एक अनोखी पहल के तहत जरूरतमंदों की मदद के लिए अपनी सैलरी का एक हिस्सा देते हैं यहाँ के अस्पतालकर्मी

कहा जाता है दूसरों की मदद करना ही सबसे बड़ा धर्म है। मदद एक ऐसी चीज़ है जिसकी जरुरत हर इंसान को पड़ती है, चाहे आप बूढ़े हों, बच्चे हों या जवान; सभी के जीवन में एक समय ऐसा जरूर आता है जब हमें दूसरों की मदद की जरुरत पड़ती है।
आज हर इंसान ये बोलता है कि कोई किसी की मदद नहीं करता, पर आप खुद से पूछिये- क्या आपने कभी किसी की मदद की है? अगर नहीं तो आप दूसरों से मदद की उम्मीद कैसे कर सकते हैं?
आज के समय में लोग बस खुद के लिए और खुद के परिवार के लिए सोचते हैं। किसी जरूरतमंद को देख हम अपना मुँह फेर लेते हैं। कई बार सुनने को मिलता है कि हमारी खुद की इतनी समस्याएँ हैं या हम खुद इतना नहीं कमाते तो किसी की मदद कैसे करें। पर ये तो बस बहानें हैं, जरुरी नहीं कि मदद पैसे से ही की जाये। अगर हमारे इरादे मजबूत हों तो यकीनन हम किसी की भी मदद कर सकतें हैं, बस जरूरत है तो नेक कदम उठानें की।
कुछ ऐसा ही कर दिखाया है केरल के एक अस्पताल कर्मियों ने, जो अपनी सैलेरी का एक हिस्सा देकर जरूरतमंदों की मदद करतें हैं।

यह अस्पताल है केरल के त्रिशुर शहर में स्थित अश्विनी अस्पताल, जहाँ के कर्मचारियों की तनख्वाह तो कम है पर उनका दिल बहुत बड़ा है। वे प्रति माह औसतन 12,000 रुपये कमाते हैं जो कि किसी भी तरह से ज्यादा नहीं है। लेकिन त्रिशूर के अश्विनी अस्पताल के कर्मचारियों के पास कुछ है तो वह है दूसरों के प्रति उदारवादी भावना।

इस अस्पताल के कर्मचारियों नें 'ज़ेस्ट ऑफ लाइफ' नामक एक पहल शुरू की है। इसका अर्थ होता है जीवन में उत्साह पैदा करना। जिसके माध्यम से उन्होंने आदिवासी परिवार के लिए एक घर बनाया है, कई मरीजों को ईलाज के लिए वित्तीय मदद पहुंचाई है और यहाँ तक कि हर महीने कई गरीब परिवारों को किराने का सामान भी उपलब्ध करा रहे हैं।

इस पहल के बारे में बात करते हुए इस कार्यक्रम के कॉर्डिनेटर में से एक अनुप कहते हैं कि " हमनें एक बार एक बेघर परिवार की मदद करने से इसकी शुरुआत की थी और धीरे-धीरे यह एक पहल में तब्दील हो गया।

अनूप अस्पताल में एक इलेक्ट्रीशियन के रूप में काम करते है। उन्होंने बताया कि मेरे एक पत्रकार मित्र ने ग्रामीण त्रिशूर में ट्राइबल कॉलोनी के दौरे पर गए थे। उन्होंने मुझे बताया कि एक परिवार था जो चादरों और फुसों से बने एक अस्थायी घर में रह रहा था। शहर में रहने वाले लोगों के लिए ऐसी चीजें सुनना अविश्वसनीय था। इसलिए अनूप नें अस्पताल के कुछ अन्य कर्मचारियों के साथ इस कॉलोनी का दौरा किया।

उन्होंने देखा कि वहां की स्थिति बहुत ही डरावनी थी, यह परिवार  जिसमें छोटे बच्चे भी थे वे वास्तव में चादरों से बने एक घर में रहते थे। और जब बारिश होती थी तो इस परिवार को किसी और की छत के नीचे आश्रय लेना पड़ता है। यह सचमुच दर्दनाक और दिल पसिझ देने वाला दृश्य था।

जिसके वाद कुछ लोगों ने हमारे कर्मचारियों के संगठन से बात की और इस परिवार के लिए घर बनाने के लिए धन जुटाने का फैसला किया। दो महीने बाद, हमने उन्हें लगभग 1.5 लाख रुपये की लागत से उनके लिए घर बनाया। यहीं जरूरतमंदों की मदद का सिलसिला शुरू हुआ।

उसके बाद उनके अस्पताल कर्मियों के संगठन ने ज़रूरतमंद लोगों की मदद जारी रखने का फैसला किया। उन्होंने अपनी इस पहल का नाम 'ज़ेस्ट ऑफ लाइफ' रखा। और अब करीब छह महीने से वे गरीबों की लगातार मदद कर रहे हैं। संगठन नें हर दिन एक जरूरतमंद रोगी को उसके ईलाज के किया वित्तीय सहायता देनें शुरूआत की है। अब तक, उन्होंने 65 मरीजों की ऐसे मामलों में मदद की है।
ज़ेस्ट ऑफ लाइफ' में फिलहाल 35 सक्रिय सदस्य हैं। जिसमें इलेक्ट्रिशियन से लेकर नर्सों और डॉक्टरों के साथ अन्य प्रशासनिक कर्मचारी भी शामिल हैं। जबकि अस्पताल कर्मचारियों के संगठन में लगभग 800 सदस्य हैं। जो इस पहल के लिए आर्थिक रूप से योगदान देते हैं। पर मुख्यरूप से सक्रिय 35 सदस्य ही 'ज़ेस्ट ऑफ लाइफ' पहल को आगे बढानें का काम करते हैं।

लियो पिछले 16 सालों से अस्पताल में एक अटेंडेंट के रूप में काम कर रही हैं। उन्होंने बताया कि यह पहली बार है कि कर्मचारी किसी एक सामाजिक कारण की वजह से एक साथ आए हैं।  जहाँ कर्मचारियों का औसत वेतन लगभग 12,000 रुपये है, पर इन सामाजिक कार्यों में हर किसी नें आगे बढ़ने में रुचि दिखाई।

यह एक समूह की ताकत नहीं तो क्या है। जब कोई व्यक्ति किसी की मदद करना चाहता है, तो कई बार उनकी उनकी कम आमदनी के कारण यह हमेशा संभव नहीं हो पता। लेकिन जब कई लोग एक साथ मिलते हैं कुछ कुछ करके बहुत कुछ इक्कठा हो जाता है, जिससे कई लोगों की मदद संभव हो पाती है।

आने वाले महीनों में, 'ज़ेस्ट ऑफ लाइफ' को अपने इस ग्रुप को एक चैरिटी संस्थान के रूप में पंजीकृत करने वाला है और पूरे जिले में अपनी जनसेवी कार्यों को फैलाने की उम्मीद में है। ताकि ज्यादातर जरूरतमंदों तक उनकी सहायता पहुँच सके।

अस्पताल कर्मियों की यह पहल सच में काबिले तारीफ है। एक ओर जहां दूसरे अस्पताल अपने मरीजों का आर्थिक रूप से दोहन करते हैं वहां अश्विनी अस्पताल के कर्मचारी एक मिशाल कायम कर रहे हैं।

 

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