वह गुमनाम हीरो जिसने अपनी व अपने परिवार की जान की परवाह किये बिना सैकड़ों की जान बचाई

इतिहास हमें अपने अस्तित्व से अवगत कराता है ये बात 100 प्रतिशत सही है। कुछ बाते हमे गौरवशाली होने का एहसास कराती है तो भारतीय इतिहास की कुछ दुखद घटनाएं हमारी आँखे नम कर जाती है । इतिहास में हमने क्या खोया और साथ ही ये एहसास कराती है आने वाले भविष्य में हम ये गलतियां दुबारा न दोहराये। हमारे देश नें इतिहास का ऐसा ही काला दिन देखा था 3 दिसम्बर 1984 को जब भोपाल स्थित यूनियन कार्बाइड नामक कंपनी के कारखाने से मिथाइल आइसो साइनाइट (मिक) नामक जहरीली गैस का रिसाव हुआ था। इसमें कई हजार लोगों की मौत हो गई थी। हजारों लोग शारीरिक अपंगता और अंधेपन का शिकार हुए थे। भारतीय इतिहास ने ऐसा दर्दनाक मंज़र नहीं देखा था। लोग इसे भोपाल गैस त्रासदी के नाम से जानते हैं। पर इस भयावह कांड में एक ऐसा शख्स भी था जिन्होंने अपनी व अपने परिवार की जान की परवाह किये बिना सैकड़ों की जान बचाई। जिसे भोपाल गैस त्रासदि का हीरो कहा जाए तो कम नहीं होगा।

इनका नाम है गुलाम दस्तगीर। गुमान उस वक़्त भोपाल के डिप्टी स्टेशन सुपरिटेंडेंट थे। जिन्होंने भोपाल गैस त्रासदी के उस भयानक रात को लाखों लोगों की ज़िन्दगी बचाई थी। उन्होंने अपने एक फैसले से सैकड़ों की जान बचाई ओर न बचा पाया तो अपने 3 बेटे और पत्नी को। भोपाल गैस कांड को 34 साल पूरे हो गए हैं, 3 दिसंबर 1984 की उस रात की यादें आज भी लोगों के जहन में जिंदा हैं जब भोपाल में हजारों लोग सोए तो थे लेकिन अगली सुबह लोग जागे ही नहीं। इस काली रात की आज तक सुबह नहीं हो सकी है। आज भी वह मंजर लोगों के दिलो को कचोट जाता है।यूनियन कार्बाइड की फैक्टरी से निकली गैस ने हजारों लोगों को मौत की नींद सुला दिया था।यूनियन काबाईड से जहरीली गैस रिसने का सबसे ज्यादा असर रेलवे पर हुआ। यहां 10 हजार कर्मचारियों की आबादी में 130 मौतें रिकार्ड हुईं। 1 घंटे के अंदर 21 व्यक्तियों की मौत हुई और 300 व्यक्ति बेहोश हुए।

उस रात डिप्टी स्टेशनअधीक्षक गुलाम दस्तगीर कुछ लंबित कागजी कार्य पूरा करने के लिए अपने कार्यालय में ही बैठे थे। इस काम ने उन्हें रात में 1 बजे तक अपने ऑफिस में ही बैठाये रखा। इसी बीच गोरखपुर मुंबई एक्सप्रेस के आने का समय हो गया जैसे ही वह बाहर निकले उनकी आंखों में जलन शुरू हो गई। उन्होंने अपने गले में खुजली महसूस की। उन्हें नहीं पता था कि यूनियन कार्बाइड की कीटनाशक कारखाने से लीक जहरीले धुएं रेलवे स्टेशन पर भी फैल चुकी थी। अब तक स्टेशन अधीक्षक हरीश धूर्वे समेत उनके तीन रेल सहयोगियों की मृत्यु हो चुकी थी। वह पूरी तरह से समझ नहीं पा रहे थे कि क्या हो रहा है। इसके बाद भी उन्होंने तुरंत कार्य करने का फैसला किया। जब स्टेशन मास्टर से कोई प्रतिक्रिया नहीं मिली। उन्होंने भोपाल को सभी ट्रेन यातायात को निलंबित करने के लिए विदिशा और इटारसी जैसे पास के स्टेशनों के वरिष्ठ कर्मचारियों को सतर्क कर दिया।

सवारियों से भरी गोरखपुर-कानपुर एक्सप्रेस पहले से ही एक प्लेटफॉर्म पर खड़ी थी और इसका जाने का समय 20 मिनट देरी का था। मगर अपने मन की बात सुनते हुए गुलाम दास्तागीर ने कर्मचारियों को बुलाया और ट्रेन को तुरंत प्लेटफॉर्म से रवाना करने लिए कहा। जब सभी ने पूछा कि क्या उन्हें तब तक इंतजार करना चाहिए जब तक कि ऐसा करने का आदेश प्रधान कार्यालय से नहीं आए, तो गुलाम दास्तागीर ने जवाब दिया कि वह ट्रेन के शुरुआती प्रस्थान के लिए पूरी जिम्मेदारी लेंगे।सभी नियमों को तोड़कर और किसी से अनुमति लेने के बिना, वह और उनके बहादुर कर्मचारियों ने व्यक्तिगत रूप से ट्रेन को आगे जाने के संकेत दे दिए। ये उन्हीं का दिमाग था जिसने कितने ही लोगों की जान बचा ली थी।

पीड़ित लोगों की भीड़ से घिरा हुआ स्टेशन जल्द ही एक बड़े अस्पताल सा दिखाई देने लगा। दस्तगीर स्टेशन पर रहे, दृढ़ता से अपना कर्तव्य कर रहे थे। उन्होंने इस बात की भी फिक्र नहीं की कि उनका परिवार भी शहर के बीचो-बीच बसा हुआ है। गुलम दस्तगीर के इस काम नें सैकड़ों लोगों का जीवन बचाया। हालांकि, इस आपदा का शिकार उनके घर वाले भी बनें। त्रासदी की रात को उनके बेटों में से एक की मृत्यु हो गई और दूसरे ने आजीवन के लिए स्किन इंन्फेक्शन हो गया। खुद दस्तगीर ने अपने 19 वर्ष अस्पताल में बिताएं। जहरीले धुएं के लंबे समय तक संपर्क में रहने के कारण उनके गले में संक्रमण हो गया। 2003 में जब वह अपनी लम्बी बीमारी से हार गए और दम तोड़ दिया। उनके मृत्यु प्रमाण पत्र से इस बात का खुलासा हुआ कि वह एमआईसी (मेथिल इस्साइनेट) गैस ही उनकी बीमारी और मौत का कारण बनी। सचमुच वह किसी हीरो से कम नहीं थे जिन्होंने अपने परिवार और खुद के जान को गवां कर सैकड़ों की जान बचाई।

Share This Article
378