मिलिए 50 सालों में 48 हजार खोए हुए बच्चों को परिवार से मिलाने वाले ‘माइक मूर्ति’ से

‘माइक मूर्ति’ सुनने में जितना दिलचस्प लगता है, उतनी ही रोचक मूर्ति के नाम के साथ यह विशेषण जुड़ने की कहानी भी है। दक्षिण भारत के धार्मिक उत्सवों में खोए हुए बच्चों की सूचना देने वाली आवाज लोगों को अकस्‍मात ही आकर्षित करती है, वह आवाज मूर्ति की है जो पिछले 50 सालों में 48 हजार बच्चों को अपने परिवार से मिला चुके हैं। 

ऐसे शुरू हुआ था मूर्ति का सफर

लगभग 54 साल पहले 1964 में रामेश्वरम के एक होटल में मूर्ति की आवाज की तरफ आकर्षित होकर एक पुलिस इंस्पेक्टर ने 10 साल के मूर्ति को पहली बार खोए हुए बच्चे की घोषणा करने के लिए पुलिस विभाग की तरफ से नियुक्त किया था। मूर्ति ने तब सोचा भी नहीं था कि यह काम उनके जीवन का उद्देश्य बनने जा रहा है। जिले के आईजी ने मूर्ति की पहली घोषणा पर खुश होकर उन्हें 100 रुपए  दिए थे। उस समय यह एक बड़ी रकम थी। तब से पुलिस विभाग ने मूर्ति को बड़े-बड़े धार्मिक उत्सवों में भीड़-भाड़ के दौरान बुलाना शुरू कर दिया।

50 वर्षों में अपनी प्रतिभा को निखारते रहे  

इस 50 साल के सफर में मूर्ति ने तमिल, इंग्लिश, मराठी, हिंदी, गुजराती, तेलुगु और कन्नड़ भाषा में भी घोषणा करना सीख लिया जिसके कारण रामेश्वरम जैसे मशहूर तीर्थ स्थल पर भी उन्हें बुलाया जाने लगा। मूर्ति के लिए वह पल बहुत संतोषप्रद होता है जब खोया हुआ बच्चा अपने माता पिता से मिलता है। बहुत वर्षों बाद मिलने पर भी माता-पिता माइक मूर्ति का धन्यवाद करना नहीं भूलते हैं।

मीठे ही नहीं कड़वे अनुभवों के भी साक्षी रहे 

अपने 50 साल के सफर में मूर्ति को मीठे और कड़वे दोनों ही प्रकार के अनुभव हुए हैं। सभी बच्चों को उनके मां बाप से नहीं मिला पाने का दुख भी मूर्ति को सालता है। ऐसी ही एक घटना में अनन्या नाम की लड़की के लिए पूरे दिन मूर्ति ने भूखे रहकर घोषणा की लेकिन शाम को अनन्या का शव मंदिर के पास तालाब में तैरता हुआ मिला। यह घटना आज भी मूर्ति को दुखी कर देती है। एक इस्लामिक उत्सव के दौरान 3 साल के गूंगे बहरे बच्चे शाहुल हामिद के खोने पर मूर्ति ने सिर्फ घोषणा करके ही अपने काम को खत्म नहीं माना, बल्कि पुलिस के साथ मिलकर आस-पास के गांव में बच्चे को ढूंढने में दिन रात लगे रहे। आखिरकार एक घर में बच्चा सुरक्षित मिल गया, गूंगा बहरा होने के कारण हामिद अपने माता-पिता के बारे में कुछ बता नहीं पा रहा था। निस्वार्थ सेवा का यह भाव मूर्ति के कर्तव्यनिष्ठ होने का प्रमाण है।

जान का जोखिम उठाकर भी अपने कर्तव्‍य के प्रति सजग रहते हैं मूर्ति 

उत्‍सव के दौरान भीड़ के चलते कई बार मूर्ति को अपनी जान का जोखिम भी उठाना पड़ा, जब लोगों के बीच झगड़े और विवाद की स्थिति आ गई लेकिन अपने कर्तव्य को समाज के प्रति जिम्मेदारी मानते हुए मूर्ति सदैव पूरा करते हैं। खोए हुए बच्चों की घोषणा के अलावा लोगों की मदद करने के लिए मूर्ति खोए हुए सामान की घोषणा भी करते हैं। इतना ही नहीं अपने मधुर और कुशल व्यवहार से कई चोरों को सामान लौटाने के लिए प्रेरित भी कर चुके हैं। एक धार्मिक उत्सव के दौरान एक महिला की सोने की चेन खोने पर मूर्ति ने घोषणा की कि चेन नहीं मिलने की स्थिति में महिला को आर्थिक रुप से गहरा आघात लगेगा। यह घोषणा होने के कुछ समय में ही भीड़ में से एक व्यक्ति निकल कर आया और उसने उस महिला की चेन लौटा दी। 

जिस तरह एक कुशल अभिनेता अपने चरित्र में स्वयं को ढाल लेता है। 64 वर्षीय मूर्ति ने भी ‘माइक मूर्ति’ के रूप में अपनी नौकरी को अपने जीवन का कर्तव्य और उद्देश्य बनाकर कर्तव्‍यनिष्‍ठा की एक अनूठी मिसाल कायम की है।

Meet Aaron Who Rescues Pets Through Telepathy

Meet Aaron Who Rescues Pets Through Telepathy