आर्थिक तंगी की वजह से अपनों को खोने के बाद इस व्यक्ति ने दान के पैसों से समाज के लिए बना दिया अस्‍पताल

सुख और दुख मनुष्य के जीवन में इस तरह शामिल हैं जैसे दिन और रात। दुख आने पर यदि मनुष्य दूसरे के दुख को महसूस करके ऐसा समाधान खोज ले जिससे पूरा समाज लाभान्वित हो तो एक समय ऐसा आएगा कि दुनिया में कोई दुखी नहीं रहेगा। 

ऐसी ही एक शुरुआत की है सैयदुल लश्कर ने जो पेशे से एक टैक्सी ड्राइवर हैं। 12 साल पहले उनकी बहन को इलाज नहीं मिलने के कारण अपनी जान से हाथ धोना पड़ा था। बहन की मृत्यु से आहत लश्कर ने एक अनोखे मिशन की शुरुआत की। अपनी टैक्सी में बैठने वाली सवारियों से किराए के अतिरिक्त वह अस्पताल बनाने के लिए दान मांग कर इकट्ठा करने लगे। 

55 वर्ष की उम्र में उनका यह सपना साकार हुआ और कोलकाता से 55 किलोमीटर दूर पुनरी गांव में मरुर्फा स्मृति वेलफेयर फाउंडेशन के नाम से 36 लाख की लागत से बने इस अस्पताल की शुरुआत उन्होंने की। यहां आस-पास के सौ गांवों के लोगों को इलाज मिल सकेगा। 6 बिस्‍तरों वाले इस अस्पताल को अगले 6 महीनों में 30 बिस्तरों तक बनाने का लक्ष्य भी लश्कर ने रखा है। यहां 12 डॉक्टरों की टीम मरीजों को देखती है। एक्स-रे, ईसीजी मशीन की सुविधा के साथ, 20 रुपए ओपीडी शुल्क और दवाइयों की निशुल्क सुविधा विभिन्न एनजीओ द्वारा यहां मुहैया कराई जाएगी।  

23 वर्ष की सृष्टि घोष ने इस अस्पताल का उद्घाटन किया जो कालिकापुर में मैकेनिकल इंजीनियर है उन्होंने अपनी पहले महीने की तनख्वाह अस्पताल के लिए दान दी है। सृष्टि और उनकी मां लश्कर की टैक्सी में जब पहली बार बैठी थी तो उन्होंने सौ रुपए अस्पताल के लिए दान में दिए थे। चेन्नई में नौकरी मिलने पर चाहे सृष्टि कोलकाता नहीं आ पाई लेकिन इस अस्पताल में देने के लिए अपनी पहली तनख्‍वाह उन्होंने रख ली थी। लश्कर के इस महान कार्य से प्रेरित होकर सृष्टि ने  यह सहयोग करना अपना कर्तव्य समझा। 

आसपास के क्षेत्र में कोई अस्पताल नहीं होने के कारण गांव के लोगों को परेशानी होती थी। बहन की छाती में इन्फेक्शन के चलते 2004 में 17 वर्ष की उम्र में लश्कर की बहन चल बसी थी। किसी और के साथ ऐसा ना हो यह लक्ष्य पूरा करने का संकल्प लश्कर ने लिया था। 

सच्ची सेवा भावना के लिए भी किसी कार्य को शुरू करना एक चुनौती होती है।  बीघा जमीन खरीदने के लिए तीन लाख रुपए जुटाना लश्कर के लिए बहुत कठिन कार्य था। अपनी बीवी के सभी गहने बेचकर उन्होंने यह जमीन खरीदी। लश्कर की पत्नी शमीमा ने उन्हें हमेशा भरपूर सहयोग प्रदान किया। लश्‍कर अस्पताल में नर्सिंग ट्रेनिंग सेंटर खोलकर गांव की लड़कियों को ट्रेनिंग भी दिलवाना चाहते हैं। इसके लिए उनका प्रयास जारी है। 

अस्पताल की नींव रख कर जो शुरुआत लश्कर ने 12 वर्ष पहले की थी वह ना केवल इमारत का रुप ले चुकी है, बहुत से सकारात्मक लोग उनके साथ जुड़ते जा रहे हैं जो यकीनन इस अस्पताल को जरूरी सुविधाएं मुहैया करा रहे है और भविष्य में करवाएंगे। 

समाज के लिए अच्छा कार्य शुरू करने की देर होती है बहुत से ऐसे लोग जो शायद किसी के साथ का इंतजार कर रहे होते हैं। वह ऐसे कार्यों से जुड़ते चले जाते हैं शायद उनकी इस उपलब्धि से यह सिद्ध हो गया है।

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