45 लाख की नौकरी छोड़ विदेश से गाँव में खेती करने लौट आया ये सख्श, बना दूसरों के लिए मिसाल

ग्रामीण पृष्ट भूमि के कवि हुए जिनका नाम तो मालूम नहीं पर वह घाघ उपनाम से लिखा करते थे। उन्होंने लिखा था-
"उत्तम खेती, मध्यम व्यापार, निकृष्ट चाकरी, भीख निदान’ पहले एक कहावत बहुत प्रचलित थी, इसका अर्थ है कि खेती सबसे अच्छा कार्य है, व्यापार मध्यम है, नौकरी निषिद्ध है और भीख माँगना सबसे बुरा कार्य है। सदियों से चली आयी ये अवधारणा आज बिलकुल उलटी हो गयी है। व्यापार आज भी मध्यम ही है किंतु नौकरी को अब सर्वोत्तम कार्य माना जाने लगा और खेती आज सबसे निकृष्ट बना दिया गया है। चाहे किसी बड़े किसान का बच्चा हो या किसी बड़े व्यापारी का बच्चा सभी का सपना अब एक अच्छी नौकरी करना ही रह गया है। पर इन धारणाओं को गलत साबित कर दिया है, 45 लाख सालाना की नौकरी छोड़ खेती को अपना कैरियर चुनने वाले इंजीनियर मनोज नायडू ने। जानिये मनोज के इंजीनियर से किसान बनने की पूरी कहानी।

◆कौन हैं मनोज-

मनोज नायडू रायपुर के बागबाहरा क्षेत्र के छोटे से गाँव चारभांठा के निवासी है। मनोज ने मेटलर्जिकल इंजीनियरिंग की पढ़ाई की है। इंजीनियरिंग करने के बाद मनोज की नौकरी सऊदी के कतर में एक सरकारी तेल कंपनी में लगी। वहाँ मनोज को 45 लाख का मोटा पैकज भी मिलता था। कंपनी में चार साल काम के बाद कंपनी ने प्रमोशन और अच्छा इंक्रीमेंट देने का प्रपोजल दिया था, पर मनोज को तो कुछ और ही करना था। मनोज ने इस प्रपोजल को ठुकरा दिया और गाँव वापस लौट कर खेती में कुछ कर दिखाने का मन बनाया।

◆लोगो ने उड़ाया मज़ाक, परिजन भी थे नाखुश-

मनोज के इस फैसले का हर किसी ने जमकर माखौल उड़ाया। साथियों ने कहा इतनी मोटी सैलेरी छोड़ तुम खेतों में हल कैसे चलाओगे, किसी ने कहा भाई बेबकूफी क्यूं कर रहे हो। परिजन भी उनके इस फैसले के सख्त खिलाफ थे क्योंकि उनकी सोच में भी खेती बेकार का काम था। घर वापस आने पर सबों ने मनोज को ख़ूब समझाया की वापस लौट जाओ, खेती किसानी में कुछ नहीं रखा है। लेकिन मनोज नहीं माने और उन्होंने अपने गाँव में खेती करने की ठानी

◆ परंपरागत तरीका छोड़ आधुनिक तरीकों पर दिया ज़ोर-

मनोज ने परंपरागत खेती को के बजाए आधुनिक खेती वा फसलों पर ध्यान दने का सोचा। इसके बाद मनोज ने अपने गाँव में 50 एकड़ ज़मीन पर कृषि फॉर्म बनाकर खेती करने का मन बनाया। मनोज ने देखा की उनके और उनके आसपास के सभी गाँव में बस चावल,गेहूँ जैसी फसल की ज्यादा लगायी जाती है। इसलिए मनोज नें फल और सब्जियों पर ज्यादा फ़ोकस किया मनोज ने फूल, मुनगा, टमाटर जैसी सब्जियों की खेती करनी शुरू की। उसके बाद धीरे-धीरे उन्हीने अपनी खेती का दायर बढ़ाया और तमाम तरह के सब्जियों को उगाना शुरू किया।

◆सुने पड़े ज़मीन पर भी लौट आई हरियाली-

खेती के प्रति लोगो की विकृत सोच के कारण मनोज के गाँव की बहुत सारी ज़मीन बिना खेती के सुनी पड़ी थी। कुछ साल पहले जिस जमीन पर घास भी नहीं उगते थे, वहाँ मनोज ने अपनी मेहनत से हरी-भरी हरियाली कर दी है। शुरूआत के कुछ समय की खेती के बाद जब मनोज को लाभ होने लगा तो उन्हीने और फसल लगाने का सोचा। इसके बाद मनोज ने टपक सिंचाई पद्धति से हाईब्रिड करेला, बीन्स, मिर्च, फूलगोभी,बंदगोभी, ग्वारफली, बैंगन, टमाटर आदि फसलों की खेती करना शुरू कर दिया। यह तरीका इतना कारगर साबित हुआ ही कम पैदावार वाली जमींन भी काफी उपजाऊ हो गई। आज उन्नत और अधिक उत्पादन के कारण मनोज को खेती से लाखों रुपये की आमदनी हो रही है।

◆अन्य किसानों के लिए बने प्रेरणा-

मनोज की तरह खेती और उससे हो रहे लाभ को देख उनके अगल बगल के गाँवों में उनकी काफी चर्चा होती है। उनको देख कई और किसान भी उनकी पद्धत्ति के हिसाब से खेती कर रहे है। बहुत सारे किसान दूर दूर से उनसे सलाह लेने भी आते हैं। यही नहीं बहुत सारे पढ़े-लिखे युवा भी नौकरी को छोड़कर खेती की ओर अग्रसर हो रहे हैं।

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