इस 11 वर्षीय बच्ची ने अपने सामने पड़े बम को देखकर जो किया, वह वीरता से भरे कामनामों में से एक है

बहादुरी के हर कारनामे को ताज नहीं मिलता। ऐसा ही दस साल की इस बच्ची के साथ है। सन 2009 में इस बच्ची ने अपनी दृढ़ इच्छाशक्ति के साथ जो अभूतपूर्व बहादुरी का कार्य कर दिखाया वह बेहद प्रशंसनीय है। अपने जीवन की परवाह किए बिना कठिन परिस्थितियों से भागने की बजाए इस बच्ची ने लड़ने का रास्ता चुना। 

प्रीटी देवी मणिपुर इंफाल के छोटे से कस्बे मयांग में अपने माता पिता के साथ किराने की दुकान चला कर गुजर बसर करती हैं। घर और दुकान के कामकाज में मां का बराबरी से हाथ बटाना इस छोटे से कस्बे की सुस्त रफ्तार जिंदगी का मानो मुख्य कार्य है। 30 मार्च 2009 की गर्मियों की दोपहर थी, अचानक प्रीति की निगाह अपनी दुकान में रखे एलपीजी सिलेंडर के पास गई, वहां बम जैसी दिखने वाली हानिकारक वस्तु उसे पडी हुई दिखी। देखते ही प्रीटी ने भांप लिया कि वह एक ग्रेनेड बम था। एक सेकेंड के लिए जैसे सब कुछ रुक गया। तभी अपनी मां की जोर-जोर से ‘भागो भागो’ चिल्लाने की आवाज सुनकर प्रीति की तंद्रा टूटी। लेकिन 10 साल की प्रीति को पता था कि यहां से दूर भाग कर वह दूसरे कोने पर सो रहे अपने पिता को नहीं बचा पाएगी। अपने विवेक से बिना रुके झटपट निर्णय लेते हुए प्रीति ने उस ग्रेनेड को उठाकर अपनी जिंदगी को खतरे में डालते हुए वहां से जितना दूर हो सकता था उछाल दिया और बम गिरते ही फट गया। बम के कुछ टुकड़े छिटककर प्रीति को घायल तो अवश्य कर गए लेकिन उसने बहुत सी जिंदगी को बचा लिया। 

2009 में इस तरह के जानलेवा हमले आतंकियों द्वारा लगातार मणिपुर में हो रहे थे जिसमें कई जाने भी गई। 30 मार्च 2009 को हुए इस हमले में अनेकों जानें दस  साल की इस बच्ची की बहादुरी से बच पाए। अपने माता पिता और दुकान पर खड़े ग्राहकों के लिए प्रीति जीवनदायिनी बन गई। 

10 साल की छोटी सी उम्र में अपनी जान को दांव पर लगाकर प्रीति का यह कारनामा अविश्वसनीय है। अपनी निर्भयता, शीघ्र निर्णय लेने की क्षमता और तत्परता जो प्रीति ने दिखाई वह हम सब के लिए एक मिसाल है। प्रीती की इस वीरता के लिए भारत की पूर्व राष्ट्रपति प्रतिभा पाटिल ने राष्ट्रीय वीरता एवं बहादुरी पुरस्कार से प्रीति को सम्मानित किया। 

मणिपुर के छोटे से गांव का एक हिस्सा आज प्रीति के कारण मुस्कुरा रहा है। ऐसे बहादुर बच्चों की कहानियां अधिक अधिक से अधिक लोगों तक अवश्य पहुंचनी चाहिए।

(मेघना गोयल द्वारा लिखित)

 

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