व्‍यवसायिकता की दौड़ में एक डॉक्‍टर ऐसा भी जो है गरीबों का मसीहा

डॉक्टर का पेशा एक ऐसा पेशा माना जाता है जिसमे दया सहानुभूति और किसी की समस्या को समझने और उसका निराकरण करने की शक्ति निहित होती है। लेकिन आज के दौर में डॉक्टरी का पेशा व्यवसायिकता की चरम सीमा पर पहुँच गया है। दया सहानुभूति की भावना खोने लगी है। लगभग हर डॉक्टर व्यवसायिकता की दौड़ में अपने आप को आगे लाना चाह रहा है लेकिन कुछ डॉक्टर ऐसे भी हैं जो आज भी अपने पेशे को पूरी ईमानदारी से निभा रहे हैं। सेवा ही उनका पहला धर्म है और अपने धर्म का निर्वाह करना ही उनके जीवन का लक्ष्य। आज एक ऐसे ही डॉक्टर का परिचय हम आप से करवाने जा रहे हैं। 

 स्टेनली मेडिकल कॉलेज चेन्नई के एक पूर्व होनहार छात्र रहे डॉ थिरुवेंगदाम वीराघवन की जो निःस्वार्थ भाव से 1973 से व्यासपीढ़ी के निवासियों की सेवा कर रहे हैं। डॉ थिरुवेंगदाम तो आज भी मात्र दो रुपये लेने वाले डॉक्टर है जो चार दशक से भी अधिक समय से उत्तर चेन्नई में गरीबों का इलाज कर रहे हैं। अपने कार्य और व्यवहार से वह इतने लोकप्रिय होने लगे कि उनके साथ के और आस पड़ोस के अन्य डॉक्टरों ने एक साथ मिलकर उनका विरोध करना प्रारम्भ किया और मांग रखी की डॉ थिरुवेंगदाम मरीज़ो से कम से कम 100 रुपये परामर्श शुल्क लें। उसके बाद डॉ थिरुवेंगदाम ने अपने मरीजों से किसी भी प्रकार का शुल्क स्वीकार करना ही बंद कर दिया। लेकिन उनकी स्वयं की आवश्यकताओं की  पूर्ति भी आवश्यक थी। उनकी क़ाबिलियत से सभी वाकिफ़ थे इसलिए उन्हें एक बड़े कॉरपोरेट अस्पताल में नौकरी के लिए उम्मीदवारों को जांच करने के लिए नियुक्त किया गया और इससे उन्हें एक स्थिर आय मिलनी शुरू हो गई।

डॉ थिरुवेंगदाम बताते है की "मैंने अपनी फैलोशिप को राज्य सरकार की मदद से किसी भी खर्च के बिना अध्ययन करते हुए पूर्ण किया। पूर्व मुख्यमंत्री की नीतियों का आभार प्रकट करते हुए उन्‍होंने कहा कि मुझे रोगियों से शुल्‍क लेने के लिए बाध्‍य नहीं किया गया।

 डॉ थिरुवेंगदाम का सपना है की व्यासपीढ़ी की झुग्गी में रहने वाले गरीबों के लिए एक अस्पताल बना दिया जाए जहां आखरी साँस तक वे उनकी सेवा का कार्य करें। वर्तमान में वह ईराकंशेरी में एक क्लिनिक में 8 बजे से शाम 10 बजे और व्यासपीढ़ी में 10 बजे से मध्यरात्रि के बीच अशोक स्तंभ के पास बैठकर रोगियों को देखने का कार्य करते हैं। मद्रास मेडिकल कॉलेज में तो उन्होंने कुष्ठ रोगी मर्दों को कपड़े पहनाना तक सिखा दिया है।

डॉ थिरुवेंगदाम की पत्नी सरस्वती भारतीय रेलवे में अधिकारी के रूप में कार्यरत थीं और कुछ वर्ष पूर्व ही सेवानिवृत्त हुई है। उनके बेटे दीपक और बेटी प्रीती भी मॉरीशस के एक कॉलेज में दवाओं का अध्ययन कर रहें हैं। डॉ थिरुवेंगदाम अब चाहते है की उनका पूरा परिवार अब उनके साथ कार्य करे और गरीबों को उच्च स्तरीय इलाज उपलब्ध हो।

डॉ थिरुवेंगदाम का निःस्वार्थ सेवा भाव जवाब है उस प्रत्येक डॉक्टर के लिए जो व्यवसायिकता की आंधी में खोते जा रहे हैं और अपने पेशे को बदनाम कर रहे हैं।

 


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