदलाव ला सके ,उस वक़्त दोनों भाइयों ने लक्ष्य निश्चित किया कि वे भारत के गांवों को डिजिटल बनायेंगे और सबसे महत्वपूर्ण बात यह रहीं कि वह बेरोज़गारों को खुद के गांव और शहर में ही रोज़गार प्राप्त करवायेंगे। इस नेक काम की शुरुवात पवन और शयाम ने गांवों में आउटलेट बनवाने से की तथा प्रत्येक आउटलेट में 80 ऑनलाइन सर्विसेज उपलब्ध करायी जायेंगी जिसमें मनीट्रांसफर ,बिजली के बिल का भुगतान ,बस ट्रेन व फ्लाइट की बुकिंग ,डिश रिचार्ज और टैक्सी बुकिंग  प्रमुख हैं। इस बारे बात करते हुऐ पवन बताते हैं  कि "हम ग्रामीण भारत की मूलभूत जरूरतो को पूरा करने का प्रयास कर रहे हैं और हमारी यह भी कोशिश हैं कि हम उनकी समस्याओ को टेक्नोलॉजी के माध्यम से दूर कर सके। हम हर गांव में एक एसोसिएट बनाते हैं जिसे हम नौकरी नहीं देते हैं बल्कि बिज़नेस करवाते हैं जिसके लिये सारा खर्चा हम ही करते हैं। अगर उसके पास कंप्यूटर नहीं हैं तो उसे मोबाइल पर काम करने की सुविधा देते हैं और एक इंटरनेट कनेक्शन दिलवाते हैं और उसके बाद वह अपने घर से ही काम शुरू कर सकता हैं। हर गांव में बैंक नहीं होता हैं और लोगो को अपने पैसे जमा करने के लिये काफी दूर जाना पड़ता था लेकिन अब गांव वाले उस एसोसिएट के पास जा कर और उसे कैश देकर मिनटों में अपने पैसे अपने एकाउंट में ट्रांसफर करा लेते हैं ।" 

पवन का लक्ष्य है की वह आने वाले वक़्त में 20 लाख लोगो को रोज़गार ,व 6 लाख 38 हज़ार गांवों को कवर कर सके। वे कहते है कि "हम लोगों को धीरे धीरे उनके पैरों पर खड़ा करने की कोशिश कर रहे हैं  साथ ही उनके सुरक्षित भविष्य के लिये एक हेल्थ इन्शुरन्स व पेंशन की सुविधा उपलब्ध करा रहे हैं और उनके बच्चों की शिक्षा पर भी विशेष ध्यान दे रहे हैं। इसके अलावा एसोसिएट की उत्साह वृद्धि के लिये उन्हें विदेश यात्रा भी कराते हैं।इन एसोसिएट्स को अगर अपना बिज़नेस बढ़ाने के लिये अगर पैसों की जरूरत होती हैं तो हम इन्हे बिना किसी गारंटर के लोन उपलब्ध कराते है।" 

पवन और श्याम ने बहुत थोड़े ही समय में  अपनी कंपनी को सफलता के नये आयाम तक पहुंचाया हैं और सबसे खास बात यह रही हैं कि उन्होंने आज तक बाहर से कोई भी फंडिंग नहीं ली हैं। 

पानी को बर्फ में ,बदलने में वक़्त लगता है ,ढले हुये सूरज को निकलने में वक़्त लगता हैं।     

थोड़ा धीरज रख ,थोड़ा और जोर लगाता रह किस्मत के जंग लगे दरवाज़े को खुलने में वक़्त लगता हैं। 

इन चंद शब्दों का जीता जागता उदाहरण हैं पवन व शयाम गोदारा जिनके  कठिन परिश्रम एवं सयंम ने उन्हें लोगों के लिये एक प्रेरणास्रोत बनाया हैं। 

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