आतंकवादियों से लड़ते हुए खो दी अपनी आँख, फिर भी लिया ड्यूटी पर लौटने का निर्णय, CRPF अफसर चेतन की कहानी

जीवन में अक्सर हम ऐसे तमाम कठिन दौर से गुजरते हैं जहाँ हमे हमारी हिम्मत जवाब देने लगती है। हम हताश होकर हार के विषय में सोचने लगते हैं, ऐसे समय में हमे जीवन में कोई उम्मीद की किरण नहीं नजर आती। ऐसे तमाम मौकों पर हम खुदको अंधकार के गर्त में गिरा हुआ पाते हैं। यह सच है कि ऐसी हताशा से हमे अगर कोई बाहर निकाल सकता है, तो हम स्वयं हैं। हर इंसान को अपने आप के लिए संघर्ष के रास्तों पर चलते हुए मुकाम बनाना होता है। हालाँकि यह कार्य तब उतना मुश्किल नहीं होता जब आपने अपने जीवन में कुछ हासिल करने की ठान ली हो और अपनी हिम्मत और जज्बे से उस दिशा में प्रयास करने शुरू कर दिए हों। देश सेवा भी उसी जूनून, उसी हौसले और उसी हिम्मत से पनपता है। हम आये दिन अख़बारों में सीमा पर खड़े अपने जवानो के बहादुरी के किस्से पढ़ते हैं, उनमे से कुछ जवान देश सेवा के लिए अपनी जान तक दे देते हैं। हालाँकि इनमे से कई जवान ऐसे भी होते हैं जो देश सेवा के लिए अपनी जान पर खेल जाते हैं, बुरी तरह जख्मी हो जाते हैं लेकिन फिर भी देश के लिए अपने प्रेम को कम नहीं होने देते। ऐसे तमाम उदाहरण में से एक कमांडमेंट, चेतन चीता की कहानी आज हम आपको बताने जा रहे हैं। चेतन, उत्तर कश्मीर के बांदीपोरा के हाजिन क्षेत्र में आतंकवादियों के साथ एक साल पहले भीषण गोलीबारी में गंभीर रूप से घायल हो गए थे, लेकिन उस घटना के ठीक एक साल बाद उन्होंने वापस से ड्यूटी में लौटने का निर्णय लेते हुए बीते हफ्ते दिल्ली में सीआरपीएफ हेडक्वार्टर में ड्यूटी संभाली। आइये उनके जीवन के विषय में विस्तार से जानते हैं।

हो गए थे आतंकवादियों की गोली का शिकार, नहीं मानी हार

पिछले साल फरवरी के महीने में उत्तर प्रदेश के बांदीपोरा के हाजिन क्षेत्र में सीआरपीएफ की ओर से सर्च ऑपरेशन किया जा रहा था। इस सर्च ऑपरेशन के दौरना आतंकवादियों की एक टुकड़ी ने सीआरपीएफ की 45वीं बटालियन पर ताबड़तोड़ गोलियां चला दी थी। इस गोलीबारी में चेतन चीता गंभीर रूप से घायल होने के बावजूद लड़ते रहे और आतंकवादियों को मुँहतोड़ जवाब देते हुए उनके समस्त मंसूबों को नाकाम करदिया था। इस घटना के बाद भारत सरकार ने उन्हें देश के दूसरे सबसे पड़े वीरता पदक, 'कीर्ति चक्र' से सम्मानित किया गया था। उन्हें इस घटना के दो महीने बाद तक अस्पताल में भर्ती रहना पड़ा था, उसके बाद उन्हें ड्यूटी पर वापस लौटने के 1 साल का लम्बा इंतज़ार करना पड़ा। यह उनके लिए एक कठिन दौर इसलिए नहीं था कि वो मौत से अपनी जंग लड़ रहे थे, बल्कि इसलिए था कि उन्हें उस दौरान देश सेवा में खुदको समर्पित करने का अवसर नहीं मिल रहा था।

आतंकवादियों से लड़ते हुए खो दी अपनी आँख, फिर भी लिया ड्यूटी पर लौटने का निर्णय

पिछले साल आतंकवादियों के जिस हमले का चेतन शिकार हुए थे, वह इतना भीषण था की उन्हें अपनी एक आँख भी खोनी पड़ी। आमतौर पर उन्हें देखकर लोग ऐसा सोचने लगे थे कि वो शायद अब कभी साधारण जीवन नहीं जी पाएंगे लेकिन उन्होंने इसके बावजूद एक साल बाद ड्यूटी पर लौटने का निर्णय लिया। अगर हम उनके इस निर्णय को देश प्रेम की पराकाष्ठा कहें तो अतिश्योक्ति न होगी। 15 से 16 गोलियां अकेले अपने शरीर पर झेलने के बावजूद वो लड़ते रहे और देश को आतंकवादियों से बचाने में कामयाब रहे। वो जब हाल ही में अपनी ड्यूटी पर लौटे तो उनकी हिम्मत और हौसले को देखकर उनके साथियों को फक्र की अनुभूति हुई, उन्हें यह जानकार अत्यंत प्रसन्नता हुई कि चेतन जैसे साहसी एवं बलिदानी कमांडमेंट उनकी टीम का हिस्सा हैं।

मुठभेड़ में हुई थी उनके 3 साथियों की मौत, आज भी है चेतन को इस बात का अफ़सोस

उत्तर कश्मीर के बांदीपोरा के हाजिन क्षेत्र में आतंकवादियों के साथ हुई गोलीबारी में चेतन के 3 साथी जवान देश के लिए लड़ते हुए शहीद हो गए थे। हालाँकि चेतन को भी तमाम गोलियां लगी थी लेकिन भाग्यवश वो खुद को बचाने में कामयाब रहे, उन्हें इसके तुरंत बाद 2 महीने तक दिल्ली के एम्स अस्पताल में भर्ती रहना पड़ा था। इस घटना के बाद जब पहली बार उन्हें होश आया तो उन्होंने अपनी फिक्र किये बिना सबसे पहले यह पूछा कि उनके साथ जख्मी हुए 3 जवानों की हालत अब कैसी है? जब उन्हें यह बताया गया कि वो 3 जवान शहीद हो चुके हैं तो उन्हें इस बात का अत्यंत शोक हुआ और वो आज भी कहते हैं कि उन्हें अफ़सोस है कि वो अपने साथियों को बचाने में नाकामयाब रहे। 

ड्यूटी पर काफी समय से चाहते थे लौटना, आखिरकार मिला मौका

ऑपरेशन के बाद उन्होंने फ़िजिओथेरपी ट्रीटमेंट लेना शुरू करदिया, हालाँकि उनके शरीर पर आज भी गोलियों के निशान देखे जा सकते हैं। डॉक्टर्स का कहना है कि उन्हें पूरी तरह से स्वस्थ होने में अभी वक़्त लगेगा, वो फ़िलहाल अपनी ड्यूटी के दौरान हलके फुल्के कार्य करंगे, जैसे जैसे उनका स्वास्थ्य बेहतर होगा उन्हें बड़ी जिम्मेदारियां सौंपी जाएँगी। हालाँकि उनके परिवार वाले उनके इस निर्णय से चिंतित भी हैं, लेकिन चेतन का मानना है कि उन्हें किसी भी हाल में देश सेवा के लिए वापस से ड्यूटी पर लौटना है।

युवाओं के लिए हैं प्रेरणा का स्रोत

चेतन का मानना है कि देश के लिए युवाओं का आगे आना बेहद जरुरी है क्यूंकि वही हैं जो देश का भविष्य गढ़ते हैं। उन्होंने ड्यूटी पर लौटने से पहले माउंट आबू में सीआरपीएफ एकेडेमी में जाकर जवानों को मॉटिवेशनल स्पीच दी और कहा कि देश के युवाओं को ज्यादा से ज्यादा संख्या में सेना में शामिल होते हुए देश के प्रति समर्पित होना चाहिए। उन्होंने वहां मौजूद जवानों को भी यह सीख दी कि उन्हें किसी भी हालात में जंग-ऐ-मैदान से घबरा कर भागना नहीं चाहिए। उन्होंने वहां खुदके बारे में बताते हुए कहा कि, "डॉक्टर्स अभी भी मेरा ट्रीटमेंट कर रहे हैं, अभी मै पूरी तरफ से स्वस्थ्य नहीं हूँ लेकिन जल्द से जल्द हो जाऊंगा। मैं यह समझता हूँ कि देश को मेरी जरुरत है और इसलिए मुझे खुदको जल्दी से बेहतर करते हुए फील्ड में वापस से लौटकर ऐसे तमाम ऑपरेशन को अंजाम देना है।" उनकी बातें सुनकर न केवल जवान बल्कि देश का युवा भी देश सेवा के प्रति अपनी जिम्मेदारियों के प्रति सजग हो जाता है। वो हम सबके लिए प्रेरणा का स्रोत हैं।

वास्तव में चेतन जैसे सेना के कमांडमेंट ही देश को तमाम विरोधी एवं आतंकवादी घटनाओं से बचाते हुए देश को सुरक्षित रखते हैं। हमे उनके जीवन से न केवल देश प्रेम एवं देश सेवा की सीख मिलती है बल्कि जुझारूपन की भी सीख हासिल होती है। हम उन्हें उनके जज्बे के लिए सलाम करते हैं और उम्मीद करते हैं कि उनकी आशा के अनुरूप हमारे देश के तमाम युवा सेना में भर्ती होकर हमारा मान बढ़ाते हुए देश सेवा के प्रति समर्पित होंगे। 

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