जंग के दौरान जख्मी हुए पैर को खुद ही काट डाला था इन्होंने, कुछ ऐसी ही है इस जांवाज सैनिक की दास्तान

भारतीय सेना दुनिया की सबसे बड़ी सेना है जो हमें दुनिया के सबसे ताकतवर देशों की कतार में लाकर खड़ा कर देती है। भारतीय सेना पर हर भारतीय को गर्व है और हो भी क्यों न, यह भारतीय सेना ही जो भारत को हमेशा दुश्मनों से दूर रखती है।सिर्फ दुश्मनों से ही नहीं, यहाँ तक कि देश में किसी भी तरह की आपदा हो भारतीय सेना हर समय देश को समस्याओं से बाहर निकालने में सबसे आगे रहती है। प्राकृति आपदा के समय भारतयी सेना भगवान के दूत की तरह लोगों की जान बचाने के लिए युद्ध स्तर पर अभियान चलाती है। वे भारतीय सैनिक ही हैं जो अपनी जान पर खेल कर हमारे वतन को सुरक्षित और स्वतन्त्र बनाये रखते है| उनकी वीरता और कर्त्तव्य-भावना के लिए पूरा देश उन्हें सम्मान की नज़रों से देखता है।

आज हम भारतीय सेना के एक ऐसे ही जवान की बात करनें जा रहे हैं जिन्होंने जंग में घायल होने खुद के पैर काट दिए थे।

इनका नाम है मेजर जनरल इयान कार्डोज़ो। कार्डोज़ो गोरखा रेजिमेंट के मेजर थे और बाद में वे भारत के पहले दिव्यांग मेजर जेनरल बनें। 7 अगस्त 1937 को मुम्बई जन्में इयान कार्डोज़ो नें अपने जीवन में ऐसी जांबाजी का परिचय दिया है जो किसी आम शख्स के लिए शायद मुमकिन भी ना हो। इयान कार्डोज़ो नें 1971 के बांग्लादेश मुक्ति युद्ध में शामिल हुए थे और उस वक़्त वे गोरखा रेजिमेंट के पाँचवीं बटालियन में मेजर थे। युद्ध में इंडियन आर्मी के इस जांबाज मेजर ने बांग्लादेश के सिलहट की लड़ाई में पाकिस्तानी सैनिकों के छक्के छुड़ा दिए थे। युद्ध के दौरान पाकिस्तानी सेना के खिलाफ लड़ते हुए उनका एक पैर लैंडमाइन ब्लास्ट में बुरी तरह जख्मी हो गया था।

ब्लास्ट के बाद एक बांग्लादेशी सैनिक उन्हें उठा के वापस कैम्प में ले गए। उनक पैर इतनी बुरी तरह से जख्मी को गया था कि तुरंत इलाज की जरूरत थी। ज़हर का पूरे शरीर में फैलने का खतरा था और तत्कालीन ईलाज की कोई व्यवस्था नहीं थी। यहां तक कि मॉरफिन और अन्य कोई दर्द निवारक दवा भी नहीं मिली।

उन्होंने अपनें सैनिक साथी से कहा कि "तुम मेरा पैर काट दो" पर किसी की भी ऐसा करनें की हिम्मत नहीं हुई। फिर उन्होंने अपने बटालियन के एक सदस्य से खुकरी मांगी और खुद ही अपना पैर काट लिया। उस वक़्त उनको कितनी लीड हुई होगी शायद उस दर्द को हम समझ भी नहीं पाएंगे और खून बहता जा रहा था सो अलग।

टांग कट जाने के बाद उनके पैर की सर्जरी किए जाने की बहुत जरूरत थी।त भी उन्हें एक अफसर ने बताया- ‘हमने जो पाकिस्तानी फौजी बंधक बनाए हैं उनमें एक सैनिक अधिकारी सर्जन मेजर मोहम्मद बशीर भी हैं।’ इतना सुनते ही मेजर इआन नें कहा कि - ‘मैं किसी पाकिस्तानी से सर्जरी नहीं करवाऊंगा और ना ही किसी पाकिस्तानी का खून मुझे चढ़ाया जाए।’ मौत से लड़ रहे किसी शख्स से ऐसे जवाब की उम्मीद तब किसी को नहीं थी। खैर, किसी तरह मेजर इआन को मनाया गया और पाकिस्तानी डॉक्टर ने उनकी सर्जरी की। ऑपरेशन के वक्त की बाकी दूसरी शर्ते मान ली गईं औए मेजर कार्डोज़ो को किसी पाकिस्तानी नागरिक का खून नहीं चढ़ाया गया।

वह जंग तो भारत जीत गया पर मेजर इआन कार्डोज़ो के जीवन की जंग तो अभी बाकी थी। बाद में सर्जरी द्वारा उनके कटे हुए पैर में लकड़ी के पैर लगाए गए। मेजर कार्डोज़ो नें कभी ऐसा नहीं सोचा कि उनका एक पैर लकड़ी का है, वे हमेशा मानते थे कि उनके दोनों पैर मौजूद हैं। एक पैर लकड़ी का होने के वाबजूद उन्होंने फौज में अपनी सेवाएँ जारी रखना चाहते थे और साथ पदोनत्ति के लिए भी प्रयास करते रहे। पर सेना के सीनियर अफसरों ने कहा कि अब आपको प्रमोट नहीं किया जा सकता क्योंकि आप विकलांग हो गए हैं। लेकिन इयान कार्डोज़ो कहाँ हार मानने वालों में से थे। वे अपनी फिटनेस को चुस्त दुरुस्त करनें में लग गए। और पर प्रैक्टिस से खुद को ऐसा बना लिया कि वो लकड़ी का पैर भी उनके शरीर के एक असली अंग की तरह हो गया।

उन्होंने सेना के अफसरों से कहा कि आप मुझे किसी की आम सैनिक के साथ दौड़ाइये मैं उनसे तेज दौडूंगा। हुआ भी कुछ ऐसा ही उन्होंने इतनी प्रैक्टिस कर ली थी कि दौड़ के टेस्ट में सात अफसरों को पीछे ही छोड़ डाला। यही नहीं उनका अगला टेस्ट तो सेना प्रमुख टी एन रैना ने लिया जिसे पास करने के लिए मेजर कार्डोज़ो ने छह हजार फुट की पैदल चढ़ाई करनी थी और वे सफल भी रहे। इसके बाद मेजर कार्डोज़ो को फाइनल फिटनेस साबित करने के लिए सेना प्रमुख उन्हें लद्दाख ले गए। जहाँ उन्हें वर्फ़ीले पहाडों पर चलने को कहा गया, वहाँ भी मेजर कार्डोज़ो आराम में बर्फीले पहाड़ों पर चल रहे थे। सेना प्रमुख भी उनके साहस को देख नतमस्तक को गए और उनकी तरक्की के कागजात पर दस्तखत कर दिए। जिसके बाद मेजर कार्डोज़ो को मेजर जनरल बना दिया गया।

इसके बाद मेजर जनरल कार्डोज़ो को भारतीय पुनर्वास परिषद का चैयरमैन भी बनाया गया। जहाँ उन्होंने 2005 से 2011 तक आपनी सेवा दी। उन्होंने वॉर और सेना से जुड़ी कई किताबें भी लिखी है। वे एक मैराथन रनर भी है और लगातार मुम्बई मैराथन में भी भाग लेते हैं। उनकी पत्नी का नाम परसिल्ला है और उनके तीन बेटे भी हैं। फिलहाल वे अपने परिवार के साथ दिल्ली में रहते हैं।

मेजर जनरल कार्डोज़ो की कहानी इतने साहस से भरी है कि इसे सुनकर हमारे रागों में खून और तेज़ी से दौड़ने लगता है। 

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