गांव में पानी का अभाव था, फिर 70 वर्षीय बुज़ुर्ग की मेहनत ने क्रांति ला दी

"हिम्मते मर्दा तो मददे खुदा" यानी जो शख्स हिम्मत करके किसी काम को करता है तो ऊपर वाला भी उसकी हर मदद करता है। ये पंक्ति हम बचपन से सुनते आये है और कई बार कुछ लोगो के साथ इस बात को सार्थक होते भी देखा है। दशरथ मांझी इस बात का एक सशक्त उदाहरण हैं, जिन्होंने अपने हौसले और हिम्मत के बल पर 22 साल कठिन मेहनत कर, अपना पूरा जीवन खपाकर पहाड़ को काटकर रास्ता बना दिया।

सच ही कहा है मन के हारे हार है मन के जीते जीत अगर व्यक्ति में कुछ कर गुजरने का हौसला हो तो नामुमकिन का ना हटाकर देखो वो भी मुमकिन हो जाता है कुछ ऎसे ही हौसले, हिम्मत और जूनून की दास्तां है सीताराम लोधी की।

मध्यप्रदेश के बुंदेलखंड क्षेत्र में स्थित है जिला छतरपुर जो की एक सुखाग्रस्त जिला माना जाता है। वहां का आलम इतना विकट है कि पानी के आभाव में लोग गाँव से पलायन करने को विवश हैं। ऐसे में छतरपुर जिले के प्रतापपुर ग्राम पंचायत के छोटे से गाँव हदुआ ने रहने वाले 70 वर्षीय सीताराम लोधी ने अपने गाँव वालो को प्यास से त्रस्त देख एक संकल्प लिया कि वे अपने दम पर कुआं खोदेंगे। सीताराम के पास ना तो कोई आर्थिक सहायता थी ना ही साथ देने के लिए लोग। फिर भी बस अपने श्रमबल की बदौलत वे निकल पड़े अपनी योजना को पूरा करने के लिए। सीताराम ने अकेले ही साल 2015 में कुआँ खोदने का काम शुरू किया और साल 2017 में 33 फिट तक गहरे कुआं खोदने का काम पूरा भी कर डाला।

निःस्वार्थ भाव से लोकहित के लिए काम करने वाले सीताराम की जीवन की कहानी बड़ी ही रोचक है। उन्होंने आजीवन अविवाहित रहने का फैसला लिया और आज तक उस फैसले पर कायम है। सीताराम हदुआ गाँव में ही अपने छोटे भाई 60 वर्षीय हलके लोधी के साथ संयुक्त परिवार में रहते हैं। उनके पास अपनी आजीविका चलाने के लिए 20 एकड़ खेती की जमीन है।

आखिर सीताराम के मन में कुँआ खोदने का विचार आया कहाँ से-

इस बारे में बात करते हुए सीताराम बताते है कि " हमारे यहाँ सूखे के मौसम में पीने के लिए पानी का कोई साधन नहीं था। और ना ही हमारे पास इतने पैसे थे की कुएं या नल का इंतजाम कर सकें। इसलिए मैंने अकेले ही कुआं खोदने का फैसला किया।"

कुआं खोदना कोई आसान काम नही है इस बात को उनका परिवार अच्छे से समझता था। इसलिए परिवार वालों ने उन्हें इस काम को करने से मना भी किया। लेकिन सीताराम कुआं खोदने की प्रतिज्ञा कर चुके थे और उन्होंने किसी की बात नहीं मानी।

सीताराम के भाई हलके बताते हैं "हम कुआं खोदने के खिलाफ नहीं थे पर इस बात की कोई गारंटी नहीं थी कि कुआं खोदने पर पानी मिलेगा भी या नहीं। एक वक्त हम सबने उन्हें रोकने की बहुत कोशिश की लेकिन वे नहीं माने।"

उसके बाद क्या था सीताराम ने अपनी खेत की जमीन पर कुआं खोदने का काम शुरू कर दिया। वे रोज तड़के सुबह कुआं खोदना को निकल जाते और अपनी प्रतिज्ञा को सफल करनें में जी जान से लगे रहते। बस वे दोपहर की धूप में कुछ देर काम बंद कर आराम करते थे। इसके बाद धूप कम होते ही वे फिर से काम पर लगते और सूरज ढलने तक लगातार फावड़ा और कुदाल चलाते रहते। यही सिलसिला 18 महीनों तक नियमित तौर पर चलत रहा। फिर एक दिन सीताराम की मेहनत रंग लाई और किस्मत ने उनका साथ दिया। उन्हें 33 फीट की गहराई पर पानी मिल ही गया।

परिवार में सभी बहुत ही खुश थे लेकिन यह खुशी कुछ ही दिनों में काफ़ूर हो गयी। सीताराम ने कुआं तो खोद दिया था, पर किसी प्रकार की आर्थिक मदद ना मिल पाने के कारण उसे पक्का नही करा पाये थे। मॉनसून में अधिक जल भराव के कारण उनके खून पसीनें से सिंचित कुआँ ढह गया। दुःख की बात यह है कि ऐसे में उन्हें कोई सरकारी सहायता भी प्राप्त नही हुई।

सीताराम कुछ निराश होकर बताते है कि " अगर उन्हें सरकार की तरफ से मदद मिलती तो वे कुएं को पक्का करवा देते और उनकी मेहनत साकार हो जाती।"
वैसे तो मध्य प्रदेश की सरकार किसानों को कुआं खोदने के लिए कपिल धारा योजना के तहत 1.8  लाख रु की आर्थिक मदद देती है। पर इसके लिए बाकायदा सरकार को आवेदन देना पड़ता है।

इतना सब होने के बाद भी सीताराम के हौसले बुलन्द हैं।
वे कहते है कि " मैं अभी भी पूरी तरह फिट हूँ और सरकार अगर थोड़ी सी मदद कर दे तो फिर से कुआं खोदने की हिम्मत रखता हूँ।"
वाक़ई 70 साल की उम्र में एक नौजवान जैसे हौसले और जूनून रखने वाले सीताराम लोधी ने साबित कर दिया की नामुमकिन कुछ भी नही।

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