40 वर्षों से पश्चिम बंगाल की महिलाओं और बच्चों के कल्याण कार्यों की स्तंभ हैं रहीमा

टीवी में दिखाया जाने वाला एक विज्ञापन ‘’दाग अच्छे होते हैं’’ सही अर्थों में जीवन की एक बहुत बड़ी सीख देता है कि जीवन में घटने वाली त्रासदियों में मनुष्य की बहुत बड़ी भलाई छिपी होती है। क्योंकि त्रासदी के खिलाफ लड़ने की मुहिम उसके घटने के बाद ही शुरू होती है। तब निर्माण होता है एक सभ्य और संगठित समाज का।

1978 में पश्चिम बंगाल में आई बाढ़ में पश्चिमी जिलों के राज्य सबसे ज्यादा प्रभावित हुए। लगभग बीस लाख लोग बेरोजगार और बेघर हो गए और 50 लोगों ने अपना जीवन गंवा दिया। बाढ़ के बाद इन लाखों लोगों की लड़ाई जीवन की मुट्ठी भर आशा के साथ जारी थी। 

इन लाखों लोगों में नौ महिलाओं का एक ऐसा समूह उस समय तैयार हुआ जिन्होंने बाढ़ पीड़ित परिवारों और लोगों को पुनः घर एवं रोजगार दिलाने के लिए नारी-शिशु कल्याण केंद्र का संगठन बनाकर काम शुरू कर दिया। हालांकि समय के साथ-साथ इस संस्था ने अपने उद्देश्य में ग्रामीण मुस्लिम महिलाओं और बच्चों के उत्थान को भी शामिल कर लिया। 

रहीमा खातून इस संस्था की सचिव और सबसे कर्मठ कार्यकर्ता हैं। पिछले चार दशक से समर्पित भाव से मुस्लिम महिलाओं के अधिकारों के लिए काम कर रही रही रहीमा ने अब तक अनेकों महिलाओं और बच्चों की मदद की है। 

भारत में लगभग चार करोड़ के करीब आबादी अनपढ़ मुस्लिम महिलाओं की है। अशिक्षा ही इन महिलाओं और उनके बच्चों के लिए जीवन का सबसे बड़ा अभिशाप है। रहीमा की देखरेख में उनकी संस्था के केंद्र हावड़ा, मुर्शिदाबाद, दिनाजपुर, एवं सुंदरबन क्षेत्रों में महिलाओं के अधिकारों, रोजगार, आर्थिक सुरक्षा, शिक्षा, बच्चों के कल्याण एवं स्वच्छता के लिए काम कर रहे हैं। 

रहीमा ने नारी-शिशु कल्‍याण केंद्र की शाखा के अंतर्गत फ्रीडम ग्रुप नैपकिन संस्था की स्थापना द्वारा लड़कियों को सेनेटरी नैपकिन बनाकर तकनीकी ज्ञान की बढ़ोतरी के साथ स्वयं की सफाई की शिक्षा प्रदान करके अब तक की सफलतम कार्यप्रणाली को स्‍थापित किया है। इस संस्था द्वारा बनाए जा रहे सैनिटरी नैपकिन स्कूली लड़कियों को मुफ्त में बांटे जाते हैं। उसके बाद बचे हुए नैपकिन को बाजार में बेचा जाता है ताकि इस इकाई को चलाने का खर्चा निकाला जा सके। स्वच्छता के साथ साथ नैपकिन की इकाई रोजगार भी प्रदान कर सकती है यह संदेश गांव वालों को भली-भांति समझ आ चुका है। 

नारी-शिशु कल्याण केंद्र की कारवां शाखाओं में महिलाओं को सिलाई एवं ब्यूटीशियन के कोर्स भी सिखाए जाते हैं जिससे वह रोजगार प्राप्त कर सकें। महिलाओं की शिक्षा के क्षेत्र में काम करते-करते रहीमा ने महसूस किया कि मात्र शिक्षित होने भर से महिलाओं के जीवन में सुधार नहीं आ सकता जब तक रोजगार नहीं होगा महिलाओं की दुविधाएं खत्म नहीं होंगी। इसलिए सिलाई-कढ़ाई और सेनेटरी नैपकिन की इकाइयों के साथ-साथ गैर परंपरागत कार्य जैसे मोबाइल रिपेयरिंग एवं इलेक्ट्रिक कार्यों के क्षेत्र में भी ट्रेनिंग शुरू करवाई गई। 

पिछले 40 वर्षों के सफर से भी लंबा सफर अनेकों सामाजिक उद्देश्यों विशेष तौर पर शिक्षा को साथ लेकर रहीमा तय करना चाहती हैं, यही उनकी सबसे बड़ी उपलब्धि है। रहीमा महिलाओं को समाज और देश में परिवर्तन लाने वाली सबसे बड़ी धुरी मानती हैं। लेकिन यह तभी संभव है जब कि उन्हें अपने अंदर छुपी प्रतिभा और शक्ति का एहसास होगा। रहीमा का यह प्रयास अनवरत जारी रहेगा।

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