96 साल की उम्र में साक्षरता परीक्षा में टॉप करने वाली इस महिला की कहानी किसी प्रेरणा से कम नहीं है

शिक्षा और साक्षरता के लिए देश में सभी को प्रयास करना चाहिए क्योंकि गरीबी से लड़ने के लिए, भ्रष्टाचार दूर करने के लिए और देश के समग्र विकास के लिए सभी का शिक्षित होना अनिवार्य है। कई बार हमें इसकी अहमियत बहुत देर में पता चलती है और हम यह कहकर इसे टाल देते हैं कि अब तो हमारी उम्र तो अब कमाने और परिवार चलाने की है।

पर "पढ़ने और सीखने की कोई उम्र नहीं होती"। यानी कि जीवन के किसी भी मोड़ पर हम कुछ भी सीख सकते हैं। ये जितना कहना आसान है करने में थोड़ा मुश्किल है। हमने कुछ सीखने की उम्र खुद ही तय कर रखी है। जैसे कि पढ़ाई लिखाई, गाड़ी या साईकल चलाना, तैराकी सीखना। इन सब के लिए हमारे मन में यही धारणा है कि शुरुआती दौर में इन्हें सीख लो तो ठीक लेकिन बढ़ती उम्र के साथ इनको सीखने की गुंजाइश कम होती जाती है। लेकिन फिर भी दुनिया में ऐसे भी लोग हैं जो अपने अंदर की सीखने की इच्छा को मरने नही देते और उम्र के ऐसे पड़ाव में नई चीजें सीख जाते हैं जो दूसरों के लिए नामुमकिन के बराबर था।आज हम आपको एक ऐसी वृद्ध महिला की कहानी बताने जा रहे हैं, जिन्होंने ना केवल 96 साल की उम्र में साक्षरता परीक्षा पास की बल्कि उसमें टॉप भी किया।

इनका नाम है कार्त्यानी अम्मा। 96 वर्षीय महिला कार्त्यानी अम्मा केरल राज्य के साक्षरता परीक्षा में 100 में से 98 अंक हासिल कर परीक्षा में टॉप किया है। यह परीक्षा मलयालम में आयोजित की गई थी। इस परीक्षा का आयोजन केरल सरकार 'अक्षरलक्षम् मिशन' के तहत करवाती है। अलपुज्जा ज़िले के चेप्पाड़ गांव में रहने वाली कार्त्यानी अम्मा को केरल के मुख्यमंत्री पिनाराई विजयन के हाथों अक्षरलक्ष्यम् साक्षरता सर्टिफिकेट दिया गया। बता दें कि कार्त्यानी अम्मा कभी स्कूल नहीं गईं। वे जब तक जीवित हैं, तब तक पढ़ना चाहती हैं। उनका परिवार मंदिरों और घरों में सफाई का काम करता था। फिलहाल कार्त्यानी अम्मा चेप्पाड़ गांव में अपनी बेटी और पोते-पोतियों के साथ रहती हैं।

अम्मा के पिता के एक टीचर तब बावजूद इसके वो और उनकी बहन शिक्षा से दूर रहीं। अम्मा को बचपन में अपनी पढ़ाई छोड़नी पड़ी इसका कारण उनके घर की आर्थिक स्तिथि का अच्छा न होना था। शादी के बाद उनके छह बच्चे हुए। अपने पति की मृत्यु के बाद अब सारे घर की ज़िम्मेदारी उनके ऊपर ही आ गयी।

बच्चों की परवरिश के लिए उन्होंने घरों में जाकर काम करने के अलावा स्वीपर का काम भी किया। हालांकि, वह थोड़ा बहुत पढ़ना जानती थीं। आज उन्होंने वहीं से पढ़ना शुरू किया, जहाँ से छोड़ा था। जिस उम्र में अक्सर बुजुर्ग लोगों का उठना-बैठना भी मुश्किल हो जाता है। वह स्वयं को सिर्फ भगवान नाम में लगाने के बारे में ही सोचते हैं। लेकिन अम्मा ने इस सोच को पीछे ढकेलते हुए शिक्षा प्राप्त करने के लिए कदम आगे बढाए हैं। ऐसे में अम्मा वाकई समाज के हर तबके के लिए एक प्रेरणा स्त्रोत हैं।

केरल सरकार की अक्षरलक्षम साक्षरता मिशन की इस परीक्षा में हिस्सा लेने वाली वे सबसे बुजुर्ग महिला थीं। इस परीक्षा में लगभग 43 हजार अभ्यर्थियों ने हिस्सा लिया था, जसमें से करीब 42 हज़ार नें यह परीक्षा पास की है। बता दें कि इस मिशन में लेखन, पाठन और गणित के कौशल को मापा जाता है। यह परीक्षा इसी साल अगस्त में हुई थी, जिसके नतीजे बुधवार को घोषित किए गए। सूत्रों के मुताबिक, अम्मा इससे पहले भी कई परीक्षाएं दे चुकी हैं। इस परीक्षा में 80 कैदियों ने भी हिस्सा लिया था। साथ ही अनुसूचित जाति के 2420 अभ्यर्थियों और अनुसूचित जनजाति के 946 अभ्यर्थियों ने भी हिस्सा लिया था।
परीक्षा तीन चरणों में आयोजित की गई थी। पहली 30 नंबर की रीडिंग टेस्ट,40 नंबर की मलयालम लेखन और 30 नंबर गणित के। इसमें अम्मा ने रीडिंग टेस्ट में पूरे नंबर लेकर आई।

बात दें केरल को पूर्ण साक्षरता वाला राज्य घोषित किया जा चुका है। लेकिन इसके बावजूद वहां अलग-अलग प्रकार के जन साक्षरता वाले अभियान जारी हैं ताकि जो भी कमी रह गई हैं उसे पूरा किया जा सके। इस अभियान में सीनियर सिटिजन, आदिवासियों, मछुआरों, झुग्गी बस्तियों के लोगों जो निरक्षर हैं उनपर खास ध्यान केंद्रित किया जा रहा है।  दरअसल यूनेस्को के नियम के मुताबिक अगर किसी देश या राज्य की 90 फीसदी जनसंख्या साक्षर है तो उसे पूर्ण साक्षर मान लिया जाता है।अब नए अभियान के द्वारा केरल सरकार ने 100 फीसदी साक्षरता दर हासिल करने का लक्ष्य बनाया है जिसके तहत समाज के हर वर्ग, हर व्यक्ति को साक्षर बनाने की कोशिश की जा रही है। ऐसे में इस उम्र में कार्त्यानी अम्मा के इस जज्बे नें सबको एक ऊर्जा देने का काम किया है।

 

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