आंखों की रोशनी खो देने के बावजूद अपने सपनों को रौशन कर बनें पहले दृष्टिहीन जज

कहते हैं अगर हौसले बुलंद हो तो शारीरिक विकलांगता भी आपके लक्ष्य के आड़े नहीं आती। बुलंद हौसले के सामने शारीरिक कमियों को नतमस्तक होना ही पड़ता है। हर किसी जिन्दगी में पग-पग पर बाधाएं हैं, संकट है। कोई मानसिक तो कोई शारीरिक रूप से स्वस्थ नहीं है। कोई देख नहीं पाते तो कोई बैसाखियों के सहारे जिन्दगी काटते हैं। शारीरिक विकलांगता के बावजूद हौसला, उमंग और कुछ कर गुजरने का जज्बा उन्हें विशेष की श्रेणी में पहुंचा देता है। विकलांगता अभिशाप नहीं है। बशर्ते इंसान शारीरिक विकलांगता को मानसिक विकलांगता में परिवर्तित ना कर दे। क्योंकि शारीरिक रूप से अपंग व्यक्ति चाहे तो सबकुछ कर सकता है पर मानसिक रूप से अपंग व्यक्ति अपनी कमी को लेकर ही कुंठित होते रहता है और कभी विकास नहीं कर पाता।

  आज हम एक ऐसे शख्स की बात करने जा रहे है जिन्होनें दृष्टिहीन होने के वाबजूद अपनी विकलांगता के कारण कभी हार नहीं मानी| अपनें सपनों के प्रति उनकी ईमानदारी इतनी सच्ची थी कि दृष्टिहीनता को उन्होंनें अपनें सपनों पर कभी हावी ही नहीं  होने दिया और राजस्थान के पहले दृष्टिहीन न्यायाधीश बनकर सबको चौका दिया।।

इनका नाम है ब्रह्मानंद शर्मा। 31 वर्षीय ब्रह्मानंद शर्मा राजस्थान के भीलवाड़ा जिले के मोट्रास गांव के रहनें वाले हैं। ब्रह्मानंद नें अपनें जज बननें के सपनें को कठिन मेहनत और लगन से हासिल किया है। ब्रह्मानंद राजस्थान के अजमेर जिले के सरवर शहर में सिविल न्यायाधीश और न्यायिक मजिस्ट्रेट के पद पर नियुक्त हैं। पर ब्रह्मानंद अन्य न्यायधीशों से अलग है। उनकी आँखों में रौशनी नहीं है, वे देख नहीं सकते। दरअसल 22 वर्ष की उम्र में ही ग्लेकोमा नामक बीमारी की वजह से उनकी आंखों की रोशनी चली गई थी। आंखों की रोशनी जाने के बाद भी उन्होंने अपने सपनों को बरकरार रखा और जज के पद पर नियुक्त हुए।

ब्रह्मानंद राजस्थान के पहले नेत्रहीन जज हैं, पर यह मुकाम हासिल हासिल करने के लिए उन्हें कई दिक्कतों को सामना करना पड़ा। ब्रह्मानंद ग्रामीण परिवेश से आते हैं। ब्रह्मानंद ने सरकारी स्कूल से शिक्षा ग्रहण की है। उनके परिवार में कोई जज तो दूर आजतक कोई वकील भी नहीं बना था। ब्रह्मानंद के पिताजी सेवानिवृत्त शिक्षक हैं। ब्रह्मानंद बचपन से ही जज बनने का सपना संजोये हुए थे पर परिवार की आर्थिक हालात खराब होने के कारण उन्हें जो नौकरी पहले मिली उन्होंने कर ली। 1996 में ब्रह्मानंद को भीलवाड़ा में सार्वजनिक निर्माण विभाग के दफ्तर में एलडीसी के पद के नौकरी लगी। उनकी इक्षा ना होने के बावजूद उन्होंने यह नौकरी की। दफ्तर में सभी उन्हें हीनता से देखते थे। बस तभी ब्रह्मानंद नें ऊंचा पद हासिल करने की ठानी ली थी। उसके बाद वे जज बनने के अपनें सपनों में लग गए। पारिवारिक जिम्मेंवारी के कारण वे नौकरी नहीं छोड़ सकते थे। उन्होनें नौकरी के साथ ही आरजेएस (राजस्थान जुडिशल सर्विस) परीक्षा की तैयारी शुरू की।

वर्ष 2008 में उन्होनें पहली बार आरजेएस की परीक्षा दी पर उन्हें सफलता नहीं मिली। वाबजूद इसके ब्रह्मानंद नें हौसला नहीं हारा। परीक्षा की तैयारी के लिए उन्होनें कोचिंग सेंटरों जॉइन करनें का सोच पर कोचिंग सेंटरों वालों ने उनका दाखिला लेनें से मना कर दिया। उसके बाद उन्होनें खुद से आरजेएस के परीक्षा की तैयारी की ठानी।
जज बनने की ख्वाहिश को पूरा करने के लिए उनकी पत्नी और उनके भतीजे नें उनकी खूब मदद की। परीक्षा की तैयारी के लिए वे दिनभर पत्नी और भतीजे की आवाज में किताबों को रिकॉर्ड करवाते और पूरी रात सुन कर याद करते थे। उन्होंने यह रिकॉर्डिंग अक्सर सुनने के लिए एक आदत बना ली थी। उनकी कड़ी मेहनत का फल उन्होंने 2013 में मिली जब उन्होंने राजस्थान ज्यूडिशियल सर्विसेज (आरजेएस) की परीक्षा में 83वां रैंक हासिल किया।

20 नवंबर 2013 को आरजेएस में चयनित 114 में से 112 अभ्यर्थियों को तो नियुक्ति की अनुमति दे दी गयी। पर ब्रह्मानंद की नियुक्ति दृष्टिहीन होने के कारण अटक गई थी। जब ये मामला हाईकोर्ट तक पहुंचा तो हाईकोर्ट ने इनकी नियुक्ति की सिफारिश की। इसके बाद ब्रह्मानंद देश के पहले नेत्रहीन जज बन गए। 1 साल की ट्रेनिंग के बाद जनवरी 2016 में उन्हें चित्तौड़गढ़ के न्यायिक मजिस्ट्रेट के रूप में पदभार दिया गया। और हाल ही में उनका स्थानांतरित सरवर किया गया।

उनके सुनने की शक्ति इतनी तेज है कि वो किसी भी वकील को उनकी आवाज से पहचान लेते हैं। कोर्ट में हर रोज सैकड़ों वकील आते हैं पर ब्रह्मानंद कभी धोखा नहीं खाते। वे केस की मेरिट और सबूतों के आधार पर ही फैसला देते हैं। वे हर पक्ष की बातों को सुनते हैं। इसके लिए वह एक ई-स्पीक डिवाइस का इस्तेमाल करते हैं जो कि किसी भी नोट्स को पढ़कर सुनाती है। जब भी कोई वकील उनकी कोर्ट में आता है तो वे उनसे उनकी शिकायत और दस्तावेजों को पढ़ने को कहते हैं।

ब्रह्मानंद की कहानी सच में बहुत प्रेरणादायक है। कई बार हम छोटी-छोटी चीजों की वजह से खुद को हार हुआ महसूस करते हैं। पर ब्रह्मानंद के जज़्बे से हमें सीख लेने की जरूरत हैं, जिन्होनें इतनी विकट परिस्थितियों के बावजूफ कभी हार नहीं मानी। ब्रह्मानंद के इस जज्बे को केन्फोलिओस सलाम करता है।

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