एक साल पहले जिस गाँव में नहीं था एक भी शौचालय, इस दृष्टिहीन शख्स के प्रयासों से आज है खुले में शौच मुक्त

स्वच्छता, विकास और सामाजिक परिवर्तन तीनों का आपस में काफी घनिष्ठ सम्बन्ध है। एक विकसित समाज की पहचान का संकेतक समाज में स्वास्थ्य और स्वच्छता का स्तर है। किसी भी समाज, जहाँ के लोग गन्दगी में रहते हों और स्वास्थ्य के स्तर पर कमजोर हों उन्हें विकसित या सभ्य नहीं कहा जा सकता। स्वास्थ्य का सम्बन्ध अनिवार्य रूप से स्वच्छता से जुड़ा हुआ है। इसलिए जहाँ स्वच्छता है वहीं स्वास्थ्य है। साथ ही जहाँ स्वास्थ्य है, वहीं विकास और प्रगति भी है। क्योंकि एक स्वस्थ समाज के सदस्य ही एक बेहतर मानव संसाधन हो सकते हैं और राष्ट्र के विकास में सहयोगी भी।

खुले में शौच मुक्त के बिना स्वच्छ हर स्वास्थ्य समाज का निर्माण संभव ही नहीं है। इसको लेकर भारत सरकर नें महत्वाकांक्षी योजना स्वच्छ भारत अभियान की शुरुआत की। इस अभियान की शुरुआत के साथ ही टारगेट फिक्स कर दिया गया। लक्ष्य तय है साल 2019 है जो की महात्मा गांधी की 150 वीं जयंती है तक देश को खुले में शौच मुक्त, स्वच्छ और साफ बनाना। काफी हद तक इसमें सुधार हुआ है, पर अभी चुनौती बड़ी है क्योंकि ग्रामीण लोगों में इसके प्रति जगरूकता की कमी है। पर आज हम सुदूर गाँव के एक ऐसे शख्स के बारे में बताने जा रहे हैं जिसने आँखों की रौशनी ना होने के बाबजूद ना सिर्फ खुद के घर में शौचालय बनवाया बल्कि पूरे गाँव को इसके किये जागरूक कर रहा है।

इनका नाम है साधु माँझी। साधु बिहार के गया जिले स्थित एक सुदूर गाँव फतेहपुर के रहने वाले हैं। साधु की आंखों की रोशनी नहीं हैं। साधु नें ना केवल यह सुनिश्चित किया कि वह अपने घर में शौचालय तैयार करें बल्कि यह भी सुनिश्चित किया कि पूरा गाँव खुले में शौच से मुक्त हो। गया जिले के फतेहपुर गांव में कुल 48 परिवारों का घर है। यह गांव शहर और शहरी परिवेश से बहुत दूर है और बड़ी कृषि भूमि में फैला हुआ है। यहाँ के ज्यादातर ग्रामीण समृद्ध लोगो के स्वामित्व वाले खेतों में दैनिक मजदूरों के रूप में काम करते हैं। साथ ही कुछ लोग पास के ईंट कारखाने में भी मजदूरी करते नहीं।स्वच्छ पानी और शौचालय कभी यहाँ मुद्दा ही नहीं रहा।

गांव में एक साल पहले तक कोई शौचालय नहीं था, खुली शौच की व्यवस्था काफी हद तक प्रचलित थी। ज़्यादतर खेत और खुली जगह पर बड़े-बड़े लोगों के स्वामित्व के कारण यहाँ खुले में शौच भी एक परेशानी ही थी। 45 वर्षीय दृष्टिहीन  साधु मांझी के लिए यह स्थिति और भी बदतर थी। हर दिन दैनिक क्रिया के लिए एक अलग जगह की तलाश करना उनके लिए किसी

परीक्षा से कम नहीं थी। पर एक साल पहले, साधु  ने अपने पड़ोसी झलो देवी को सुना वह घर में  शौचालय होने लाभों के बारे में बात कर रही थी। झलो देवी 4 बेटियों की मां है और अक्सर यह सुनिश्चित करने के लिए संघर्ष कर रही थी कि खुले में शौच को पराजित कैसे किया जाय। ताकि बेटियां और बहू सुरक्षित रहें। शुरुआत में उन्हें शौचालय निर्माण की प्रक्रिया को समझने की कोशिश की, लेकिन असफल रहा।

करीब साल भर पहले वे एक पड़ोस में एक गाँव गयी हुई थी इस दौरान झलो देवी ने एक कार्यात्मक शौचालय देखा जो सरकार के प्रमुख कार्यक्रम - स्वच्छ भारत मिशन के तहत बनाया गया था। वे इसी देश कर उत्साहित हुई और अपने घर में भी एक बनाने म मन बनाया। उन्होंने साधु मांझी के साथ भी यह बात साझा किया और अपने घरों में शौचालय बनाने के लिए अपनी जरूरी चीजों की खोज शुरू की। जल्द ही, साधु और उनकी पत्नी ने शौचालय के निर्माण का कार्य शुरू कर दिया और यह सब केवल झलो देवी द्वारा दी गई जानकारी के साथ। साथ ही, स्वच्छ भारत मिशन (एसबीएम) के तहत पेपर वर्क भी शुरू किया। शौचालय बनाने की साधु माँझी की इच्छा प्रकाश में  आई और जिला स्तर के अधिकारियों के साथ वाटरएड और उसके साथी ने प्रक्रिया को सरल बनाने के लिए मिलकर काम किया। शुरुआत में, साधु और उनकी पत्नी ने खुद ही गड्ढे खोद दिए बाद में उन्हें सरकार द्वारा सहियोग मिला।

एक बार शौचालय अपने घर में बनाने के बाद, साधु ने गाँव के अन्य लोगों से बात करने की कोशिश की ताकि उन्हें अपने घरों में भी एक शौचालय बनाने के लिए मनाया जा सके। लेकिन मुश्किल से किसी ने भी अपनी बातों पर ध्यान दिया। उसके बाद उन्होंने एक संकल्प किया की वे लोगों को जागरुक करके ही रहेंगे। इसके लिए उन्होंने एक गीत बनाया और गाँव भर में घूम पर लोगों को खुले में शौच से मुक्त होने के लिए प्रेरित करते थे। उनके इन प्रयासों के एक साल बाद आज यह गाँव ओडीएफ यानी खुले में शौच मुक्त हो गया है।

 

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