कैसे IIM के निर्मल कुमार ने ऑटोचालकों का समूहन कर उन्हें आर्थिक रूप से सशक्त बनाया

वर्तमान में भारत हर क्षेत्र में तरक्की के नये आयाम तय कर रहा हैं। जहाँ एक ओर भारतीय युवा सफलता की नई ऊंचाइयां छू रहे हैं वही दूसरी ओर समाज की रूढ़िवादिता व अंधविश्वास का भी अंत हो रहा है। हमारे युवा अपने देश की तस्वीर बदलने की राह में क्रांतिकारी परिवर्तन ला रहे है। वह बस आगे बढ़ना चाहते है और कोई भी अवरोध उन्हें रोकने में नाकाम सिद्ध हो रहा है।फिर चाहे वह दिव्यांगता ही क्यों न हो। एक शख्स  ने आज समाज में दिव्यांगता शब्द की परिभाषा ही बदल डाली है। जी हाँ हम बात कर रहे है निर्मल कुमार की जिन्होंने  सर्वप्रथम भारत में ऑटो रिक्शा का समूहन कर " जी ऑटो " नाम से कंपनी शुरू करी। निर्मल का मकसद लोगो के मध्य ऑटो चालको की छवि को सुधरना और उनको आर्थिक रूप से मजबूत बनाना था।उनका यह सफर बड़ा ही रोचक एवं प्रेरणादायक रहा हैं जिस किसी ने भी उनकी इस संघर्ष से भरी इस यात्रा को पढ़ा या सुना वह उनसे प्रभावित हुए बगैर नहीं रहा ।

बिहार के सिवान जिले के रिसौरा गांव में 14 मई 1980 को निर्मल कुमार का जन्म हुआ पिता प्राइमरी स्कूल में टीचर थे और माता गृहणी।1980  के दशक में बिहार की देश के सबसे पिछड़े राज्यों में गिनती होती थी करोडो लोग गरीबी के कारण मूलभूत सुविधाओं से कोसो दूर थे। निर्मल का गांव भी बहुत पिछड़ा था। गांव में ना बिजली थी और ना ही कोई अस्पताल ,टेलीफोन तो दूर तक नहीं था । गांव में सभी लोग बहुत  गरीब थे उनमे से निर्मल के परिवार की माली हालत औरो से कुछ बेहतर थी  चुकि वो शिक्षक थे और तनख्हवा समय पर मिल जाती थी,लेकिन जब निर्मल मात्र तीन वर्ष के थे तो उन्हें पोलियो ने जकड़ लिया ,अस्पताल न होने के कारण माता पिता ने नीम हकीमो से इलाज करवाया , तंत्र मंत्र और जादू टोने का सहारा लिया परन्तु  निर्मल पर इसका कोई फर्क नहीं पड़ा और उनके हाथ पाँव और दूसरे अंगो का विकास सामान्य बच्चों की तरह नहीं हो पाया।

माता पिता ने निर्मल को स्कूल पड़ने भेजा ,शुरू से ही निर्मल पढ़ाई लिखाई में काफी तेज़ थे ,गांव में एक ही स्कूल था जहाँ गांव के सारे बच्चे पड़ने आते थे। अपने स्कूल को याद करते हुए निर्मल बताते है की कक्षा तीन तक बच्चों की क्लास पेड़ के नीचे लगती थी जहाँ बच्चे अपने घर से लाये टाट के बोरो को बिछाकर बैठते थे।चौथी और पाँचवी  कक्षा में स्कूल की ईमारत में बैठने का मौका मिला ,लेकिन अभी भी घर से लाये टाट के बोरो पर बैठ कर पड़ना पड़ता था। छटी में जाकर उनको बेंच पर बैठने का सौभांग्य प्राप्त हुआ इस अनुभव को याद करते हुए निर्मल बताते है की बेंच पर बैठने के बाद उन्हें एक स्टेटस फील हुआ और एहसास हुआ की वह बड़े हो गए है।

गांव का स्कूल सिर्फ सातवीं तक ही था आगे की पढ़ाई के लिए उन्हें गांव से 3 किलोमीटर दूर दूसरे स्कूल में जाना पड़ा ,अक्सर वह यह दूरी पैदल ही तय कर लेते थे और कभी अपने सहपाठी की साइकिल पर। निर्मल को शुरू से यह एहसास था की वह अन्य बच्चों की तरह नहीं है और आगे बढ़ने और जीवन में कामयाब होने के लिए उन्हें अच्छे से पढ़ाई करनी पड़ेगी और अपना सारा ध्यान उन्होंने पढ़ाई पर लगा दिया। अपनी लगन और दृढ़इच्छा के बल  पर रात में कनडील की रौशनी में पड़ते हुए भी हमेशा क्लास में अव्वल रहे।निर्मल ने वर्ष 1996 में हाईस्कूल फर्स्ट क्लास पास किया ,सभी विषयो में बहुत अच्छे अंक थे ,अपनी सफलता से उत्साहित निर्मल डॉक्टर बनने का सपना देखने लगे।पिता ने भी उनकी योगिता को पहचाना साथ ही इस बात को भी की गांव में रहकर वह अब आगे की पढ़ाई  नहीं कर सकते है । माता पिता और बड़े भाई से मिले  प्रोत्साहन  के कारण निर्मल ने आगे की पढ़ाई के साथ साथ मेडिकल की तैयारी के लिए पटना जाने का निर्णय लिया। कुछ बड़ा करने का जुनून लिए निर्मल पटना आ गए लेकिन शहर की चकाचौंद व लोगो का रहन सहन देखकर दंग रह गये ,सब कुछ गांव के माहौल से बहुत अलग था चोबीसों घंटे बिजली थी ,खान पान व बोल चाल भी अलग था ।पटना के संघर्ष पूर्ण माहौल ने उन्हें काफी आत्मनिर्भर बना दिया ,परचितो की मदद से छोटा सा कमरा ढूढ़ने के बाद खुद ही कॉलेज और ट्यूटर ढूंढा। विकलांगता होने के बावजूद वह अपना सारा काम बिना किसी की सहायता के खुद ही करते थे ,खाना भी खुद ही बनाते थे ,पढ़ाई का जुनून ऐसा की क्लास मिस न हो ,वह रोज़ अपने  कॉलेज का 14 -15  किलोमीटर का सफर पैदल ही कर लेते थे। निर्मल बताते है उन्होंने जी जान से पढ़ाई करी और ग्यारवी और बाहरवीं में अच्छे अंक प्राप्त  किए। बायोलॉजी और केमिस्ट्री में अच्छे अंक होने और फिजिक्स में डिस्टिंक्शन होने के बावजूद उनको  मेडिकल कॉलेज में दाखिला नहीं मिल पाया। बाहरवीं के दौरान ही मेडिकल की तैयारी करते हुए निर्मल ने अन्य संस्थानों के भी फॉर्म भरे थे अन्तः उन्होंने आंध्र प्रदेश के एन जी रंगा कृषि विश्वविधालय से बी टेक करने का निर्णय लिया। बी टेक करने के बाद वह IAS बनाना चाहते थे लकिन एक दिन उनके दोस्त ने उन्हें IIM तथा उसके बाद मिलने वाले पैकेज के बारे में बताया जिसे  जानकार  वह अचम्बित रह गए क्योकि इससे पहले उन्होंने IIM के बारे में कभी नहीं सुना था।उन्होंने IIM जाने का फैसला किया और बीटेक के बाद पहले एटेम्पट में कैट की परीक्षा पास कर  IIM अहमदाबाद में एडमिशन लिया। अपने नेतृत्व करने की काबिलियत वह विश्वविधालय में  बी टेक का दौरान ही दिखा चुके थे जब उन्होने यू पी और बिहार के अंग्रजी में कमजोर छात्रों के साथ मिलकर एक समूह बनाया था जो बी टेक की अंग्रेजी की पढ़ाई को लेकर सहज नहीं थे और परेशानिओ का सामना कर रहे थे।

निर्मल बताते है की  IIM की जिंदगी कई मामलों बहुत अलग सी थी। सिर्फ और सिर्फ हुनरमंद लोग ही यहाँ दाखिला ले पाते है और अलग अलग पृष्ट्भूमि से आये लोगो से बहुत कुछ सिखने का मौका मिलता है। पहले साल में उन्होंने प्रबंदन के सारे गुर सीख लिए थे और साथ ही  यह भी फैसला कर लिया की वह औरो की तरह नौकरी नहीं करेंगे और बिज़नेस की दिशा में बढ़ेंगे ,लकिन समझ नहीं पा रहे थे की करे क्या। तभी घटी एक घटना ने उनकी जिंदगी को नया आयाम दे दिया। हुआ यू एक दिन वह डिनर करने IIM  के बाहर निकले ऑटो चालक ने मीटर रीडिंग देख उनसे 25 रूपए माँगे। जब वापस वह ऑटो से उसी रास्ते से  IIM के गेट तक पहुंचे ऑटोवाले ने 35 रूपए मांगे जो की पिछली बार से 10 रूपए ज्यादा थी। जब उन्होंने ऑटोवाले से इस का कारण पूछा तो वह भड़क गया और ऊंची आवाज़  में बात करने लगा। बात को आगे न बढ़ाते हुए उन्होंने उसे 35 रूपए दे दिए लेकिन यह घटना उनके दिलो दिमाग पर छा गयी। निर्मल को एहसास हुआ की देश भर में कई लोग ऑटोचालकों की बेमानी और बतमीज़ी का शिकार होते होंगे इसी विचार से प्रेरित हो इन्होने ऑटोचालकों को व्यवस्थित करने की सोची जिसमे वह इन्हे प्रशिक्षित कर एक जिम्मेदार नागरिक बना सके। निर्मल पिछले एक साल में  अब तक प्रबंदन के गुर सीख चुके थे और अपनी योजना को अमलीजामा पहनने के लिए इन्होने IIM गेट से ही 15 ऑटो चालको को चुना जिनको ग्राहकों से कैसे बात की जाए इस बात का प्रशिक्षण दे कर तथा सभी को इस योजना का हिस्सा बनने का इन्सेन्टिव भी दिया साथ ही सभी के बैंक एकाउंट खुलवाये  और जीवन बीमा और दुर्घटना बीमा भी करवाया। ग्राहकों के लिए ऑटो में अख़बार और पत्रिकाए के साथ साथ मोबाइल फ़ोन चार्जर ,कूड़ादान और रेडियो की सुविधा भी उपलब्ध कराई। शुरू में यह काम बिलकुल भी आसान नहीं था ज्यादातर ऑटो वाले इस तरह के लीक से हटकर होने वाले काम को लेकर शंकित थे और रही सही कसर यूनियन वालो के विरोध ने पूरी कर दी थी फिर भी आत्म विश्वास से भरे निर्मल को प्रोजेक्ट के लिए जरूरी 15 ऑटो चालक मिल ही गये। निर्मल के पास उस समय लैपटॉप नहीं था वह सारी परियोजना का संचालन डेस्कटॉप के द्वारा ही करते थे बाद में एक मित्र के लैपटॉप पर अपना प्रेजेंटेशन बना कर उन्हें अख़बार और पत्रिकाओं के सम्पादको को दिखाते थे और उनसे  अपने ऑटो के लिए अख़बार और पत्रिकाए देने की गुज़ारिश करते थे। निर्मल को अपने इस प्रोजेक्ट पर इतना भरोसा था की खुद की पढ़ाई लोन पर चलने के बावज़ूद उन्होंने ऑटोचालकों को इन्सेन्टिव देने का जोखिम उठाया। कहते है इच्छा शक्ति के आगे परिस्थतियाँ भी हार मानती है और हफ्ते भर में ही इन्हे अच्छा रिस्पांस मिलने लगा। लोगो की सकारात्मक प्रतिक्रिया से उत्साहित हो कर निर्मल ने इस परियोजना का विस्तार करने की ठानी और सफलता भी प्राप्त करी। आज जी ऑटो से 21 हज़ार ऑटो चालक जुड़े है।  

ऑटो विज्ञापनो का प्रचार-प्रसार करने का उत्तम साधन होते है इसी कारण बहुत से कम्पनियो ने जी ऑटो का सहारा लिया तथा इससे कुछ आर्थिक रूप से भी मदद मिलने लगी। इसके अलावा एस बी आई  ,यूको बैंक,बैंक ऑफ़ बड़ौदा ,इंडियन बैंक आदि ने निर्मल की मदद की साथ ही इंडियन आयल ,एल आई सी और हिंदुस्तान जैसी कम्पनियो ने कॉर्पोरेट सोशल रेस्पोंसिबिलिटी के तहत योगदान दिया। साथ ही गुजरात के तत्कालीन मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी उनके काम की सरहाना की और उनकी कंपनी जी ऑटो जो बाद में  "निर्मल फाउंडेशन" बनी  की नींव रखने में जरूरी संसाधन मुहैया करने में मदद दी जो उनकी और उनके साथ काम करने वाले 21 लोगो की सैलरी की व्यवस्था करता है। निर्मल के  कुशल नेतृत्व के कारण परिवहन क्षेत्र में जी ऑटो इकलौती मुनाफा कमाने वाली कंपनी है ,अपने पहले ही साल में इसने 1.75 करोड़ रूपए का व्यवसाय किया और 20 लाख का मुनाफा कमाया।निर्मल की संस्था अभी 6 बड़े शहरो में काम कर रही है और भविष्य में वह इसे 100 नए शहरो में ले जाना चाहते है। शुरू में  ऑटो की बुकिंग फ़ोन के जरिए होती थी अब समय की मांग को महसूस करते हुए इंटरनेट और मोबाइल से भी होती है साथ ही इनका जी ऑटो ऐप भी काफी लोकप्रिय हो गया है। इसके अलावा कॉल सेंटर में भी फ़ोन करके ऑटो रिक्शा मगवा सकते है। कॉल सेंटर में ही ग्राहक किसी की शिकायत भी दर्ज़ करा सकता है और ऑटो में लगी जीपीएस सुविधा के चलते आसानी से ऑटो की लोकेशन को जाना जा सकता है।

आज निर्मल एक सफल बिज़नेसमैन है ,अपने व्यस्त जीवन में समय निकाल कर इन्होने 10 अक्टूबर 2009 में सिवान जिले की भगवानपुर के सारीपट्टी गांव की ज्योति से शादी की है। ज्योति एमएससी है और पैरो से दिव्यांग हैं। आज वह निर्मल के साथ जी ऑटो के संचालन में भरपूर योगदान दे रही है।

 

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