उस डॉक्टर की कहानी जिसने गांव का स्वास्थ्य ही नहीं भाग्य भी बदल दिया

पहले के जमाने में अक्सर कहा जाता था कि डॉक्टर भगवान का रूप होते हैं हालांकि आजकल के समय में यह कथन सुनने को मुश्किल में ही मिलता है। एक  गांव जहां 500 से ज्यादा लोग नम आंखों से एक डॉक्टर को विदाई दे रहे हों यह अविश्वसनीय तो है लेकिन इसका कारण जानकर आप अभिभूत हो जाएंगे। 

32 वर्ष के डॉक्टर किशोर चंद्र दास, ओडिशा के तेंतुलीखूंटी गांव को छोड़कर परा स्नातक की डिग्री लेने भुवनेश्वर जा रहे हैं, यह खबर सुनते ही प्रभु श्री राम के वनवास के समय उमड़ी अयोध्या वासियों की भीड़ की तरह सभी गांववासी उमड़ पड़े, डॉक्टर किशोर की एक झलक पाने को। नम आंखों से कुछ उनसे रूकने की गुहार कर रहे हैं और कुछ उनसे लिपट कर वापिस जरूर आने का वचन लेना चाहते हैं। आंखे तो डॉक्‍टर किशोर की भी नम हैं। आश्‍चर्य होता है डॉक्‍टर और मरीजों के रिश्‍ते के इस भावनात्‍मक पहलू को देखकर।  

पिछले 8 साल से डॉक्टर किशोर तेंतुलीखूंटी गांव के लोगों की सेवा में कार्यरत थे। क्या दिन क्या रात, मानो गांव का कम्युनिटी हेल्थ सेंटर उनका कर्म क्षेत्र था जहां वे निरंतर मरीजों की सेवा में लगे रहते थे। राजीव गांधी इंस्टिट्यूट बेंगलूरु से पढ़े किशोर ने डॉक्टरी का सफर ओडिशा के इसी गांव से शुरू किया था। 

8 साल के भीतर कम्‍यूनिटी  हेल्थ सेंटर में आधुनिक लैब, एयर कंडीशनड डिलीवरी रूम, ऑपरेशन थिएटर, ऑक्सीजन कंसंट्रेटर इत्‍यादि आवश्यक सुविधाएं जो शहरी अस्पतालों में मिल जाती हैं मुहैया करवाने का जिम्‍मा डॉक्‍टर किशोर ने लिया और उसे पूरा भी कर दिखाया। 

दूर से आने वाले मरीजों के समय की चिंता उन्हें इतनी रहती थी कि अपना अधिक से अधिक समय उनके लिए समर्पित था। मीलों दूर से लोग 300-400 रुपए  किराए के खर्च करके डॉक्टर किशोर के पास आते थे क्‍योंकि किशोर ही उनके विश्वासपात्र डॉक्टर हैं। 

2014 में जब पास के गांव में डायरिया फैला तो डॉक्‍टर किशोर ने अपनी टीम के साथ यहां के लोगों को बचाया। सरकार से प्रार्थना करके सीवर के पानी का बहाव स्थानीय कुंओं में जाने से भी रूकवाया। 

मात्र 24 वर्ष की उम्र में गांव वासियों की सेवा के इस जज्बे से डॉक्टर किशोर ने गांववासियों के शरीर को तो स्वस्थ किया ही है तेंतुलीखूंटी गांव को भी एक नया जीवन और आशा की नई किरण प्रदान की। 

डॉ. किशोर भुवनेश्वर में एक निजी मेडिकल कॉलेज-सह-अस्पताल में ऑर्थोपेडिक्स में स्नातकोत्तर डिग्री करने के लिए जा रहे हैं। गांव छोड़ने के पहले दिन भी उन्होंने अस्पताल के कैंपस में 500 पौधे लगाए। 

किशोर ने तेतुलीखूंटी के गांव के लिए जो किया उससे यह तो सिद्ध कर ही दिया कि इंसानियत को यदि पेशे से ऊपर रखा जाए तो अस्पतालों की शाखाओं की जरूरत नहीं सिर्फ डॉक्टर्स ही काफी हैं और ऐसे डॉक्टरों की हमारे देश और देशवासियों को बहुत जरूरत है। 

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